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सर्वकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५४५
के. चं.—दारपुत्रजनालस्यं धानधान्यविनाशनम् ।
मनस्तापमवाप्नोति चन्द्रे केतुदशान्तरे ॥ १४८ ॥
के. मं.—पुत्रदारानुजद्वेषं रोगारिनृपपीडनम् ।
बन्धुनाशमवाप्नोति कुजे केतुदशान्तरे ॥ १४६.॥
के. रा.—राजचोरभयं दुःखं सर्वकार्यविनाशनम् ।
दुष्टमानवसंवादं राहौ केतुदशान्तरे ॥ १५० ॥
के. बृ.—देवद्विजगुरुप्रीतिं राजस्नेहं निरामयम् ।
भूपुत्रलाभमाप्नोति गुरौ केतुदशान्तरे ॥ १५१ ॥
के. श.—मनोभयं मनस्तापं स्वबन्धुजनविग्रहम् ।
देशत्यागमवाप्नोति शनौ केतुदशान्तरे ॥ १५२ ॥
के. बु.—बन्धुमित्रादिसंयोगं पुत्रदारधनागमम् ।
विद्यासुखमवाप्नोति बुधे केतुदशान्तरे ॥ १५३ ॥
विशेषः—शुभग्रहयुतः केतुः स्वदशायां सुखप्रदः ।
यदि शोभनसन्दृष्टः करोति विपुलं धनम् ॥ १५४ ॥
सपापः कुरुते केतुः श्वपाकै दुष्टमानवैः ।
भीतिं कृत्रिमरोगाद्यैर्व्यसनं धननाशनम् ॥ १५५ ॥
दशादौ गुरुबन्ध्वार्ति दशामध्ये धनायतिम् ।
दशान्ते सुखमाप्नोति केतोर्दायफलं त्रिधा ॥ १५६ ॥
अधुना केतुदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिविशेषे फलेष्वपि
तारतम्येन वैशिष्ट्यं विचिन्त्यमिति । श्लोकाः स्पष्टार्थका एवेति ॥ १४५–१५६ ॥
केतुकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री-पुत्रका मरण, सुख-वित्तका नाश हो और
शत्रु का भय होता है ॥ १४५ ॥
केतुकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री और पुत्रको रोग, कलह, बन्धु तथा मित्र-
का नाश, ज्वर और अतिसार होता है ॥ १४६ ॥
केतुकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो मनमें भंग, शरीरमें दुःख, विदेश यात्रा, भय
और सब कार्यों में विरोध होता है ॥ १४७ ॥
केतुकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री-पुत्र-जनोंसे आलसी हो, धन-धान्य
का विनाश हो और मनमें ताप होता है ॥ १४८ ॥
केतुकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो तो पुत्र-स्त्री आदिसे वैर, रोग-शत्रु-राजासे
पीड़ा और कुटुम्बोंका संहार करता है ॥ १४९ ॥
केतुकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो राजा और चोरका भय, दुःख, सर्व कार्यका
विनाश होता है तथा दुष्ट मनुष्योंसे संवाद होता है ॥ १५० ॥
केतुकी दशामें गुरुकी अन्तर्दशा हो तो ब्राह्मण-गुरु-देवतामें प्रीति हो, राजा के स्नेह
की प्राप्ति, रोगसे रहित और भूमि-पुत्रका लाभ होता है ॥ १५१ ॥
केतुकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो भय, मनमें ताप, अपने परिवारसे वैर और
देशका त्याग होता है ॥ १५२ ॥
केतुकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो बन्धु-मित्रादिका संयोग, पुत्र-स्त्री-धनका
आगमन और विद्या सम्बन्धि सुख होता है ॥ १५३ ॥
केतु शुभ ग्रहसे युक्त हो तो अपनी दशामें सुख देता है। यदि शुभ ग्रह देखते भी हों
तो बहुत धन होता है ॥ १५४ ॥