जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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हरे मेण्डक ने उत्तर दिया—हां, मित्र अच्छा लगता है। किस कारण
से ? यदि तू अपने प्रदेश मे आने पर मछलियो को खाता है तो मछलियाँ
भी तुझे अपने प्रदेश में आने पर खाती है। अपने अपने प्रदेश में, विषय मे,
गोचर भूमि मे कोई कमजोर नही होता। यह कहकर दूसरी गाथा कही—
विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति,
यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति सो विलुत्तो विलुम्पति ॥
[ जब तक सामर्थ्य होती है आदमी (दूसरो) को लूटता ही है। जब
दूसरे लूटते है, तो वह लूटने वाला लुटता है। ]
विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति जब तक पुरुष का ऐश्वर्य रहता
है तब तक वह दूसरो को लूटता ही है। याव सो उपकप्पति यह भी पाठ है।
जितने समय तक वह आदमी लूट सकता है, अर्थ है। यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति
जब दूसरे ऐश्वर्य्यशाली होकर लूटते है। सो विलुत्तो विलुम्पति वह लुटेरा
लूटा जाता है। विलुम्पते भी पाठ है। अर्थ यही है। विलुम्पन भी पढते
हैं। उसका अर्थ ठीक नही बैठता। इस प्रकार लूटने वाला फिर लूटा
जाता है।
वोधिसत्व के मुकद्दमे का निर्णय देने पर मछलियो ने जल-सर्प की दुर्बलता
जान, शत्रु को धर पकडने के लिए जाल से निकल उसे वही मार डाला और
चली गईं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय जल-
सर्प अजातशत्रु था। नील मेण्डक तो में ही था।