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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 292

२८८ ज्ञानयोग

यह उत्तर भी एकदम ही प्राप्त नहीं हुआ। उसके भी विभिन्न सोपान हैं। इस उत्तर के सम्बन्ध में दार्शनिकों में मतभेद है। माया-वाद भारत के सभी दार्शनिकों को मान्य नहीं है। सम्भवतः उनमें से अधिकांश दार्शनिकों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया। कुछ तो द्वैतवादी हैं—उनका मत द्वैतवाद है—निश्चय ही उनका यह मत विशेष उन्नत तथा मार्जित नहीं है। वे इस प्रश्न की जिज्ञासा ही नहीं होने देंगे—वे इस प्रश्न के उत्पन्न होते ही इसे दबा देते हैं। वे कहते हैं—"तुमको इस प्रश्न के पूछने का अधिकार नहीं है—क्यों इस तरह हुआ, इसकी व्याख्या पूछने का तुम्हें कुछ भी अधिकार नहीं। वह तो ईश्वर की इच्छा है—हमें शान्त भाव से उसे सहन करना होगा। जीवात्मा को कुछ भी स्वाधीनता नहीं है। सब कुछ पहले से ही निर्दिष्ट है—हम क्या करेंगे, हमें क्या क्या अधिकार है, हम क्या-क्या सुख-दुःख भोगेंगे, सभी कुछ पहले से ही निर्दिष्ट है। हमारा कर्तव्य है—धैर्य से उन सभों का भोग करते जाना। यदि हम ऐसा न करें तो और भी अधिक कष्ट पायेंगे। किस तरह से हमने इसको जाना है?—क्योंकि वेद ऐसा कहते हैं।" वे भी वेद के श्लोक उद्धृत करते हैं, उनके मत-सम्मत वेद का अर्थ भी है; वे इन सभों को प्रमाण कह कर सभी को उन्हें मानने के लिए कहते हैं और तदनुसार चलने का उपदेश देते हैं।

फिर अनेक ऐसे भी दार्शनिक हैं जो मायावाद स्वीकार नहीं करते, पर उनका मत मायावाद और द्वैतवाद के बीच का है। वे हैं परिणामवादी। वे कहते हैं, जीवात्मा की उन्नति तथा अवनति—विभिन्न परिणाम ही—जगत् की प्रकृत व्याख्या है। वे रूपक भाव से वर्णन करते हैं कि समस्त आत्मा एक बार संकोच को और फिर विकास को