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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

२१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-७
वाक्यार्थपरामर्शरूपो विमर्शः—इह इदानीं एष घटोऽस्ति इत्येवंरूपः, ततो हेतोः ये अभेदेन
एकस्वलक्षणताम् आप्ना न तु स्वरूपभेदम् उज्ज्हन्तः तेषाम् अन्याविशिष्टा समुदितरूपा अर्थक्रिया,
आभासविमर्शभेदे पुनरन्या नियता एकैकमात्ररूपा, आभासप्रतिभासशब्दाभ्यां सूत्रे विमर्शोऽपि
आक्षिप्तो मन्तव्यः, पुनःशब्दो विशेषद्योतकः काकाक्षिवत् उभयत्र योज्यः, बहुवचनेन ऐक्येऽपि
स्वरूपभेदापरित्याग उक्तः, तत्र च ऐक्यावभासे परतन्त्रं सत् पृथक्त्वं यदा आभासानां तदा
समानरूपव्यक्त्युपरञ्जकत्वेन पारमार्थिकं सामान्यरूपत्वम्, घटाभासस्य तु शुद्धस्य स्वतन्त्रपरामर्शे
योग्यतामात्रेण सामान्यरूपता न वस्तुतो—द्रव्यादन्यो हि सर्वः पदार्थः परतन्त्रतासारः, एवम्
एकोऽपि घटात्मा इत्यपि सत्यमेव—आभ सविमर्शार्थक्रियाबलेन तथा अवस्थापनात् इति ॥ ६ ॥
ननु एकेनैव अर्थक्रिया न तत्र, अपि तु आभाससमुदायात् अर्थक्रियासमुदायः, आभासाश्च
भिन्ना अपि यदि एकांम् अर्थक्रियां कर्तुं मिश्रीभवन्ति, तदा कस्तेषाम् इयत्तावधिः ? इति चोद्यम्
अपवदति—
पृथग्दीपप्रकाशानां स्रोतसां सागरे यथा ।
अविरुद्धावभासानामेककार्या तथैक्यधीः ॥ ७ ॥
पृथक् वर्तिन्यो याः प्रदीपस्य प्रभाः सूक्ष्मतमा अवलोकनसामर्थ्याधानलक्षणां याम् अर्थ-
क्रियां न कृतवत्यः तामेव एकभवनाभ्यन्तरं संमूर्च्छितात्मानो विदधते, न तत्र अर्थक्रियाणां
अनुप्राणित विमर्शरूप से करता है जैसे इस समय यह घट विद्यमान है; ऐसा कहा जाता है।
इसी हेतु से जितने भी अभेदात्मक आभास एकता को प्राप्त होकर अपने स्वरूप के भेद को
न छोड़ते हुए दूसरे से मिलते हुए समुदायरूप में अर्थक्रिया कराते हैं, आभास का विमर्श से भेद
होने पर तो दूसरे नियत एकरूप आभास प्रतिभास शब्दों से विमर्श का आक्षेप मात्र है—ऐसा
सूत्र में मानना होगा । यहाँ पर 'पुनः' शब्द का दोनों वाक्यों में काकाक्षिगोलक' न्याय से अन्वय
होता है । बहुवचन के द्वारा एकता होने पर भी स्वरूप भेद को नहीं छोड़ना होगा, इस प्रकार
वहाँ पर एकता के आभास में परतन्त्र होकर जब आभासों की पृथग्रूपता रहेगी तब तो समानरूप-
वाले व्यक्ति में उपरञ्जकत्व होने से सामान्यरूपता पारमार्थिक ही रहती है । इस प्रकार एक भी
घटरूप परामर्श सत्य ही है, आभास और विमर्श के द्वारा अर्थक्रिया करने के बल से वैसा ही
वह स्थापित होता है ।
अब शङ्का करते हैं कि एक आभास के द्वारा ही अर्थक्रिया नहीं होती है, किन्तु आभास
समुदाय से अर्थक्रिया समुदाय होता है और आभास भी भिन्न-भिन्नरूपों में रहते हुए एक अर्थक्रिया
करने के लिए मिल जाते हैं, तब फिर उनकी इयत्ता ( संख्या ) की अवधि क्या होगी ? इस शङ्का
का अपवाद ( खण्डन ) करते हैं—
अलग-अलग स्वयं प्रकाशित प्रदीप जैसे सरिताएँ सागर में जाकर एक हो जाती हैं । उसी
प्रकार अविरुद्ध ( समान ) अनेक आभास एक कार्य के लिए एकता को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
भिन्न-भिन्न प्रदीप की प्रभा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर देखने में असमर्थ होकर जिस अर्थक्रिया को
