जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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बोधिसत्त्व ने हाथी से उतर राजा के पास जाकर कहा—महाराज !
विद्या अपने को गुणी बनाने के लिए सीखी जाती है। लेकिन किसी किसी
के लिए शिल्प विनाश का कारण होता है जैसे ठीक से न बनाया हुआ जूता ।
इतना कह यह दो गाथाएँ कहीं—
यथापि कीता पुरिसस्सुपाहना
सुखस्स अत्थाय दुखं उदव्वहे;
घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता
तस्सेव पादे पुरिसस्स खादरे ॥
एवमेव यो दुक्कुलीनो अनरियो
तम्हारविज्जञ्च सुतञ्च मादिय;
तमेव सो तस्स सुतेन खादति
अनरियो वुच्चति पानदूपमो ॥
[ जिस प्रकार सुख के लिए खरीदे गए जूते गर्मी से तप्त होकर तथा पाद-
तल से पीडित होकर उसी आदमी के पैर को काट खाते हैं, उसी प्रकार जो
नीचकुल या अनार्य्य होता है वह जिस (आचार्य्य) से विद्या तथा श्रुत ग्रहण
करता है उसी को वह अपने ज्ञान (श्रुत) से खाता है। अनार्य्य आदमी खराब
जूते के समान समझा जाता है।]
उदव्वहे, कष्ट दे। घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता घाम से अभितप्त
और पैर के तलुवे से पीडित । तस्सेव जिसने वह खराब जूते सुख की आशा
से खरीद कर पाँव में डाले उसीके । खादरे जखम करते हैं या पाँव
खाते हैं।
दुक्कुलीनो खराब जाति का, कुलहीन पुत्र । अनरियो लज्जा-भय रहित
असत्पुरुष। तम्हाफविज्जञ्च सुतञ्च मादिय उस उसको सिखाता है इसलिए
तमावो की जगह तम्हावो। मतलब है उस उसको हुनर का अभ्यास कराता
है, उसमें लगाता है । आचार्य्य ही इसका अर्थ है, इसलिए तम्हारा।
गाथा-बन्धन को सरल करने के लिए ह्रस्व किया गया है। विज्जं, अठारह
विद्याओ म से कोई । सुतं जो कुछ श्रुतशास्त्र । आदिय, लेकर। तमेव सो