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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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वच्छनख ] ४१७
२३५. वच्छनख जातक
“सुखा घरा वच्छनख .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
रोजमल्ल के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
यह आयुष्मन् आनन्द का गृहस्थी-काल का मित्र था। उसने एक दिन
स्थविर के पास आने के लिए सन्देश भेजा। स्थविर शास्ता से आज्ञा लेकर
गए। उसने स्थविर को नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खिला, एक ओर बैठ,
स्थविर के साथ कुशल क्षेम बतियाते हुए स्थविर को गृहस्थ-भोगो तथा पाँच
विषयो का निमन्त्रण दिया। वह बोला—भन्ते आनन्द ! मेरे घर मे बहुत सी
जडचेतन सम्पत्ति है। इसे बीच मे से आधी बाँटकर तुम्हे देता हूँ। आएँ दोनो
घर में रहें।
स्थविर ने उसे कामभोगो के दुष्परिणाम कहे और आसन से उठकर विहार
चले गए। शास्ता ने पूछा—आनन्द ! तूने रोज को देखा ?
“हाँ, भन्ते ।”
“उसे क्या कहा ?”
“भन्ते ! मुझे रोज गृहस्थ होने का निमन्त्रण देता था।
मैने उसे गृहस्थ जीवन के तथा विषयो के दोष बताए।”
शास्ता ने कहा—आनन्द ! रोजमल्ल केवल अभी प्रव्रजितो को गृहस्थ
होने का निमन्त्रण नही देता। इसने पहले भी निमन्त्रण दिया है। उसके
प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
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