नहीं कर सकती वही यदि सब एक में मिल करके विस्तृत प्रकाश कर देती है, तो सूक्ष्म से भी
सूक्ष्मतम पदार्थ को दिखा सकते हैं, वहाँ पर अर्थक्रिया का समुदाय तो नहीं होता, उसी प्रकार

अ.-२, आ.-३, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २१५
समुदायोऽस्ति, सागरपतितानि च स्रोतांसि बहुतरङ्गारम्भार्थक्रियाकारीणि, तद्वत् घटः काञ्चनो
लोहितः ततोऽयम् शिवलिङ्गशिरः समावर्जनोचितसलिलाहरणार्थक्रियोचितो दृष्टमात्र एव तीव्र-
प्रीतिलक्षणार्थक्रियाकारी, इति—सिद्धमेवार्थक्रियाकारित्वम्, यत् पुनराभासानां मिश्रणे का
सीमा इति ? तत्र उच्यते—येषाम् अविरोधः त एव आभासा मिश्रीभवन्ति, नहि रूपाभासो
मारुताभासेन मिश्रीभवति—विरोधात्, सोऽपि च नियतिशक्त्युत्थापितः—पृथक् ये दीपप्रकाशाः
तेषां सम्बन्धि यदेकं सागरे स्रोतसां च यदेकं वस्तु तेन कार्या यथा ऐक्यधीः तथा अविरुद्धा ये
अवभासा घटलोहितकाञ्चनादयः तेषां सम्बन्धि यदेकं स्वलक्षणं तत्कार्या ऐक्यधीरिरिति सम्बन्धः,
ऐक्यधिया—प्रतिभासो विमर्शोऽर्थक्रिया च इति स्वीकृतम् ॥ ७ ॥
ननु एवं प्रत्याभासं प्रमाणस्य विश्रान्तत्वात् अग्न्याभासे अग्निज्ञानं प्रमाणं धूमज्ञानं च
धूमाभासमात्रे कार्यकारणभावावभासोऽपि तावन्मात्रे, ततश्च धूमाभासोऽपि अग्न्याभासं व्यभि-
चरेत् इत्यादिबहुपप्लवप्रसङ्गः ? इति शङ्कां व्यपोहितुम् आह—
तत्राविशिष्टे वह्न्यादौ कार्यकारणतोष्णता ।
तत्तच्छब्दार्थताद्यात्मा प्रमाणादेकतो मतः ॥ ८ ॥
तत्रेति—प्रत्याभासं प्रमाणं विश्राम्यति, इत्यस्मिन्नपि पक्षे न कश्चित् दोषः, तथाहि—
सागर में गिरी हुए सभी नदियाँ मिल कर एक तरङ्ग तथा बहुत प्रकार के भी अर्थक्रियाकारिरूप
तरङ्ग किया करती हैं। इसी प्रकार शिवलिङ्गाकार घट स्वर्ण का हो या चाहे तांबे का हो जलाहरण
रूप कार्य तो करतो ही है, इसीलिए अनेक आभासों का अर्थक्रिया करना सिद्ध ही है। आभासों
के मिश्रण में क्या अवधि होनी चाहिए ? इसका यह उत्तर है कि जिन आभासों में विरोध नहीं
हैं वे ही आभास आपस में मिलते हैं। जैसे रूपाभास, मारुताभास से नहीं मिलता; क्योंकि इन
दोनों में परस्पर विरोध है। वायु में रूप का अभाव मिलता है और वह भी विरोध नियति-शक्ति
से उठाया गया है। भिन्न-भिन्न रूपों में होनेवाले दीप प्रकाशों के सम्बन्धी, जो कि एक सागर में
या गृह में वस्तु को प्रकाशित करता है उनसे अविरुद्ध होकर ही प्रकाश करता है, इसी प्रकार
यहाँ घट में लोहित एवं काञ्चन इत्यादि जो कुछ आभास हैं वे भी एक कार्य को सम्पादन करने
के लिए आपस में एकताबुद्धि उत्पन्न कर देते हैं, इसीलिए एकता की बुद्धि से प्रतिभास, विमर्श
और अर्थक्रिया इन तीनों विषयों को स्वीकृत किया गया है ॥ ७ ॥
प्रत्येक आभास में प्रमाण की विश्रान्ति को माना जाय, तो अग्नि के आभास में अग्नि
का ज्ञान प्रमाण होगा और धूम के आभास में धूम का ज्ञान प्रमाण होगा, इसी प्रकार कार्य-
कारणभाव के आभास में कार्य-कारण का ज्ञान प्रमाण होगा, इस प्रकार भिन्न-भिन्न होने के
कारण धूमाभास, अग्नि-आभास का व्यभिचारी हो जायेगा। ऐसे तो बहुत से व्यभिचार उपस्थित
होंगे ? इस शङ्का के समाधान करने के लिए अब कहते हैं कि—
सामान्यतः वह्नि आदि में कार्य-कारणभाव और ऊष्णता उन-उन शब्दों की अर्थता अर्थात्
अभिधेयता एवं गन्ध-रस शून्यता आदि से युक्त स्वभावता वह्नि में एक ही प्रमाण से माननी
