कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥
पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥
एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥
सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥
अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥
निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥
सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥
चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥
सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥
पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥
रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥
तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥
सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥
दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।
तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥
ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥
सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥
पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥
कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा