काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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अतः किसी के कालनिर्धारण में एक सीमा निर्धारण करके उसी दायरे
में सोचना बुद्धिमानी नहीं है ।
उपसंहार
इस प्रकार इस छोटे से लेख में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण और श्रीमहा-
भारत संहिता का काल निर्णय आस्तिकों की दृष्टि से किया गया है । जो
वस्तु जिसकी होती है उसका रहस्य भी उसी पद्धति से जानने पर मिलता है,
अन्यथा जो कुछ किया जाता है उसमें विपरीत फल ही निकलता है । वेदशास्त्र
आदि हम लोगों को अनादि वंशपरम्परा से अनादि अपौरुषेय ही घोषित आ
रहे हैं। यदि उद्धरण वाली पद्धति ही लें तो श्रीमन्महाभारत में वाल्मीकीय
रामायण का उद्धरण है, यथा—
अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि ।
न हन्तव्यः स्त्रिय इति यद्ब्रवीषि प्लवङ्गम ॥ ६७ ॥
सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ।
पीडाकरममित्राणां यत्स्यात्कर्त्तव्यमेव तत् ॥ ६८ ॥
( म० भा० द्रोणपर्व १४३ )
यह श्लोक श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के युद्ध काण्ड में ८१ सर्ग का
२८ वाँ है ।
‘रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ।’
( म० भा० वनपर्व १४७।११ )
इसी प्रकार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में मनुस्मृति का उद्धरण है ।
‘श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ ।
गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥
राजभिर्धृतदण्डांश्च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