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सर्वकोश
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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बहुत्व में एकत्व २२५

किस प्रकार भूमि पर गिरता है अथवा विद्युत का प्रवाह किस प्रकार स्नायुओ को उत्तेजित करता है तब तो मै इसी क्षण आत्महत्या कर लूँ। मेरा संकल्प है कि मै सभी वस्तुओ के मर्म की खोज करूँगा और जीवन का वास्तविक रहस्य क्या है यह जानूँगा। आप प्राण के विभिन्न विकासो की आलोचना कीजिये, मै तो प्राण का स्वरूप जानना चाहता हूँ। मै इस जीवन का समस्त रस सोख लेना चाहता हूँ। मेरा दर्शन कहता है कि जगत् और जीवन का समस्त रहस्य जानना होगा, स्वर्ग नरक आदि का सभी कुसस्कार छोड देना होगा, चाहे उनकी सत्ता ठीक इसी पृथ्वी के समान क्यो न हो। मै इस आत्मा की अन्तरात्मा को जानूँगा—उसका वास्तविक स्वरूप जानूँगा, वह क्या है, यह जानूँगा, केवल वह किस प्रकार कार्य करता है एव उसका प्रकाश क्या है यह जान कर ही मेरी तृप्ति नही होगी। सभी वस्तुओ का 'क्यो' जानना चाहता हूँ—'कैसे होती है,' यह खोज बालक करते रहे। विज्ञान और क्या है? आपके ही किसी बडे आदमी ने कहा है—'सिगरेट पीते समय जो जो होता है वही यदि मै लिख कर रक्खूँ तो वही सिगरेट का विज्ञान होगा।' अवश्य ही वैज्ञानिक होना अच्छा है और गौरव की बात है—ईश्वर उनके अनुसन्धान मे सहायता और आशीर्वाद दे; किन्तु जब कोई कहता है कि यह विज्ञान-चर्चा ही सर्वस्व है, इसके अतिरिक्त जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं है, तब समझ लेना चाहिये कि वह निर्बोध के समान बात कह रहा है। समझ लो कि उसने जीवन के मूल रहस्य को जानने की कभी चेष्टा नहीं की; वास्तविकता क्या है, इसकी उसने कभी आलोचना ही नहीं कीं। मै यो ही केवल तर्क के द्वारा ही समझा दे सकता हूँ कि तुम्हारा जो कुछ भी ज्ञान है सब

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