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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१३९

कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥
पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥
एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥
सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥
अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥
निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥
सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥
चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥
सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥
पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥
रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥
तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥
सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥

दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।

तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥
ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥
सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥
पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥

ब्रह्मावचन ।

ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥
कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा