जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ सटीकजातकपारिजाते-
नीचे तुङ्गनवांशगस्य च रवेः पाके नृपालश्रियं
सौख्यं याति दशावसानसमये वित्तक्षयं वा मृतिम् ॥ ७१ ॥
इदानीं रविदशायां सर्वेषां ग्रहाणामन्तर्दशाफलान्युच्यन्ते । इह तु सामान्येन फला-
न्युक्तानि । तेषु ग्रहाणां भावस्थानादिस्थितिवशेनापि फले तारतम्यं कुर्यात् । श्लोकास्तु सर-
लार्था इति न व्याख्याताः ॥ ६१-७१ ॥
सूर्यकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो ब्राह्मण राजा शस्त्रादिसे धन मिले, मनमें रोग
हो और विदेश-वनमें यात्रा हो ॥ ६१ ॥
सूर्यकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर बन्धु-मित्रजनसे धनप्राप्ति, मित्र स-
जनसे प्रमाद और पाण्डुरोगादि सन्ताप हो ॥ ६२ ॥
सूर्यकी दशामें मङ्गलकी अन्तर्दशा प्राप्त हो तो रत्न-सोना धनकी प्राप्ति, राजप्रीति,
सुख और पित्तरोगकी वृद्धि हो ॥ ६३ ॥
सूर्यकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो अकालमें मृत्यु, सन्ताप, बन्धु वर्गका पीडन,
पदच्युति और मनमें दुःख हो ॥ ६४ ॥
सूर्यकी दशामें बृहस्पतिकी अन्तर्दशा हो तो सबसे पूज्य हो, पुत्रसे धन प्राप्ति, देव-
ब्राह्मणका पूजन करे, सत्कार्य-आचारण करे और अच्छी सङ्गत हो ॥ ६५ ॥
सूर्यकी दशामें शनिकी अन्तर दशा हो तो सर्वशत्रु हो, आलस्य, हीनजीविका, मनमें
रोग, राजभय और चोरभयकी प्राप्ति होती है ॥ ६६ ॥
सूर्यकी दशामें बुधकी अन्तर दशा हो तो बन्धुपीडा, मनमें दुःख, उद्यम हीन, धन-
नाश और किञ्चिन्मात्र सुख प्राप्त होता है ॥ ६७ ॥
सूर्यकी दशामें केतुकी अन्तर दशा हो तो कण्ठरोग, मनमें ताप, नेत्ररोग और असमय
में मृत्यु होती है ॥ ६८ ॥
सूर्यकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो जलमें द्रव्य अनायास मिले, सुहृज्जीका सङ्ग हो
शुभ संवाद प्राप्त हो ॥ ६९ ॥
सूर्यकी दशाके आदिमें पिताको रोग हो, धनका नाश हो, मध्यमें सर्वबाधा हो, दशाके
अन्त्यमें सुख हो ॥ ७० ॥
उच्चमें नीच नवांशगत सूर्यकी दशामें अपवाद, भय, पुत्र-स्त्री पितृवर्ग-और बान्धवोंका
मरण, कृषि आदिमें धनका नाश हो । नीचमें उच्च नवांशगत सूर्य की दशामें राजासे
लक्ष्मीप्राप्ति, सौख्य प्राप्ति, दशाके अन्त्यमें धननाश वा मृत्यु होती है ॥ ७१ ॥
अथ रविदशायां सर्वेषामन्तर्दशाज्ञानाय चक्रम् ।
| सू. सू. | सू. चं. | सू. मं. | सू. रा. | सू. बृ. | सू. श. | सू. बु. | सू. के. | सू. शु. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ०० | ०० | ०० | ०० | ०० | ०० | ०० | ०० | ०१ | ६ व. |
| ०३ | ०६ | ४ | १० | ०६ | ११ | १० | ०४ | ०० | ० मा. |
| १८ | ०० | ०६ | २४ | १८ | १२ | ०६ | ०६ | ०० | ० दि. |
| अथ चन्द्रदशाफलम् । | |||||||||
| हिमकिरणदशायां मन्त्रदेवद्विजाप्तिर्युवतिजनविभूतिः स्त्रीधनक्षेत्रसिद्धिः । | |||||||||
| कुसुमवसनभूषागन्धनानाधनाढ्यो भवति बलविरोधे चार्थहा वातरोगी ॥ ७२ ॥ | |||||||||
| अधुना चन्द्रदशाफलमाह सरलार्थेन श्लोकेन । अत्रापि चन्द्रस्य स्थितिपरत्वेन फले | |||||||||
| तारतम्यं कुर्यादिति ॥ ७२ ॥ | |||||||||
| चन्द्रमाकी दशामें मन्त्र-देव-द्विजकी प्राप्ति, स्त्री जनसे विभूति (ऐश्वर्य), स्त्री-धन- | |||||||||
| क्षेत्रकी प्राप्ति, पुष्प-वस्त्र-भूषण-चन्दन-अनेक प्रकारके धनसे युक्त हो । चन्द्रमाके बलके | |||||||||
| विरोधसे अर्थकी हानि और वात रोग हो ॥ ७२ ॥ |