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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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विषय पृष्ठ
१२८. बिळारवत जातक .. .. .. .. ६८
[ शृगाल धर्म का ढोंग कर चूहों को खाता था।
बोधिसत्त्व ने उसे बताया कि यह बिळारव्रत है। ]
१२९. अग्निक जातक .. .. .. .. ७०
[ शृगाल के शरीर के सारे बाल जल कर सिर के कुछ
बाल बच गए थे। उसने उन्हें शिखा बना चूहों को ठग
कर खाना आरम्भ किया। बोधिसत्त्व ने उस ढोंगी से
चूहों की रक्षा की। ]
१३०. कोसिय जातक .. .. .. .. ७२
[ दुःशीला ब्राह्मणी रोग का बहाना कर ब्राह्मण के
लिए चिन्ता का कारण हो गई। आचार्य्य ने उसे
ठीक किया। ]
१४. असम्पदान वर्ग ७६
१३१. असम्पदान जातक .. .. .. .. ७६
[ वाराणसी के पिलिय सेठ पर आपत्ति आई। राज-
गृह के सङ्घ सेठ ने आधी सम्पत्ति बांट दी; किन्तु जब
राजगूह के सङ्घ सेठ का धन जाता रहा तो वाराणसी
के पिलिय सेठ ने अपना मित्र-धर्म नहीं निभाया। ]
१३२. पञ्चगरुक जातक .. .. .. .. ८०
[ तेलपत्त जातक (६६) के समान। ]
१३३. घतासग जातक .. .. .. .. ८३
[ वृक्ष पर पक्षिगण थे। तालाब में के नागराज ने
पानी में आग जलाई। पक्षिगण अन्यत्र गए। ]
१३४. झानसोधन जातक .. .. .. .. ८५
[ मरते हुए आचार्य्य ने 'नेवसञ्ञानासञ्जी' कहा।
ज्येष्ठ शिष्य ही समझ सका। ]