जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टकवर्गाध्यायः ॥१०॥ ३१५
हो । शुक्रकी कालहोरामें उत्पन्न हो तो स्त्रीका सुख हो । शनिकी कालहोरामें जन्म हो तो
धनका नाश हो ॥ १२८ ॥
गुलिकाश्रित भावफल, संवत्सर-अयनप्रभृति सभीके फल एवं होरा प्रभृति जितने
वर्ग हैं उनके फल श्री सूर्य आदि नव ग्रहोंकी कृपासे इस ९ वें अध्यायमें कहे हैं ॥ १२९ ॥
इति जातकपारिजाते नवमोऽध्याये विमला हिन्दी टीका समाप्ता ॥ ९ ॥
सूर्यादिवारेषु कालहोराज्ञानचक्रम् ।
| सं. | घट्यः | रविदिने | चं. दि. | मं. दि. | बु. दि. | बृ. दि. | शु. दि. | श. दि. |
| १ | २।३० | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
| २ | ५।० | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. |
| ३ | ७।३० | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. |
| ४ | १०।० | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. |
| ५ | १२।३० | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. |
| ६ | १५।० | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. |
| ७ | १७।३० | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. |
| ८ | २०।० | र. | च. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
| ९ | २२।३० | शु. | श. | र. | च. | मं. | बु. | बृ. |
| १० | २५।० | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. |
| ११ | २७।३० | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. |
| १२ | ३०।० | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. |
| १३ | ३२।३० | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. |
| १४ | ३५।० | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. |
| १५ | ३७।३० | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
| १६ | ४०।० | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. |
| १७ | ४२।३० | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. |
| १८ | ४५।० | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. |
| १९ | ४७।३० | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. |
| २० | ५०।० | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. |
| २१ | ५२।३० | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. |
| २२ | ५५।० | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
| २३ | ५७।३० | शु. | श. | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. |
| २४ | ६०।०० | बु. | बृ. | शु. | श. | र. | चं. | मं. |
इति नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथाष्टकवर्गाध्यायः ॥ १० ॥
चक्रं विलिख्य सह लग्नदिवाकराद्यैः सूर्यादिलग्नभवनान्तवियच्चराणाम् ।
वाक्याष्टकोपगतवर्णनियोजिताश्चेद्विग्नाष्टवर्गजनिताखिलबिन्दवः स्युः ॥ १ ॥
देवो धयो धीगवंशस्तमो रमा धूलिः क्रमादुष्णकरादिबिन्दवः ।
सालोलसंख्याः समुद्रायांबिन्दवः सर्वाष्टवर्गः समुदायसंज्ञकः ॥ २ ॥
अथाधुनाऽष्टकवर्गाध्यायो व्याख्यायते । तत्र 'अष्टवर्गेण ये शुद्धाः शुद्धास्तेऽखिलक-