पड़ेगी ॥ ८ ॥
प्रत्याभासों में प्रमाण सीमित होता है, इस पक्ष में भी कोई दोष नहीं है—देखो, वह्नि

२१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-८
अविशिष्टो यद्यपि वह्न्याभासो देशकालाभासप्रमुखैः आभासैः असंकीर्णत्वेन सामान्यमात्ररूपत्वात्
तथापि स एव आभासो यावद्भिूराभासैरविनाभूतो भगवत्या नियतिशक्त्या नियमितः तावतोऽव-
भासान् स्वीकृत्यैव प्रमाणकृतां निश्चयपदवीम् अवतरति, तथा च—वह्याभास इन्धनकार्यत्वा-
भासेन धूमकारणताभासेन उष्णस्वभावताभासेन च स्वाभाविकाव्यभिचरितसाहचर्यः प्रतीयमानो
विश्वत्रैव सर्वदैव च तथा प्रतीतो भवति—एकत्वात् तस्य, अस्वाभाविकोऽपि यः स्वभावः
पुरुषकृतसमयादिमुखप्रेक्षी, तद्यथा—अग्निशब्दवाच्यत्वं घटप्रतिपत्तिकारित्वमित्येवमादिः, सोऽपि
एकप्रत्यक्षादेव निश्चीयते, तस्य हि प्रमातुः कृत्रिमेण इतरेण वा रूपेण—आभासान्तरनान्तरीय-
कतया असौ वह्न्याभासः संविदितः सर्वदेशकालगतः तथैव संविदितः, इति तत्र किं
प्रमाणान्तरेण—तस्य तस्य यथेच्छं पुरुषसमयेन नियुज्यमानस्य शब्दस्य अर्थोऽयं ज्वलद्भास्वराकार
आभास इत्यनेन नियतिशक्तिरेव सर्वत्र शरणम् इति पिशुनयति, एतदुक्तं भवति—यत्किंचित्
कृत्रिमम् इतरद्वा भावाभासस्य आभासान्तरेण नान्तरीयकत्वं प्रतिभाति तत्र नियतिशक्तिमात्रमेव
परं विजृम्भते, तत्तु नियतिशक्तिरूपं पूर्वापरविततकालम्—इन्धनकार्यत्वे धूमकारणत्वे उष्णस्व-
भावत्वे च आभासमाने, अनतिचिरकालं तु वह्न्यादिशब्दवाच्यत्वाभासादाविति विशेषः, ततश्च
नियतिशक्त्युपजीवनेन धूमाभासोऽपि अग्न्याभासाव्यभिचारी इति न कश्चित् विप्लवः, कार्यता
कारणता उष्णता च तस्य तस्य शब्दस्यार्थता तत्तच्छब्दाभिधेयता, आदिग्रहणात्—गन्धरस-
सामान्यरूप है; क्योंकि देश-कालादि के आभासों से असङ्कीर्ण है वह सामान्यरूप से ही रहती है,
फिर भी वह आभास जितने आभासों से संमिलित रहता है यह भगवती नियति-शक्ति से आबद्ध
रहता है और उन नियमित आभासों को प्रमाण करनेवाले के लिए निश्चयपदवी को प्राप्त करता
है। वह्नि का जो आभास इन्धन है उसका कार्य होने के कारण, उसके आभास के साथ धूम के
कारणताभास से और ऊष्ण स्वभाव के आभास से स्वाभाविक अव्यभिचरित इन सबों का आभास
रहता है इस प्रकार सर्वत्र प्रतीयमान होकर प्रतीत होता है। अस्वाभाविक भी पुरुष कल्पित
समयादिक की अपेक्षा करनेवाला ही होता है। जैसाकि अग्नि शब्द का वाच्य घट सम्बन्धी ज्ञान
कराने में कारण नहीं होता, वह भी प्रत्यक्ष से ही निश्चित किया जाता है, उसका प्रमाता चाहे
कृत्रिम हो या अकृत्रिम हो; दूसरे आभास से अवश्य संमिलित होने के कारण वह वह्नि का
आभास सब देश-काल में व्याप्त होकर वैसा ही ज्ञात होगा। अतः वहाँ फिर दूसरे कोई प्रमाण
की आवश्यकता नहीं रहती, उन-उन आभासों को पुरुष नियम के अनुसार इच्छानुकूल नियोग
करना इस शब्द का यही अर्थ है कि चमकता हुआ आभास अर्थात् भास्वर आकार है, इससे
सर्वत्र नियति-शक्ति का ही शरण सूचित होता है।
इसका तात्पर्यार्थ यह है कि जो कुछ कृत्रिम या अकृत्रिम भावाभास के साथ दूसरे आभास
संयुक्त होकर प्रतिभासित होता है और इसमें नियति-शक्ति का ही सामर्थ्य रहता है, वह नियति-
शक्ति पूर्वापर नियमकाल की अपेक्षा करके इन्धन कार्य, धूम कारण और उष्णस्वभाव में
