जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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श. रा.—सर्वाङ्गरोगसन्तापं चोरारिनृपपीडनम् ।
धनच्छेदम्वाप्नोति राहौ मन्ददशान्तरे ॥ १२६ ॥
श. वृ.—देवभूदेवभक्तिं च राजप्रीतिं महत्सुखम् ।
स्थानलाभमवाप्नोति गुरौ मन्ददशान्तरे ॥ १३० ॥
विशेषः—स्वोच्चे नीचनवांशगो रविसुतः कुर्यात् सौख्यं फलं
पाकादौ तु दशावसानसमये कष्टं फलं प्राणिनाम् ।
तुङ्गांशोपगते स्वनीचभवने पाकावसाने सुखं
दायादौ रिपुचोरभीतिमधिकं दुःखं विदेशाटनम् ॥ १३१ ॥
अधुना शनिदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिवैशिष्ट्ये तेषां
फलेष्वपि वैशिष्ट्यं तर्केण वाच्यमिति । अथ च शनिर्यद्युच्चराशौ (तुलायां) नीच-
(मेष) राशिनवांशगतः स्यात्तदा दशादौ सौख्यं फलं, तथा दशावसाने कष्टं फलं कुर्यात् ।
तथा च नीच-(मेष) राशौ स्वकीयोच्च-(तुला) राशेर्नवांशगतः शनिः दशावसाने सुखं, दशा-
रम्ये च रिपु-चोरभीतिमधिकं दुःखं कुरुते ॥ १२१-१३१ ॥
अथ शनिदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| श. श. | श. बु. | श. के. | श. शु. | श. सू. | श. चं. | श. मं. | श. रा. | श. वृ. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | १ | ३ | ० | १ | १ | २ | २ | १९ |
| ० | ८ | ९ | २ | ११ | ७ | ९ | १० | ६ | ० |
| ३ | ९ | ९ | ० | १२ | ० | ३ | ६ | १२ | ० |
शनिकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो बहुत दुःख व्याधि निर्पीड़न, मात्सर्य, मानसे
बहुत शोक, ताप, राजा और चोरसे धनधान्यका नाश होता है ॥ १२१ ॥
शनिकी दशामें अपनी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर विरोध, राजाका कोप, दूतत्व, वृद्धा
स्त्रीकी प्राप्ति, पशुगणका तथा विषका भय, पुत्र स्त्री आदिकी पीडा, ज्वर, वात कफका दुःख,
शूलरोग होना कहते हैं ॥ १२२ ॥
शनिकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर सुख-धन-यशकी वृद्धि, सत्कर्मकी
बुद्धि, सम्पदा, कृषि वाणिज्यसे लाभ होता है ॥ १२३ ॥
शनिकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर वातपित्त कृत रोग, नीच और दुर्जनसे
कलह, दुःस्वप्न तथा भय प्राप्त होता है ॥ १२४ ॥
शनिकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर बन्धु प्रीति, जनप्रीति, स्त्री-धन-प्राप्ति
कृषि आदिका सुख प्राप्त होता है ॥ १२५ ॥
शनिकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर पुत्र स्त्रीका विनाश, नृप चोर आदिसे
पीडा, अनलसे भय प्राप्त होता है ॥ १२६ ॥
शनिकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर गुरु तथा स्त्रीकी मृत्यु, दुःख, बन्धु-
वैर, धनप्राप्ति और वातरोग होता है ॥ १२७ ॥
शनिकी दशामें मङ्गलकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर स्थानच्युति, महारोग, नानाविधका
मानसिक भय, सहोदर भाईकी और मित्रकी पीडा हो ॥ १२८ ॥
शनिकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर सर्वाङ्गरोग, सन्ताप, चोर, शत्रु और
राजासे पीडा और धनका क्षय होता है ॥ १२९ ॥
शनिकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो देव-ब्राह्मणमें भक्ति, राजप्रीति, महत्सुख और
स्थानका लाभ होता है ॥ १३० ॥