सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

( ७९ )
इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने जो पितामह से ‘पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर,
शेषं दिनानां तव जीवितस्य ।’ कहा, उसका रहस्यार्थ इस प्रकार समझना
चाहिये--
“सूर्योदय से सूर्यास्त और सूर्यास्त से सूर्योदय तक एक-एक दिन मान कर
अट्ठाईस दिन ही छप्पन दिन हो जाते हैं । अतः हे भीष्म ? आपके कुल अट्ठाईस
दिन शेष हैं । आज माघ कृष्ण द्वितीया है । आप माघी में देहत्याग कर दिव्य
धाम प्राप्त करेंगे ।’
पुनः माघ कृष्ण तृतीया से माघ कृष्ण पञ्चमी तक श्रीभीष्ममुख विनिःसृत
दिव्योपदेश श्रवण कर शोकमुक्त पाण्डव रात्रि में हस्तिनापुर आ गये ।
‘उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे’ का भाव इस प्रकार हृदयंगम
करना चाहिये--
पूर्वरीति से पचीस रातें ही पचास के तुल्य हो जाती हैं । अतः माघ कृष्ण
पञ्चमी से माघ शुक्ल चतुर्दशी तक पाण्डव हस्तिनापुर में रहे । पुनः माघी
पूर्णिमा को भीष्माचार्य के निर्वाण का समय समुपस्थित जान कर उनकी सेवा
में समुपस्थित हुए । तब धर्मराज युधिष्ठिर से महात्मा भीष्म ने कहा--
‘अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः’ इसका अभिप्राय इस रीति से
हृदयंगम करना चाहिये--
जिस दिन आप उपदेश के लिए प्रार्थना करने आये थे और भगवान्
श्रीकृष्ण ने आयु के छप्पन दिन शेष बताये थे, उस दिन को लगाकर आज मेरे
अट्ठावन दिन पूर्ण हो रहे हैं । अभिप्राय यह कि माघकृष्ण द्वितीया से माघी
पूर्णिमा तक उन्तीस दिन होते हैं, कूटार्थक शब्दों में यही अट्ठावन कहे गये हैं ।
एतावता उक्त प्रक्रिया से पौषकृष्ण अष्टमी से माघी तक भीष्माचार्य के
तिरपन दिन होते हैं । अतः माघ पूर्णिमा दिन के मध्याह्न में भीष्मजी का
देहत्याग सिद्ध होता है । ‘त्रिभागशेषः’ का अभिप्राय दिन का त्रिभाग शेष है ।
मध्याह्नोत्तर दिन त्रिभाग शेष होता ही है ।