आभासित होने पर शीघ्र ही वह्नि शब्द के वाच्य आभास में विशेषरूप से भासित होती है,
इसीलिए नियति-शक्ति के जीवन से धूमाभास भी अग्नि के आभास से व्यभिचरित नहीं होता,
इसमें भेद नहीं है, कार्यता, कारणता और उष्णता उन-उन शब्दों का अर्थ और उन-उन का
अभिधान ( कथन ) आदि ग्रहण करने से गन्ध-रस से शून्यता और ऊर्ध्वादि दिशाओं से संयोग

अ.-२, आ.-३, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१७
शून्यता ऊर्ध्वदिक्संयोगिता जलविरोधिता च, इत्येवं-भूतो य आत्मा स्वभावो वह्न्यादौ स
एकस्मादेव प्रमाणात् मतः—संविदित इति यावत्, ‘अर्धेच्छेदः’ इति, काव्ये अयं समयो, न ग्रन्थे,
इति—द्वितीयतृतीयपादयोः सामस्त्येऽपि अदोषः, पृथग्भावप्रत्ययप्रयोगो—वस्त्वन्तरापेक्षानपेक्षातः
कृतकत्वाकृतकत्वाभ्यां वर्गभेदं सूचयितुम् ॥ ८ ॥
एवं भावस्वभावव्यवस्थापनं प्रत्याभासविश्रान्तेन एकेनैव प्रमाणेन क्रियते, तेषामपि
आभासानां यथोचितं यत् अन्योन्यानान्तरीयकतवं तत् एकेन संवेदनरूपेण तदनेकप्रमिताभास-
विषयपूर्वप्रवृत्तसंवेदनकलापानुप्राणकान्तर्मुखस्वरूपेण निश्चीयते, तच्च ऐक्याभासमात्रे अनु-
संधानरूपं प्रमाणं, अनुसन्धीयमानेषु तु आभासेषु गृहीतग्राहित्वात् अप्रमाणं, तत्र तु प्रत्येकं
प्राच्यमेव प्रमाणं, भावस्वभावव्यवस्थापनात्मकमानसप्रवृत्त्यतिरिक्तकायप्रवृत्त्युपयोगस्तु यथा
प्रमाणाविषयः तं प्रकारं दर्शयितुम् आह—
सा तु देशादिकाध्यक्षान्तरभिन्ने स्वलक्षणे ।
तात्कालिकी प्रवृत्तिः स्यादर्थिनः…………………
बाह्या तावत् अर्थक्रिया स्वलक्षणतः, स्वालक्षण्ये च देशकालाभासयोजनस्यैव अन्तरङ्गत्वम्
तत्रापि च विशेषरूपतापि परामर्शं विना न किंचित्, परामर्शद्वारेण तु प्रमातरि विश्राम्यन्ती,
प्रमातुः संवेदनैकरूपस्य देशकालायोगेन ऐक्यात् अभ्युज्झत्येव विशेषरूपताम्, इति—सर्वत्र
और जल से विरोध इत्यादि जितने भी वह्नि के विरोधी भाव हैं वे सभी एक ही प्रमाण से
विदित हो जाते हैं, 'अर्धेच्छेदः' आधे पाद में भेद है; यह काव्य का नियम है, ग्रन्थ में नहीं होता
है, द्वितीय-तृतीय पाद में समास होने पर भी कोई दोष नहीं होता, भाव में जो प्रत्यय लगाया
गया है वह पृथग्रूप से तो दूसरी वस्तु की अपेक्षा और अनपेक्षा की विवक्षा को लेकर कृतकत्व
एवं अकृतकत्व के भेद दिखाने के लिए ही है ॥ ८ ॥
इस प्रकार भाव-स्वभाव की व्यवस्था करना प्रत्याभास में विश्रान्त होनेवाले एक ही
प्रमाण से होता है, उन आभासों का भी आभासों में यथोचित एकता के द्वारा पूर्व से आनेवाले
ज्ञानसमूह से अनुप्राणित होकर अन्तर्मुख स्वरूप से निश्चय करना चाहिए और वह संवेदन
एकता के आभास में केवल अनुसन्धानरूप प्रमाण ही होता है, उनसे अनुसन्धान किये गये
आभासों में गृहीतग्राही होने के कारण अप्रमाणता आ जाती है; क्योंकि वहाँ पर पूर्व के ही
प्रत्येक प्रमाण को माना जाता है। भाव स्वभाव की व्यवस्था करनेवाली मानसिक प्रवृत्ति भी
अतिरिक्त शरीर प्रवृत्ति से भिन्न होती है, उसके प्रमाण विषयक प्रकार दिखाने के लिए अब
कहते हैं—
वह अर्थक्रिया देश-कालादि के ज्ञान से भिन्न रह कर अपने लक्षण में रहती है, उसकी
उस काल में प्रवृत्ति का होना अर्थ के इच्छुक के अनुमान से है ॥ ९ ॥
बाहरी अर्थक्रिया तो अपने लक्षण से होती है और वह अपने लक्षण में देश-कालादि के
आभास की योजना से अन्तरङ्गरूप में रहती है। उसमें भी विशेषरूपता के परामर्श से भिन्न
