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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 588 में से

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पृष्ठ 146

१२० सटीकजातकपारिजाते-
युग्मांशगताः = द्विस्वभाव=( ३।६।९।१२ ) राशीनां नवांशगतः स्युस्तदाऽस्मिन् योगे
समुद्भूतः = जातो नरः शतायुः = वर्षशतं जीवेदिति (१३) ॥ ६६ ॥
अथ पूर्वोक्तेषु ( १३ भेदेषु ) दीर्घायुर्योगेषु दीर्घायुषः प्रमाणमुच्यते सप्तत्युपरिश-
तान्तं पूर्णमायुः = सप्ततिवर्षा-(७०) दूर्ध्वं शतान्तं ( १०० वर्ष ) यावत् पूर्णायुः
( दीर्घायुः ) भवतीति ।
चतुष्टय ( १।४।७।१० ) भाव शुभग्रहसे युक्त हो लग्नेश शुभग्रहसे युक्त हो और गुरुसे
देखा जाता हो तो पूर्ण आयुको देता है ॥ ८५ ॥
केन्द्रस्थ लग्नेश गुरु और शुक्रसे युक्त हो वा गुरु और शुक्र उसे देखते हों तो पूर्णायु
को देता है ॥ ८६ ॥
तीन ग्रह उच्चराशिके हों लग्नेश और अष्टमेशसे युक्त हों, तथा अष्टम स्थान पापग्रहसे
रहित हो तो पूर्णायुको देता है ॥ ८७ ॥
अष्टमभावमें तीनग्रह हों या अपनी उच्चराशिके मित्रस्थानके वा अपने वर्ग के हों और
लग्नेश बलवान् हो तो दीर्घायुको देता है ॥ ८८ ॥
उच्चराशिमें स्थित कोई भी ग्रह हो उससे शनि वा अष्टमेश युक्त हो तो दीर्घ आयुको
देता है ॥ ८९ ॥
पापग्रह तृतीय, एकादश, षष्ठ स्थानमें हों शुभग्रह केन्द्र-त्रिकोणमें हों और लग्नेश बली
हो तो पूर्णायुको देते हैं ॥ ९० ॥
शुभग्रहसे युक्त षष्ठ, सप्तम और अष्टम भाव हों और तीसरे, ग्यारहवें, छठे पापग्रह हों
तो दीर्घायु को करते हैं ॥ ९१ ॥
पापग्रह १२ वें ६ ठें हों और यदि लग्नेश केन्द्रमें बैठा हो, वा अष्टमस्थानमें पापग्रह हों
और वृषमेश अपनी उच्चराशिमें हो तो बहुत पंडितों का संमत है कि इन दोनों योगोंसे
दीर्घायु होती है ॥ ९२ ॥
अष्टमेश जिस भावमें हो उसका स्वामी जिस राशिमें स्थित हो उस राशिका स्वामी
और लग्नेश केन्द्रमें हों तो दीर्घायु होती है ॥ ९३ ॥
जिसका द्विस्वभाव लग्नमें जन्म हो, लग्नेश केन्द्रस्थ हो वा अपनी उच्च राशिका वा
मूलत्रिकोणका हो तो वह चिरकाल तक जीये और भाग्यशाली होवे ॥ ९४ ॥
जिसके जन्मसमयमें द्विस्वभाव लग्न हो और लग्नेशसे केन्द्रमें दो पापग्रह हों तो
उसकी दीर्घायु होती है ॥ ९५ ॥
सूर्य, शनि और मंगल चरराशिके नवांशमें हों, बृहस्पति और शुक्र स्थिर राशिके
नवांशमें हो, और शेष ( चं० बु० रा० के० ) ग्रह द्विस्वभाव राशिमें स्थित हों तो इस
योगका उत्पन्न मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है ॥ ९६ ॥
अथ पूर्णायुषः प्रमाणम् ।
सप्तत्युपरिशतान्तं पूर्णमायुः ।
सत्तर वर्षके बाद सौ वर्ष पर्यन्त पूर्णायु होती है ।
अथ योगविशेषात् युगान्तमायुः ।
मन्दांशकस्था रविजीवभौमा धर्मस्थितास्तन्नवभागसंस्थाः ।
बलान्विता लग्नगतो हिमांशुर्युगान्तमायुः श्रियमादधाति ॥ ६७ ॥
रविजीवभौमाः=सूर्यवृहस्पतिमङ्गलाः, मन्दस्य=शनैश्वरस्य (१०।११राश्योः) अंशके=
नवांशे यत्र तत्र स्थिताः स्युः, वा त एव धर्मस्थिताः = नवमभावगतास्तन्नवभागसंस्थाः =
तस्यैव नवमभावराशेर्नवांशे स्थिता एवं बलान्विताश्च भवेयुस्तथा बलान्वितो हिमांशु-
श्चन्द्रो लग्नगतो भवेत्तदा जातस्य युगान्तं जातयुगसमानमायुः, श्रियं=सम्पत्तिमादधाति ।
तथोक्तं होराप्रकाशे—