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सर्वकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1117

४ जाग्रत स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें जीव ऐसा समझता है कि, जो कुछ मैं जानता बूझता हूँ वह सब सत्य है। जो कुछ दूसरे करते हैं वह सब असत्य हैं। मनुष्यको ऐसे समझना चाहिये, जैसे ज्वरकी अधिकतासे मदिराको जल समझता हो।

५ स्वप्न जाग्रतवाला जीव—जो स्वप्न देखता है उसे ज्योंका त्यों याद रखता है।

६ स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें प्राप्त हुआ जीव देखे हुये स्वप्नको भूल जाता है।

७ सुषुप्ति—गाढ़ निद्राके समान अचेताको कहते हैं।

अज्ञानकी इन सात भूमिकासे अपनेको बचाना, उनके फन्देसे बाहर होना इनके बदले सात ज्ञानकी सात भूमिकाओंकी इच्छा और उन्हींके लिये प्रयत्न करना उचित है।

ज्ञानकी सात भूमिकाएँ।

१—शुभइच्छा, २—स्वविचारना, ३—समानता, ४—शिशिरान्ति, ५—असंशक्ति, ६—पदार्था भाविनी, ७—तुरिया ये सात ज्ञानभूमिकाएँ हैं।

१ शुभ इच्छा भूमिका—उसको कहते हैं जिसमें प्रवेश करनेसे शुभ कामना उत्पन्न होती हो अज्ञानताको दूर करनेकी इच्छा होती है, ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करनेकी सच्ची अभिलाषा होती है, अपनी बीती हुई आयु और किये हुये अशुभ कामोंके ऊपर पश्चात्ताप होता है। कुसङ्गतिसे दूर भागता है शास्त्र विहित शुभ कर्मोंमें लग जाता है।

२ स्वविचारना भूमिका—मैं मनुष्य जब पहुँचता है उस समय यह सत्सङ्गति और शुभकर्मोंको खोजकर उनमें प्रविष्ट हो जाता है।

३ समानता अर्थात् तनुमानसा भूमिका—मैं पहुँचनेपर संसारसे वैराग्य हो जाता है, विषय वासनाको मिथ्या दुःखदाई समझकर उससे विरक्त हो जाता है। वैराग्य करके सब प्रकारके सुखोंको तुच्छ जान ईश्वरमें निमग्न हो जाता है।

५ असंशक्ति भूमिका—मैं पहुँचकर ईश्वरमें भी अधिक निमग्नता होती है।

६ पदार्थाभाविनी भूमिका—मैं पहुँचकर ऐसी दशा हो जाती है कि, बड़े परिश्रमसे दूसरे के जगानेसे आगता है नहीं तो ध्यानमें मग्न रहता है।

७ तुरिया भूमिका—इस भूमिका—मैं पहुँचनेपर दूसरोंके जगानेसे भी नहीं जागता, गुप्त प्रगट ब्रह्ममें लय हो जाता है।