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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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कामनीत ] ३६५
"महाराज ! कल ।"
"तो जा, प्रातःकाल ही आना ।"
"अच्छा महाराज ! जल्दी से सेना तैयार कराएं" यह शक्र अपने स्थान
को चला गया ।
अगले दिन राजा ने मुनादी करवा सेना तैयार करवाई और आमात्यो
को बुलाकर कहा—"कल एक ब्राह्मण-तरुण ने उत्तर-पाञ्चाल, इन्द्रप्रस्थ
तथा केकय इन तीन नगरो के राज्य को जीत कर देने के लिए कहा है । उस
तरुण को लेकर तीनो नगरो का राज्य जीतेंगे । उसे जल्दी से बुलाओ।"
"देव ! उसे निवासस्थान कहाँ दिलवाया है ?"
"मैने उसे निवास-गृह नही दिलवाया ।"
"उसे भोजन-खर्च दिया ?"
"वह भी नही दिया ।"
"उसे कहाँ ढूँढ ?"
"नगर की गलियो में ढूँढो ।"
उन्होने ढूँढा । न मिलने पर कहा—
"महाराज ! दिखाई नही देता ।"
माणवक को न देखने से राजा को महान शोक हुआ—अरे ! इतना बडा
ऐश्वर्य जाता रहा । हृदय गर्म हो गया । रक्त प्रकुप्त हो गया । रक्तातिसार
हो गया । वैद्य चिकित्सा न कर सके । तब तीन चार दिन गुजरने पर शक्र ने
ध्यान देकर उसके रोग को जान उसकी चिकित्सा करूँगा सोच ब्राह्मण रूप
धारण कर दरवाजे पर खडे हो कहलाया—वैद्य-ब्राह्मण तुम्हारी चिकित्सा
के लिए आया है ।
राजा ने उसे सुन कहा—बडे वडे ˚द्य भी मेरा इलाज नही कर सके ।
इसे खर्चा देकर विदा करो । शक्र बोला—मुझे न भोजन की आवश्यकता
है, न खर्चे की । वैद्य की फीस भी नही लूंगा । उसकी चिकित्सा करूँगा ।
राजा मुझे मिले । राजा ने यह सुनकर कहा—तो आ जाए ।
शक्र प्रविष्ट हो जय बुलाकर एक ओर खडा हुआ । राजा ने पूछा—
"तू मेरी चिकित्सा करेगा ?"
"देव, हाँ !"