जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ें\दूसरा परिच्छेद
६. नतंदळ्ह वर्ग
२०१. बन्धनागार जातक
“न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय बन्धनागार के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय बहुत से सेंद लगाने वाले, बटमार तथा मनुष्यघातक चोरो
को लाकर राजा के सामने पेश किया गया। राजा ने उन्हें बेड़ी से, रस्सी से
तथा जंजीर से बँधवा दिया।
देहात के तीस भिक्षु शास्ता का दर्शन करने की इच्छा से आए। दर्शन
तथा प्रणाम कर चुकने के अगले दिन भिक्षाटन करते हुए वह बन्धनागार पहुँचे।
वहाँ चोरों को देख, भिक्षाटन से लौट सन्ध्या के समय शास्ता के पास जा निवे-
दन किया—भन्ते ! आज हमने भिक्षाटन करते समय बहुत से चोरो को
बेड़ी आदि से बँधे हुए महान् दुःख अनुभव करते देखा। वे उन बन्धनों को
काटकर भाग नही सकते। क्या उन बन्धनो से बढकर भी कोई बन्धन है ?
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, यह क्या बन्धन है ? यह जो धन-धान्य-पुत्र
तथा दारा आदि के प्रति तृष्णा रूपी बन्धन हैं, यह इन बन्धनों से सौ गुणा, हजार
गुणा कड़ा बन्धन है। इस प्रकार के अत्यन्त कठिनाई से टूटने वाले महान्
बन्धन को भी, पुराने पण्डितो ने तोड कर हिमालय में प्रवेश कर प्रव्रज्या ग्रहण
की।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—