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सर्वकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 588 में से

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पृष्ठ 271

राजयोगाध्यायः ॥ ७ ॥ २४५
दीर्घायुर्धनवर्जितो नरवरस्त्रीनिर्जितश्चाष्टमात् ॥ १३४ ॥
धर्मादिग्रहमालिका गुणनिधिर्यज्वा तपस्वी विभुः ।
कर्माद्या यदि धर्मकर्मनिरतः सम्पूजितः सज्जनैः ॥
लाभाद्राजवराङ्गनामणिपतिः सर्वक्रियादक्षको ।
जातो रिःफगृहाद्बहुव्ययकरः सर्वत्र पूज्यो भवेत् ॥ १३५ ॥
इदानीं मालिकायोगमाह—लग्नादित्यादिश्लोकचतुष्टयेन । तत्र प्रत्येकभावतो मालि-
काय्रोग उक्तः । यथा सप्त ग्रहा यथास-
म्भवं लग्नादिमारभ्य सप्तमभावावधिः
प्रतिभावमेकैकग्रहक्रमेण स्थिताः स्युस्तदा
लग्नमालिका स्यात् । द्वितीयादिमारभ्या-
ष्टमं यावत्तथैव स्थिताः सप्त ग्रहाः स्युस्तदा
वित्तमालिका स्यादेवं प्रतिभावमालिका
ज्ञेया । प्रत्येकमालिकायोगस्य फलं पृथक्
पृथगुक्तं तत्स्पष्टार्थमेवेति ॥ १३२=१३५॥


[चक्र १ : लग्नमालिका]

  • लग्न (१): मं. ल.
  • द्वितीय (२): चं.
  • तृतीय (३): बु.
  • चतुर्थ (४): सू.
  • पञ्चम (५): शु.
  • षष्ठ (६): वृ.
  • सप्तम (७): श.

[चक्र २ : वित्तमालिका]

  • लग्न (१): लं.
  • द्वितीय (२): मं.
  • तृतीय (३): बु.
  • चतुर्थ (४): सू.
  • पञ्चम (५): शु.
  • षष्ठ (६): श.
  • सप्तम (७): चं.
  • अष्टम (८): वृ.

[चक्र ३ : विक्रम मालिका]

  • लग्न (१): ल.
  • तृतीय (३): चं.
  • चतुर्थ (४): बु.
  • पञ्चम (५): र.
  • षष्ठ (६): शु.
  • सप्तम (७): श.
  • अष्टम (८): वृ.
  • नवम (९): मं.

किसी भी भावसे ७ भावोंमें ७ ग्रह हों तो उस भाव सम्बन्धी मालिका योग होता है।
जैसे लग्नादि सात गृहमें यदि सात ग्रह हों तो "लग्नमालिका" योग होता है। इस योग
में जायमान नर राजा, अनेक हाथी-घोड़ोंका स्वामी होता है। धनादि सात भावोंमें
हो तो धनवान्, पिताकी भक्तिमें युक्त, धीर, सुरूप, गुणवान् और मनुष्योंमें चक्रवर्ती
होता है ॥ १३२ ॥
यदि विक्रम मालिकामें उत्पन्न हो तो पराक्रमी राजा, धनी और रोगी होता है।
यदि सुखादिमें सप्त ग्रह हों तो बहुत देशोंमें भाग्यवान् और बहुत बड़ा दान करनेवाला
राजा होता है ॥ १३३ ॥
यदि पुत्रादि मालिकामें उत्पन्न हो तो यज्ञ करनेवाला राजा वा कीर्तिमान होता
है। यदि षष्ठ गृहमें मालिका हो उसमें उत्पन्न मनुष्य हो तो कभी धन सुख प्राप्ति हो और
कभी दरिद्र होता है। कामादि (७ भावादि) मालिकामें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य
बहुत स्त्रियोंका स्वामी और राजा होता है। अष्टम भावकी मालिकामें उत्पन्न मनुष्य
दीर्घायु, दरिद्र, नर-श्रेष्ठ और स्त्रीसे निर्जित होता है ॥ १३४ ॥
धर्मादि मालिकामें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य गुणका निधान, यज्ञ करनेवाला, तपस्वी,
और समर्थ होता है। कर्मादि मालिकामें जायमान मनुष्य धर्म-कर्ममें निरत और सज्जनों-
से अच्छी तरह पूजित होता है। लाभ मालिकामें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य राज्य-स्त्री-
मणिका स्वामी, सर्वक्रियामें दक्ष होता है। रिस्फ मालिकामें जायमान मनुष्य बहुत
खर्च करनेवाला और सर्वत्र पूज्य होता है ॥ १३५ ॥