जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजयोगाध्यायः ॥ ७ ॥ २४५
इदानीं श्लोकद्वयेन वराहोक्तेन सुनफादियोगचतुष्टयस्य फलमाह । श्लोकौ सरलार्थौ ।
तत्र सुनफानफादुरुधुराणां फलं शुभमेव । केमद्रुमस्य फलमशुभमिति सारार्थः ॥ ८४-८५ ॥
सुनफा योगमें उत्पन्न मनुष्य अपने हाथसे कमाये हुये धनसे राजा होता है, वा राजा
के सदृश धनी, विख्यात, यशवाला होता है । अनफा योगमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्यकी
आज्ञाका सब पालन करते हैं, और रोग रहित, शीलवान्, विख्यात कीर्ति, शब्द, स्पर्श,
रूप, रस, गन्ध इन विषयोंका भोगनेवाला, सुन्दर शरीरवाला और मानसिक दुःखोंसे
रहित होता है ॥ ८४ ॥
दुरुधुरा योगमें उत्पन्न मनुष्य विविध भोग और सुखका भागी, धन-वाहनसे युक्त,
त्यागी, और सुन्दर भृत्यवाला होता है। केमद्रुम योगमें उत्पन्न मनुष्य राजाके कुलमें पैदा
हुआ हो तो भी मलिन, दुःखित, नीच, निर्धन, नौकर और खल होता है ॥ ८५ ॥
अथ कुजादिकृतसुनफायोगफलानि ।
जातश्च भूपतिश्चण्डो हिंस्रो डिम्भः सुधीरधीः ।
धनविक्रमवान् कोपी चन्द्राद्धनगते कुजे ॥ ८६ ॥
वेदशास्त्रकलागेयकुशलः सुशरीरवान् ।
मनस्वी हितवाग् धर्मी चन्द्राद्वित्तगते बुधे ॥ ८७ ॥
सर्वविद्याधिकः श्रीमान् कुटुम्बी नृपवल्लभः ।
राजतुल्ययशस्वी च चन्द्राद्वित्तगते गुरौ ॥ ८८ ॥
विक्रमस्त्रीधनक्षेत्रकर्मवान् बहुवित्तवान् ।
चतुष्पदाढ्या राजश्रीः सिते चन्द्रात् कुटुम्बगे ॥ ८६ ॥
पुरग्रामस्थिताशेषैः पूजितो धनवान् सुधीः ।
निपुणः सर्वकार्येषु चन्द्राद्वित्तगते शनौ ॥ ६० ॥
इदानीं कुजादिग्रहजनितसुनफायोगफलान्युच्यन्ते-जातश्चेत्यादिश्लोकपञ्चकेन । चन्द्रा-
त्केवलं द्वितीये स्थाने भौमादिग्रहे एतानि पृथक् पृथक् फलानि भवन्ति । यदि द्वितीये
द्वित्र्यादयो ग्रहा भवेयुस्तदा तत्सम्मिश्रणं फलं वाच्यम् । श्लोकाः सरलार्था एव ॥८६-९०॥
चन्द्रमासे धन(२)भावमें मंगल हो ऐसे समयका उत्पन्न मनुष्य उग्र बुद्धिवाला, हिंसा
करनेवाला, साहसी, धनी, पराक्रमी, और कोपी राजा होता है ॥ ८६ ॥
चन्द्रमासे दूसरे बुध हो तो वेदशास्त्रके कलामें-गान करनेमें चतुर, सुन्दर शरीरवाला,
मनस्वी, हित बोलनेवाला और धर्मात्मा होता है ॥ ८७ ॥
चन्द्रमासे दूसरे गुरु हो तो विद्यामें प्रवीण, श्रीमान्, कुटुम्बवाला, राजाका प्रिय और
राजाके सदृश यशस्वी होता है ॥ ८८ ॥
चन्द्रमासे दूसरे शुक्र हो तो पराक्रमी, स्त्री-धन और जगह-जमीनवाला, कर्मवान्,
खूब धनी, चतुष्पद (बैल, गाय, घोड़ा, हाथी आदि) से युक्त और राजलक्ष्मी-युत
होता है ॥ ८९ ॥
चन्द्रमासे द्वितीय शनि हो तो पुर-ग्राममें रहनेवाले सब मनुष्योंसे पूजित, धनवान्,
बुद्धिमान् और सब कार्योंमें निपुण होता है ॥ ९० ॥
अथ कुजादिग्रहकृतानफायोगफलानि ।
मानी रणोत्सुकः क्रोधी धृष्टश्चोरजनप्रभुः ।
धीरः स्वतनुलोभी स्याच्चन्द्रादन्त्यगते कुजे ॥ ६१ ॥
गान्धर्वलेख्यपटुवाक् कविर्वक्ता सुदेहवान् ।
यशःस्त्री राजपूज्यः स्यात् चन्द्राद्व्ययगते बुधे ॥ ६२ ॥