जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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करती, उसका मन प्रसन्न नहीं हो सकता। अनुचित तरीके से जो भिक्षा
मिलती है, वह मेरे मन में चाण्डाल के जूठे भोजन की तरह है। उसका खाना
ऐसा ही है, जैसे मागन्ध माणव ने चाण्डाल का जूठा भोजन खाया।" इतना
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने चाण्डाल का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर किसी काम से उन्होने रास्ते
में खाने के लिए पायस और भात की पोटली ले रास्ता पकड़ा।
उसी समय में वाराणसी में एक माणवक था। नाम था शत्रपन्न।
उदीच्च गोत्र के महापाषाद् कुल में पैदा हुआ था। यह भी किसी काम से
रास्ते में खाने के लिए पायस या भात की पोटली बिना लिए ही निकल पड़ा।
[L13: उन दोनों की महामार्ग में भेंट हुई। माणवक ने बोधिसत्त्व से पूछा—
"तेरी जात क्या है?" उसने कहा-"मैं चाण्डाल हूँ' और माणवक से पूछा-
"तेरी जात क्या है?" "मैं उदीच्च ब्राह्मण हूँ।" "अच्छा, तो चलें" कह दोनों
ने रास्ता पकड़ा।
बोधिसत्त्व ने प्रातःकाल या भोजन करने के समय एक ऐसी जगह जहाँ
पानी की सुविधा थी, बैठ हाथ धो भात की पोटली खोल माणवक से पूछा—
"भात खाओगे?"
"रे चाण्डाल ! मुझे भात की जरूरत नहीं है।"
बोधिसत्त्व बोला "अच्छा।" फिर भात की पोटली को जूठा न कर,
अपनी आवश्यकता भर भात एक दूसरे पत्ते में डाल, पोटली को बाँध कर एक
ओर रख दिया। भोजन कर, पानी पी, हाथ पैर धो, चावल तथा शेष भात
ले माणवक से कहा "माणवक, चलें', और रास्ता पकड़ा।
वे सारा दिन चलकर, पानी की सुविधा की एक जगह में नहा कर बाहर
निकले।
बोधिसत्त्व ने आराम की जगह बैठ भात की पोटली खोल माणवक को बिना
पूछे ही खाना आरम्भ किया। दिन भर चलने से माणवक थक गया था और