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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1121

बोधसागर

( २५३ )

ब्रह्म ज्ञान जाके घट होई । मरम पुरुष कहैं जाने सोई ॥
सत्य शब्दका मर्म जिन जाना । और सकल जग झूठ बखाना ॥
सबमें ब्रह्म रहौ भर पूरी । बाहर भीतर तत्त्व हजुरी ॥
दूजा काहु न देखै कोई । सत्य शब्द जाके घट होई ॥
जाको सद्गुरु दाया कीन्हा । सो पावेगा शब्दका चीन्हा ॥
अगम भेद लख पावै जोई । सतगुरु साँच और सब छोई ॥
सतगुरु महिमा ही लख पाई । सो सत लोक पहुँचि है जाई ॥
यहै ज्ञान धर्मन करहु सुन लेहू । सब कहैं सत्य शब्द कह देहू ॥
मिथ्या ज्ञान करहु उपदेशा । तो नहि पावहु लोक संदेशा ॥
जो तुम काज आपना चाहू । तौ जीवन कहैं सत्य लखाहूँ ॥
जो कोई शब्द सुनै तुम पासा । सोई करि है लोक निवासा ॥
जाके सत्य ज्ञान घट भयऊ । यारै प्रीति निज घर कहैं गयऊ ॥
अनमोलिक हीरा निज जाना । ताका मोल वही परमाना ॥
सोहैं सम निर्मौलक भयऊ । साहिब सेवकइक मिल गयऊ ॥
कञ्चन और आभूषण जाई । ऐसे ब्रह्म जीव मिलजाई ॥
दूजा भाव न एका रहिया । संशय मेट अमर पद लहिया ॥
अमर मूल अमर पद भई काया । अमर शब्द जिन हंसन पाया ॥
अमर शब्द सतगुरु सो पावै । बिन सतगुरु सब मूल गँवावै ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । ऐसा भेद करौ परकासू ॥
यहै भेद संसार सुनावहुँ । सब जीवन कहैं लोक लेजावहुँ ॥
तुम कहैं दीन्ह जत्त कडिहारी । तुम्हरी बाँह उतर भवपारी ॥
जा कहुँ तुम बकसो सहिदानी । सो कडिहार जत्त मुहैं जानी ॥
जापर दाया तुमने कीना । सोई जीव मुक्ति कहैं चीना ॥
मुक्ति भेद जब पावै प्राणी । सतगुरुनेक सदा उत्पानी ॥
रजगुण तमगुण त्याग कराई । सतगुण धर्महिं परसैं भाई ॥
सतगुण धर्म कर पावै भेदा । कहैं कबीर सोइ हंस अच्छेदा ॥