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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 588 में से

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पृष्ठ 250

२२४ सटीकजातकपारिजाते-
इदानीं भद्रयोगे जातस्य फलमाह—
शार्दूलेति । स्पष्टम् ॥ ६२ ॥
भद्र योगमें जायमान मनुष्य शेरके
समान मुख, मत्तवाले हाथीके सदृश गति,
मोटे जंघा, छाती, लम्बा-मोटा और गोला
दोनों बाहु उसीके समान ऊंचा, मानी, बन्धु-
जनोंके उपकारमें निपुण, विशेष बुद्धिवाला,
तथा यश-धन-वाला और ८० वर्षकी आयु
प्राप्त करनेवाला राजा होता है ॥ ६२ ॥


[कुण्डली - II. भद्रयोगः]

  • लग्न (प्रथम भाव): ३ ल.
  • द्वादश भाव: ४
  • एकादश भाव: ५
  • दशम भाव: ६ बु.

अथ हंसयोगफलम् ।
रक्तास्योन्नतनासिकः सुचरणो हंसस्वरः श्लेष्मको
गौराङ्गः सुकुमारदारसहितः कन्दर्पतुल्यः सुखी ।
शास्त्रज्ञानपरायणोऽतिनिपुणः श्रीहंसयोगे गुणी
जातोऽशीतिकमायुरेति सयुगं ८४ साधुक्रियाचारवान् ॥ ६३ ॥
इदानीं हंसयोगफलमाह-रक्तास्येति
सरलार्थः ॥ ६३ ॥
हंस योगमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य
लाल मुख, ऊंची नासिका, सुन्दर चरण,
हंस स्वर, कफ प्रकृति, गौरांग, सुकुमार
स्त्रीयुत, कामदेवके तुल्य सुन्दर, सुखी,
शास्त्रज्ञानमें परायण, अत्यन्त निपुण,
गुणी, अच्छी क्रियाका आचारवाला और
८४ वर्षकी आयुवाला होता है ॥ ६३ ॥


[कुण्डली - III. हंसयोगः]

  • लग्न (प्रथम भाव): १ ल.
  • द्वादश भाव: २
  • एकादश भाव: ३
  • चतुर्थ भाव: ४ वृ.

अथ मालव्ययोगफलम् ।
स्त्रीचेष्टो ललिताङ्गसन्धिनयनः सौन्दर्यशाली गुणी
तेजस्वी सुतदारवाहनधनी शास्त्रार्थवित्पण्डितः ।
उत्साहप्रभुशक्तिमन्त्रचतुरस्त्यागी परस्त्रीरतः
सप्तत्यब्दमुपैति सप्तसहितं (७७) मालव्ययोगोद्भवः ॥ ६४ ॥
इदानीं मालव्ययोगफलमाह-स्त्रीति ।
स्पष्टम् ॥ ६४ ॥
मालव्य योगमें जायमान प्राणी स्त्री-
की तरह स्वभाववाला, सुन्दर शरीरकी
सन्धि और नेत्रवाला, सुन्दर, गुणी,
तेजस्वी, पुत्र-स्त्री-वाहन-वाला, धनी,
शास्त्रार्थज्ञ पंडित, उत्साही, प्रभुशक्ति-
वान् , मन्त्रज्ञ, चतुर, त्यागी, परस्त्रीरत
और ७७ वर्षकी आयुवाला होता है ॥६४॥


[कुण्डली - IV. मालव्ययोगः]

  • लग्न (प्रथम भाव): ल. १
  • सप्तम भाव: शु. ७

अथ शशयोगफलम् ।
भूपो वा सचिवो वनाचलरतः सेनापतिः क्रूरधी-
र्धातोर्वादविनोदवञ्चनपरो दाता सरोपेक्षणः ॥