दूसरा कुछ नहीं है; परामर्श के द्वारा तो प्रमाता में विश्राम लेनेवाली अर्थक्रिया प्रमाता के ज्ञान
से देश-काल से युक्त होकर विशेषरूपता को छोड़ती हुई ऐक्यभाव को प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार
२८

२१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-९
अद्वयं परमार्थतः, तथापि तु या विशेषरूपता भाति तस्याः परमेश्वरस्वातन्त्र्यमेव निमित्तं यत्,
'मायाशक्तिः' इत्युच्यते, तत्र विशेषसाध्यार्थक्रियाविशेषेण योऽर्थी तस्य या स्वलक्षणे तस्मिन्
विशेषरूपे अर्थे तत्कालभाविनी वाङ्मनःकायप्रवृत्तिः सा देशे, आदिग्रहणात् काले स्वरूपान्तरे,
स्वरूपाऽनुसन्धानादौ च यानि अध्यक्षान्तराणि बहूनि प्रत्यक्षाणि तेषां भिन्ने भेदे निमित्ते सति
भवति, न अन्यथा, न ऐकैकतः प्रमाणात् सा प्रवृत्तिः अपि तु प्रमाणसमूहादेव, समूहता च
परस्य न उपपन्ना; अस्माकं तु एकस्वसंवेदनविश्रान्तिमयी सा युज्यते, —इति उक्तं प्राक् 'न
चेदन्तःकृता........' । (२।३।७) इत्यत्र । इयमेव च सा प्रमाणानां योजना योजिका च
युक्तिरित्युच्यते गन्धद्रव्यादियुक्तित्वात, एवं प्रत्यक्षसमूहादेव प्रवृत्तिरिति तात्पर्यम् । देशादिकेष्वपि
अध्यक्षेषु सत्सु देशाभासयोजनायामपि अन्तः प्रमातरि अभिन्नं यत् स्वलक्षणं तत्र,—इति वा
संगतिः । देशादिकैरध्यक्षान्तरैः प्रत्यक्षभूतैराभासान्तरैर्भिन्ने स्वलक्षणे निमित्ते सति प्रवृत्तिः,—
इति वा योजना । अत्रापि प्रमेयबहुत्वनिरूपणदिशा तदनुयायित्वेन अभिधीयमानः प्रमाणसमूहो
निमित्तत्वेन उक्तो भवति ।
ननु किं प्रात्यक्ष्यामेव प्रवृत्तौ प्रमाणसमूह उपयोगी ? न, इत्याह—
.................................... 'अप्यनुमानतः ॥ ९ ॥
न केवलं प्रत्यक्षतः प्रवृत्तिः देशादिकाध्यक्षान्तरभेदरूपप्रमाणसमूहनिमित्ता, यावत्
सर्वत्र परमार्थरूप से अद्वैत का ही बोध होता है, फिर भी वहाँ पर जो विशेषता भासती है उसका
परमेश्वर के स्वातन्त्र्य में निमित्त है, जिसको 'माया-शक्ति' के नाम से पुकारा जाता है । उस
माया-शक्ति के द्वारा निर्मित विशेषरूप में विशेष साध्य अर्थक्रिया विशेषण से ही जो अर्थी होता
है उसके विशेषरूप अर्थ में तत्काल होनेवाली मन, वचन और शरीर की प्रवृत्ति देश में तथा
काल में व दूसरे स्वरूप में और स्वरूप के अनुसन्धान में, जितने-जितने प्रत्यक्ष होंगे, उन सभी
प्रत्यक्षों के भिन्न-भिन्न निमित्त होने पर भी भेद होंगे, अन्यथा नहीं होंगे । एक-एक प्रमाण से
प्रवृत्ति नहीं होती है किन्तु प्रमाण समूह से ही होतो है, वह प्रमाण समूह दूसरे को नहीं ज्ञात
होता, वह तो एक ज्ञान में ही विश्रान्त होता है—यह पहले ही कह चुके हैं ।
'न चेदन्तःकृता.....' (२.३.७) इस स्थल में और यही प्रमाणों की योजना है, इसकी
योजना करनेवाली युक्ति कही जाती है गन्ध द्रव्यादि की भाँति, इस प्रकार अनेक प्रत्यक्ष प्रमाणों
से ही प्रवृत्ति होती है—यही तात्पर्य है । देश-कालादि से प्रत्यक्ष होनेपर भी देशाभास की योजना
में प्रमाता का अभिन्न अपना लक्षण ही प्रमाण होता है, ऐसी भी सङ्गति लगाई जा सकती है
या देश-कालादि के भिन्न-भिन्न ज्ञान होनेपर प्रत्यक्ष किये गये भिन्न-भिन्न आभासों के द्वारा अन्य
स्वलक्षण रहने पर प्रवृत्ति होती है—ऐसी भी योजना हो सकती है। यहाँ पर भी प्रमेयों के
