जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० सटीकजातकपारिजाते-
लग्नको देखनेवाला, लग्नेश और लग्नमें स्थित ये तीनों ग्रह यदि छठे आठवें, और बार-
हवें भावके स्वामी हों, शत्रुगृह-नीचस्थ या दुर्बल हों तो वे ग्रह अपनी दशामें अपने अपने
फलको नहीं देते ।
यहां लग्नको देखनेवाले तथा लग्नमें रहनेवाले अधिक ग्रह हों तो उनमें बलीका ही
ग्रहण करना चाहिये । सु० शा० कारः ॥ २८ ॥
लग्ने जलर्क्षे शुभखेचरैन्द्रैर्युक्ते तनोः स्थौल्यमुदाहरन्ति ।
लग्नाधिपे तोयखगे बलाढ्ये सौम्यान्विते तत्तनुपुष्टिमाहुः ॥ २९ ॥
लग्न इति । जलर्क्षे = जलचरराशिके, ( १ अ. १७ श्लोक. द्र. ) लग्ने तस्मिन् शुभखे-
चरैन्द्रैः = बुधगुरुभृगुभिर्युक्ते जातस्य तनोः = शरीरस्य, स्थौल्यं = पीनत्वम्, उदाहरन्ति =
कथयन्त्याचार्याः । अथ लग्नाधिपे = जन्मलग्नेशे तोयखगे = जलचरर्क्षगतग्रहे, बलाढ्ये =
पूर्वोक्त