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सर्वकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

दूसरा परिच्छेद
१. दळ्ह वर्ग
१५१. राजोवाद जातक
“दळ्हं दळ्हस्स खिपत्ति ...." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय राजा
को दिए गए उपदेश के बारे में कही। वह उपदेश तेसकुण जातक¹ में आएगा।
क. वर्तमान कथा
एक दिन कोशल-नरेश किसी पाप-कर्म सम्बन्धी ऐसे मुकद्दमे का जिसका
निर्णय करना आसान नही था, फैसला करके प्रात काल का भोजन कर चुकने
पर गीले हाथो ही अलंकृत रथ में बैठ शास्ता के पास गया। वहीं पुष्पित कमल
सदृश चरणो में गिर कर प्रणाम किया और एक ओर बैठा।
शास्ता ने पूछा—हन्त ! महाराज ! दिन चढ तुम कहाँ से आए ?
राजा—भन्ते ! आज पापकर्म संम्बन्धी एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका
निर्णय करना आसान नही था, फैसला करने में लगे रहने के कारण समय नहीं
मिला। अभी उसका फैसला कर, भोजन करके गीले हाथो ही आपकी सेवा
मे उपस्थित हुआ हूँ।
शास्ता—महाराज ! धर्म से, न्याय से, मुकद्दमे का फैसला करना शुभ-
कर्म है। यह स्वर्ग का मार्ग है। लेकिन इसमे आश्चर्य की क्या बात है यदि
तुम मेरे जैसे सर्वज्ञ से उपदेश लेते हुए भी धर्म से तथा न्याय से मुकद्दमे का फैसला
करते हो। आश्चर्य तो इसी मे है कि पूर्व के राजा लोग जिन्होने ऐसे पण्डितो
का ही उपदेश सुना जो सर्वज्ञ नही थे धर्म से तथा न्याय से मुकद्दमे के फैसले करते
¹ जातक (५२१)