बहुत से निरूपण के द्वारा उनके अनुयायीरूप से अभिधीयमान प्रमाण समूह निमित्त होते हैं—
यह कहना होगा ।
इस पर शङ्का खड़ी करते हैं कि क्या प्रत्यक्ष में ही प्रमाणों के समूह का उपयोग होता
है ? नहीं, यह बात नहीं है—
किन्तु अनुमान से भी प्रत्यक्ष में प्रमाणों के समूह का उपयोग होता है ॥ ९ ॥
केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से ही प्रवृत्ति नहीं होती है; जिसमें देश-कालादि दूसरे प्रत्यक्ष आदि

अ.-२, आ.-३, का.-१०-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१९
अनुमानतोऽपि तथैव, धूमाभासमात्रे अग्न्याभासमात्रे धूमस्याग्न्याभासाव्यभिचारित्वे पर्वताभासे
च यानि प्रत्यक्षान्तराणि यच्च तद्गृहीतातिरिक्ते अयोगव्यवच्छेदे 'अग्निरत्र' इत्येवं-भूते पृथक्
अनुमानं प्रमाणम् तत्समूहादेव अर्थिनः तात्कालिकी प्रवृत्तिः, —इति सम्बन्धः ॥ ९ ॥
एवं विमर्शबलादेव भेदाभेदव्यवस्था, तदेव हि परमेश्वरस्य संवेदनात्मनः शिवनाथस्य
स्वातन्त्र्यशक्तिविजृम्भितं; ततश्च परैः यत् उच्यते 'दूरान्तिकादौ अर्थस्य अभेदः' इति तदपि
उपपद्यते, न तु अन्यथा कथंचित्,—इति निरूप्यते—
दूरान्तिकतयार्थानां परोक्षाध्यक्षतात्मना ।
बाह्यान्तरतया दोषैर्व्यञ्जकस्यान्यथापि वा ॥ १० ॥
भिन्नावभासच्छायानामपि मुख्यावभासतः ।
एकप्रत्यवमर्शाख्यादेकत्वमनिवारितम् ॥ ११ ॥
प्रतिभासमात्रेण व्यवस्थां कुर्वतः कथं दूरादूरयोर्वस्तुनोरभेदः, ? प्रतिभासस्य सकलासकला-
वृतानावृतादितया यथाकथंचिदपि भेदात् । ननु विमर्शेऽपि प्रत्याभासं तथैव भिन्नता, ? सत्यं;
तथापि तु परो यो विमर्शः स एवायं पदार्थ,—इति एकप्रत्यवमर्शरूपः; तेन प्राणितकल्पेन
भेद प्रमाण समूह निमित्त होते हैं, वहाँ पर अनुमान से भी प्रवृत्ति होती है। उसमें भी प्रमाण
समूह का उपयोग होता है। जैसे धूमाभास मात्र में, अग्नि के आभास मात्र में, धूम अग्नि के
आभास से अव्यभिचरित होने में इस प्रकार पर्वताभास में भी जितने भी भिन्न-भिन्नरूप से प्रत्यक्ष
होते हैं, अयोगव्यवच्छेद में जैसे 'अग्निरत्र' अर्थात् यहाँ पर अग्नि है जिसमें पृथक् अनुमान प्रमाण
होता है, उसमें प्रमाण समूह से अर्थी की तात्कालिक प्रवृत्ति होती है—ऐसा सम्बन्ध लगाना
होगा ॥ ९ ॥
एवं विमर्श के बल से ही भेद और अभेद की व्यवस्था होती है, उसको ज्ञानस्वरूप
शिवनाथ परमेश्वर की स्वातन्त्र्य-शक्ति का विकास कहा जाता है; इस विषय में दूसरे लोगों का
कहना कि—'दूरान्तिकादौ अर्थस्य अभेदः' अर्थात् दूर एवं समीप में अर्थ का अभेद होता है—
ऐसा ही ठीक बैठता है; नहीं तो, किसी प्रकार भी व्यवस्था की संभावना नहीं बन सकेगी—इस
बात का निरूपण किया जा रहा है—
अर्थों के दूर और समीप होने के कारण प्रत्यक्ष प्रमाणरूप से या बाहर एवं आन्तर के
दोषों से व्यक्त न होने के कारण भिन्नरूप से अवभासित होने की छाया को मुख्य अवभास से
ही सिद्धि मान लेनी चाहिए। एक प्रत्यवमर्शन से एक की ही सिद्धि होती है ॥ ११ ॥
जब प्रतिभासमात्र से व्यवस्था करेंगे तो दूर और समीप में होनेवाले भाव-पदार्थों का
अभेद कैसे हो पायेगा ? प्रतिभास तो समूहरूप से या अल्परूप से होने न होने के कारण यथा
कथञ्चित् भी भेद तो हो सकता है। अब शङ्का करते हैं कि विमर्श में भी प्रत्याभास की भिन्नता
ऐसी ही रहेगी ?
