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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

( २१ )
सभी ग्रन्थ ई० सन् पूर्व ४०० वर्ष से प्रथम के नहीं हो सकते जिन ग्रन्थों में
चैत्रादि मासों का उल्लेख है वे भी वेदांग ज्योतिष एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के बीच
के माने जाने चाहिये । जिन ग्रन्थों में यवन जाति की विद्वत्ता, आक्रमण-
कारिता, वीरता का उल्लेख है वे सभी ग्रन्थ सिकन्दर के आक्रमण ई० सन्
पूर्व ३२३ के पीछे के हैं । ई० स० पूर्व पाँच सौ वर्ष के नहीं हैं । परन्तु उनकी
उक्त कल्पना में भ्रान्ति या ईर्ष्या मूलकता ही है । ग्रीक देश के अर्थ में ई० सन्
पूर्व कुछ शतियों से यूनान नाम की प्रसिद्धि हुई है ।
महाराज ययाति के पुत्र तुर्वसु एवं उनके पुत्र यवन राजाओं की प्रसिद्धि
बहुत पुरानी है । महाभारत आदि पर्व ८५।३४ में कहा गया है-- 'यदोस्तु
यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः'--यदु से यादव हुए हैं और तुर्वसु से यवन ।
उनका राज्य यवन राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
मनु ने मनु स्मृति १०।४३-४५ में बताया है कि पाण्ड्य, चोल, द्रविड़,
कम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, दरद, खश आदि क्षत्रिय जातियां संस्कारों के
लोप होने तथा ब्राह्मण सम्बन्धहीन होने से वृषल ( म्लेच्छ ) हो गयीं । इन्हीं
राज्यों का वर्णन अशोक के प्रज्ञापन दो, पाँच और तेरह में आया है । उससे
भी और प्राचीन ग्रन्थों में भी यूनान बनने के सहस्रों वर्ष पूर्व चन्द्रवंशी ययाति
के पौत्र यवन के वंशधरों के अर्थ में ही यवन शब्द का उल्लेख हुआ है न कि
यूनान के यूनानियों के अर्थ में । अतः महाभारतादि ग्रन्थों में यवनों के पराक्रम
का वर्णन है । ज्योतिष विज्ञान सम्बन्धी पाश्चात्यों की धारणा भी गलत है ।
भारतीय ज्योतिर्विज्ञान सृष्टि से लेकर अन्त तक एक एवं निर्विकार है ।
विराट पर्व में राजर्षि भीष्म पितामह के तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा के विषय में
जो कहा गया है कि उस समय तक १३ वर्ष पाँच महीने बारह दिन द्यूतक्रीड़ा
के दिन से बीत जायेंगे । इससे यही स्पष्ट है कि भारतीय युद्ध काल में भी
हमारी वही सनातन काल गणना राष्ट्रमिति के रूप में मान्य थी । जिसके
अनुसार श्री रामचन्द्र ने १४ वर्ष का वनवास पूर्ण किया । उसी के अनुसार
पाण्डवों ने तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी की थी । वह गणना है सौर चन्द्र जिसका
वर्ष चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर चैत्र कृष्ण अमावस्या को पूरा होता है ।

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