सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो
सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व
अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३१॥
इक दू जीभौ लख होहे लख होवह लख वीस ॥
लख लख गेड़ा आखीअह एक नाम जगदीस ॥
एत राहे पत पवड़ीआ चड़ीऐ होए इकीस ॥
सुण गला आकास की कीटा आई रीस ॥
नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥३२॥
एक जिव्हा से लाख जिव्हा हो जाएँ, फिर लाख से बीस लाख हो
जाएँ। फिर एक-एक जिव्हा से लाख-लाख बार उस जगदीश्वर का
एक नाम उच्चारण करें, अर्थात् निशदिन उस प्रभु का नाम सिमरन
किया जाए। इस मार्ग से पति-परमेश्वर को मिलने हेतु बनी नाम
रूपी सीढ़ियों पर चढ़ कर ही उस अद्वितीय प्रभु से मिलन हो
सकता है। वैसे तो ब्रह्म-ज्ञानियों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर निकृष्ट
जीव भी देहाभिमान में अनुकरण करने की इच्छा रखते हैं। परंतु
गुरु नानक जी कहते हैं कि उस परमात्मा की प्राप्ति तो उसकी कृपा
से ही होती है, वरन् ये तो मिथ्या लोगों की मिथ्या ही बातें है ॥
३२ ॥
46 | P a g e sikhizm.com