यह ठीक है; फिर भी वह दूसरा विमर्श ही यह पदार्थ सिद्ध करेगा, जो कि एक प्रत्यवमर्श-
रूप है, उसी जीवित कल्प के द्वारा सर्वत्र फैला देना ही मुख्य आभास का या एक रूप भाव के
आभास का एक प्रत्यवमर्श कहा जाता है। वह उसके योग्य न होता हुआ भी भिन्नाभास छाया-

२२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१२
आसमन्तात् ख्यानं प्रथनं यस्य मुख्यावभासस्य एकरूपभावाभासस्य, एकप्रत्यवमर्शोऽतदुच्चितोऽपि हि
अस्त्येवैकावभासः, आभासविमर्शयोरन्योन्यमवियोगात्; तस्मात् मुख्यावभासादेकत्वमप्रतिहत-
मास्ते। यदेवानुमितं तदेव दृष्टम्,—इत्यत्र प्रत्यक्षपरोक्षतारूपेणात्मना स्वभावेन भिन्ना अवभा-
सच्छाया अमुख्योऽवभासो येषां तेषाम् एकत्वं मुख्यावभासत एकप्रत्यवमर्शानुप्रणितात्,—इति
संगतिः। बाह्यान्तरतया भिन्नावभासानामैक्यं यथा—यदेव दृष्टं तदेवान्तरहमुल्लिखामि,—इति।
व्यञ्जकानां दीपालोकादीनां दोषैर्भिन्नावभासानाम् ऐक्यं, यदेव रक्तोत्पलं दीपेन नीलं दृष्टं तदेव
सूर्यांशुभिर्लोहितं पश्यामि,—इति। अन्येन वापि प्रकारेण इन्द्रियापाटवादिना एकपार्श्वसंमुखत्वा-
दिना वा येषामवभासच्छाया भिन्ना, तेषामपि मुख्यप्रत्यवमर्शानुवर्त्यवभासस्वरूपबलात् ऐक्य-
मेव,—इति स्थितम् ॥ १०-११ ॥
ननु दूरादूरादावस्तु स एवार्थः प्रमात्रध्यवसितार्थक्रियांशे तथैवोपयोगात्, बाह्यान्तरत्वादौ
कथम् आन्तरस्यार्थक्रियायां प्रमात्रध्यवसितायामनुपयोगात् ? — इति भ्रान्तिं भङ्क्तुमाह—
अर्थक्रियापि सहजा नार्थानामीश्वरेच्छया ।
नियता सा हि तेनास्या नाक्रियातोऽन्यता भवेत् ॥ १२ ॥
इह 'कार्यकारणतोष्णता' ( २।३।८ ) इत्यत्र स्वरूपमिवार्थक्रियापि या मध्ये गणिता, सा
सहजार्थस्वरूपभूता न भवति; तत्कारित्वं हि यस्मात् ईश्वरेच्छया नियतं भवने चाभवने च । यतो
नैषा स्वरूपं, तेन तस्या अकरणात् हेतोर्भावस्यान्यत्वं नाशङ्कनीयं, स्वरूपभेदात् हि संभाव्येता-
रूप रहता है; क्योंकि आभास और विमर्श का परस्पर वियोग नहीं रहता है। इस बात को लोक
व्यवहार में भी देखा जाता है कि जो अनुमान से किया गया था, उससे ही देखा गया है। यहाँ
पर प्रत्यक्ष और परोक्षरूप स्वभाव से भिन्न होते हुए भी अवभास की छाया ( अमुख्यावभास )
जिनका होगा वैसा वही मुख्यावभास का एकत्वरूप प्रत्यवमर्श कहा जाता है या अनुप्राणित
होता है—ऐसी सङ्गति बैठती है। जो मैंने देखा था उसीका अन्तःकरण में उल्लेख करता हूँ;
यही भिन्न अवभासों की एकता है, पदार्थों को दिखानेवाले प्रदीप का आलोक आदि के दोष से
भिन्न-भिन्न अवभासों की भी एकता होती है जैसे—दीप से रक्तकमल को नीलकमल देखते हैं,
उसीको सूर्य रश्मियों से रक्त मैं देखता हूँ, इत्यादि। दूसरे प्रकार से भी इन्द्रियों में भेद होने से
या एक भाग सन्मुख होने से जिनके आभास की छाया भिन्न दिखायी देती है, उनकी भी मुख्य
प्रत्यवमर्श के पीछे चलनेवाले अवभास बल से एकता हो जाती है, यही स्थिर होता है ।।१०-११।।
अब शङ्का करते हैं कि दूर और समीप में प्रमाता के अभीष्ट क्रियांश उपयोगी होने के
कारण वही अर्थ रहे, किन्तु भीतर और बाहर में तो उपयोग न होने के कारण कैसे भ्रान्ति ही
रहेगी ? इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए कहते हैं कि अर्थों की क्रिया स्वाभाविक नहीं होती,
किन्तु ईश्वर की इच्छा से ही अर्थों की क्रिया नियत होती है। इसीलिए प्रमाता की क्रिया से
अर्थक्रिया अन्यथा नहीं हो सकती ।। १२ ।।
कार्यकारणोष्णता ( २-३-८ ) इस कारिका में जब कि स्वरूप के समान अर्थक्रिया को
भी बीच में गिना है, वह स्वभाव से नहीं हो सकती; उसके होने और न होने में ईश्वर की इच्छा
ही कारण होती है; क्योंकि ऐसा उसका स्वरूप नहीं है, इसीलिए प्रमाता उसको नहीं कर

अ.-२, आ.-३, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२१
न्यत्वं, न च स्वरूपम् अर्थक्रियाकारित्वम्, — इत्युक्तं वक्ष्यते च बहुशः। स्वरूपं च प्रत्यवमर्शबलादे-
