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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

अष्टकवर्गाध्यायः ॥ १० ॥ ३२५
जातस्योक्तं फलं वाच्यम् । अथ जीवाष्टवर्गे लघुबिन्दु-( अर्धल्पबिन्दु ) युते गृहे ( राशौ )
व्यवस्थिते सूर्ये सति जातस्य कृताखिलशुभानि विनाशितानि वाच्यानि । तथा च पञ्चादि
( ५।६।७।८ ) बिन्दुके रिपौ ( षष्ठे ) व्यये ( द्वादशे ) रन्ध्रे ( अष्टमे ) वा भावे गत-
वतीज्ये ( गुरौ ) जातो नरः चिरायुः = दीर्घायुः, अतिवित्तः = बहुधनयुक्तः, जितारिकः =
जितशत्रुकश्च भवेदिति । अन्ये त्रयः श्लोकाः स्पष्टा एवेत्यलं पल्लवितेन ॥ २३-२७ ॥
वृहस्पतिके अष्टवर्गमें अधिक बिन्दु राशिके लग्नमें पुत्रार्थी गर्भाधान करे । उस राशिके
दिशाके गृहमें स्थित बहुत गाय, धन, सवारी होंगे ॥ २३ ॥
वृहस्पतिके अष्टवर्गमें थोड़े बिन्दुसे युक्त गृहमें सूर्य हो तो किया हुआ समस्त कार्य
विनष्ट हो । पाँच आदि बिन्दुा बृहस्पति षष्ठ, द्वादश, अष्टम हो तो जातक दीर्घायु, विशेष
धनी और शत्रुजित् हो ॥ २४ ॥
उच्चमें अथवा अपने गृहमें आठ बिन्दुसे युक्त बृहस्पति केन्द्रमें वा नवम भावमें नीच
राशि, शत्रुगृह तथा अस्तंगत छोड़के हो तो अपने यशसे राजा हो ॥ २५ ॥
यदि राजाके कुलमें उत्पन्न हो तो उस योगमें नरपाल ( राजा ) तुल्य हो । किये हुए
पुण्यके प्रभावसे प्रसिद्धबुद्धि, प्रतापी और श्रेष्ठगुणी हो ॥ २६ ॥
वह वृहस्पति सात बिन्दुयुत चन्द्रमासे युत हो तो जातक बहुत स्त्री-धन-पुत्र वाला
हो । ६ः बिन्दु हो तो वाहन धनवाला हो । वह पांच बिन्दुसे युक्त हो तो जीतने वाला हो ॥
अथ शुक्रफलम् ।
साष्टबिन्दुफलकोणकेन्द्रगे भार्गवे तु बलवाहनाधिपः ।
आयुरन्तमविनाशभोगवान् वित्त रत्नविभुरद्रिबिन्दुके ॥ २८ ॥
नीचास्तारिष्फनिधनोपगते तु काव्ये पूर्वोदितक्षितिपयोगविनाशनं स्यात् ।
शुक्लोऽल्पबिन्दुयुतमन्दिरदिग्विभागे स्त्रीवश्यहेतुशयनीयगृहं प्रशस्तम् ॥ २९ ॥
इदानीं सरलार्थेन श्लोकयुगलेन शुक्राष्टकवर्गफलमाह—साष्टेति ॥ २८-२९ ॥
शुक्र आठ बिन्दुसे युत कोण या केन्द्रमें हो तो बल, वाहनका स्वामी हो । एकादि
बिन्दुमें जीवनभर अविनाश भोगी हो । ७ बिन्दु होनेपर धन-रत्नका स्वामी होता है ॥२८॥
शुक्र नीच राशिमें, अस्त, द्वादश, अष्टम स्थानमें हो तो पहलेका कहा हुआ जो राज
योग है उसका विनाशक हो ( राजयोग भंग हो ) । शुक्र थोड़े बिन्दुसे युक्त जिस मन्दिर
( गृह ) में हो उस राशिकी दिशामें स्त्रीके लिये प्रशस्त शयनीय गृहका निर्माण करे ॥२९॥
अथ शनिफलम् ।
कोणस्य शून्यतरराशिगते तु मन्दे, जातस्य मृत्युफलमाशुधनक्षयो वा ।
एकद्विलोकयुगबिन्दुयुते च केन्द्रे मुक्ते स्वतुङ्गभवने रविजेऽल्पमायुः ॥ ३० ॥
षट्पञ्चबिन्दुसहिते तनुगे बलाढ्ये जन्मादिदुःखबहुलं धननाशमेति ।
मन्दे शरादिफलनीचसपत्नभावे जातश्चिरायुरतिशोभनवर्गकेन्दौ ॥ ३१ ॥
मूढारिनीचगृहगे शरवेदबिन्दौ दार्युष्ट्रवित्तसहितास्तनये तनुस्थे ।
सौरेऽष्टबिन्दुगणिते परमन्यतन्त्रग्रामाधिपास्तु गिरिबन्दुगृहे धनाढ्यः ॥ ३२ ॥
श्लोकत्रयेण शनिफलमुक्तम् । कोणस्येत्यादिना सरलार्थेनेति ॥ ३०-३२ ॥
शनि अपने अष्टवर्गमें शून्य राशिमें हो तो जातककी शीघ्र मृत्यु और धन नाश हो ।
एक, दो, तीन, चार बिन्दुसे युक्त केन्द्रमें शनि हो और अपने उच्च राशि (तुला) में न
हो तो अल्पायु हो ॥ ३० ॥
शनि बलवान् हो लग्नमें ६-५ बिन्दुसे युक्त हो तो जन्मसे ही बहुत दुःख और धन
नाश हो । शनि पांच आदि बिन्दु युत नीच या शत्रु भावमें हो अति शोभनवर्गमें चन्द्रमा
हो तो जातक दीर्घायु हो ॥ ३१ ॥
२८ जा०