जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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पीडा पहुँचाने की इच्छा से गाली दी—श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए
बनाए मास को खाता है। भिक्षुओ ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयु-
ष्मन्तो ! परिषद सहित निगण्ठनाथपुत्र 'श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए
बना मास खाता है' कह गाली देता हुआ घूमता है। इसे सुन शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, न केवल अभी निगण्ठनाथपुत्र 'अपने लिए बना मास खाने वाला'
कह मेरी निन्दा करता है, उसने पहले भी की है। इतना कह पूर्व-जन्म की
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए। बडे होने पर ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित
हो नमक-खटाई खाने के लिए हिमालय से बाराणसी आ अगले दिन नगर में
भिक्षा के लिए प्रवेश किया। एक गृहस्थ ने तपस्वी को तग करने के उद्देश्य से
उसे घर में बुला, बिछे आसन पर बिठा मत्स्य मास परोसा। भोजन कर चुकने
पर एक ओर बैठ कर कहा—यह मास तुम्हारे ही लिए प्राणियो को मार
कर तैयार किया गया है। यह पाप केवल हम न लगे, तुम्हें भी लगे।
इतना कह पहली गाथा कही—
हन्त्वा भत्वा वधित्वा च देति दान असञ्ञतो,
एदिस भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति ॥
[ मारकर, कष्ट देकर तथा वध करके असयमी दान देता है। इस प्रकार
के भोजन को खाने वाला पाप का भागी होता है।]
हन्त्वा प्रहार देकर। भत्वा क्लेश देकर। वधित्वा मारकर। देति
दान असञ्ञतो असयमी दुदशील ऐसा करके इस प्रकार दान देता है। एदिस
भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति इस प्रकार उद्देश्य करके बनाए हुए
भोजन को खाने वाला श्रमण भी पाप से युक्त होता है।
उसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—