जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 56 में से
संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की
धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि
अनेक प्रकार के वर्ण हैं। उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं।
संसार में विचरण कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभ
कर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है। विचार करने
वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य
है। वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं,
जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता
है। प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है। हे
नानक ! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता है॥ ३४ ॥
धरम खंड का एहो धरम ॥ ज्ञान खंड का आखहो करम ॥
केते पवण पाणी वैसंतर केते कान्ह महेस ॥
केते बरमे घाड़त घड़ीअह रूप रंग के वेस ॥
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥
केते देव दानव मुन केते केते रतन समुंद ॥
केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥
केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंत न अंत ॥३५॥
49 | P a g e sikhizm.com