कमेव बाह्यान्तरादावपि, —इति ॥ १२ ॥
ननु विमर्शबलादेव यदि वस्तूनां भेदाभेदव्यवस्था तर्हि इदानीं त्रिजगति निवृत्ता भ्रान्ति-
संकथाः, शुक्तिकायामपि सत्यरजततैव आपतति ‘इदं रजतम्’ इति विमृश्यमानत्वात्; ततश्च
भ्रान्त्यभावे बाधानुपपत्तेः किमर्थमुक्तं ‘मितिर्वस्तुन्यबाधिता’ ( २।३।२ ) इति । व्यभिचाराभावे
हि ‘अबाधिता’ इत्यस्य विशेषणस्य व्यवच्छेद्यं न लभ्यते, — इत्याशङ्कां निरस्यति—
रजतैकविमर्शोऽपि शुक्तौ न रजतस्थितिः ।
उपाधिदेशासंवादाद्विचन्द्रेऽपि नभोऽन्यथा ॥ १३ ॥
‘इदं रजतं स्थिरं सर्वप्रमातृसाधारणम् अर्थक्रियायोग्यम्’ इति इदमंशे रजताद्यंशेषु तत्संमे-
लतांशे च आभासविमर्शनबलात् न तावत् किंचित् मिथ्यात्वं, किंतु उत्तरकालं यो भविष्यति
विमर्शो ‘नेदं रजतं वस्तु स्थिरं प्रमात्रन्तरगम्यमभिमतकार्यकारि’ इति, तद्विमर्शविमर्शनीयं यत्
तत्पूर्वविमर्शकालसमुचितमेव रूपं तत् तस्मिन् पूर्वविमर्शकाले नैवामृश्यते, भाव्यं च तेनामर्शनी-
येन । तत्रैव काले ‘नेदं रजतं हि अभूत’ इति हि उत्तरः परामर्शो, न तु उदितप्रत्यस्तमितायां शत-
ह्रदायामिव इदानीमेव ‘इदं न’ इति विमर्शः; ततो यावता पूर्णेन रूपेण प्रख्यातव्यं विमर्शपर्यन्तं
सकता, इस हेतु से कार्य भिन्न नहीं हो सकता, स्वरूप भेद से वह अन्यथा दिखता है। अर्थ-
स्वरूप अर्थक्रियाकारिता नहीं हो सकती, यह हमने पूर्व में भी कहा है एवं आगे भी बहुत प्रकार
से कहेंगे। प्रत्यवमर्श के बल से एकमात्र संविद्रूप ही बाहर और भीतर दिख पड़ता है—यही
सत्य है ॥ १२ ॥
क्या तब विमर्श के बल से ही वस्तुओं में भेद और अभेद की व्यवस्था होती है, यह यदि
माना जाय तो फिर इस समय तीनों लोकों में भ्रान्ति की कथा ही समाप्त हो जायेगी। शुक्ति में
भी सत्यरूप से रजत ही भासित होगा; क्योंकि यह रजत है—ऐसा ही परामर्श होता है; तब
तो फिर कहीं पर भी भ्रान्ति नहीं होगी, अतः भ्रान्ति के न रहने पर बाधा की उपपत्ति नहीं हो
सकती, फिर क्यों—कहा कि प्रमा वस्तु में बाधक नहीं होती इत्यादि; व्यभिचार के अभाव में
‘अबाधिता’ इस विशेषण का व्यवच्छेदक कुछ भी नहीं होगा—इस शङ्का को दूर करते हैं—
रजत का आभास होने पर भी शुक्तिका में रजत की स्थिति नहीं होती; क्योंकि आगे
चल करके उसका बाध हो जाता है। उपाधिदेश में न मिलने के कारण जैसे आकाश में
‘द्विचन्द्रः’ दो चन्द्रमा का बाध हो जाता है वैसा ही उसका भी बाध हो जाता है ॥ १३ ॥
यह रजत स्थिर है—ऐसा सभी प्रमाताओं को साधारण अर्थक्रिया की योग्यता प्रतीत
होती है। ‘इदम्’ अंश में रजतादि अंश मिला देने पर आभास एवं विमर्श के बल से तो मिथ्यात्व
नहीं झलकता, किन्तु उत्तरकाल में यह रजत नहीं है इसका बाध हो जाता है, प्रमाता का
यह स्थिर जो विमर्श होगा, वह पूर्वकाल विमर्श काल के अनुरूप नहीं होता; क्योंकि स्वर्णकार
ने यह कह दिया है कि यह रजत नहीं है, जैसे विद्युत् चमकती है, उसी प्रकार यह विमर्श सहसा
नहीं हुआ है; यह विमर्श बहुत सोच-समझ कर भली भाँति खण्डन करने योग्य है। जब तक यह

२२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१३
तावत् न प्रख्याति, —इत्यपूर्णख्यातिरूपा अख्यातिरेव भ्रान्तितत्त्वम् । तद्दशेन असद्विपरीतानिर्वा-
च्यादिख्यातयोऽपि उच्यन्ताम् ।
ननु सत्यरूप्यज्ञानमपि अपूर्णख्यातिः ततस्तर्हि किम् ? । इदम् अतः सर्वं भ्रान्तिः,—इत्या-
गच्छेत् । दिष्ट्या दृष्टिरुन्मिन्मीलिषति आयुष्मतः, मायापदं हि सर्वं भ्रान्तिः, तत्रापि तु स्वप्ने
स्वप्न इव गण्डे स्फोट अपरेयं भ्रान्तिरुच्यते, अनुवृत्त्युचितस्यापि विमर्शस्यास्थैर्यात् । अतश्च पृथक्
इदन्ताद्याभासेषु न काचन भ्रान्तिः, मेलनांशे तु विमर्शनुवृत्तिनिर्मूलनं विमर्शोदयकालादेव आरभ्य
बाधकेन क्रियते, इति तत्रैव भ्रान्तिभावः,—इति सिद्धम् । रजतस्य शुक्तिकया सह यद्यपि एको
विमर्शः, तथापि शुक्तौ रजतस्य तेन ज्ञानेन या दत्ता स्थितिः 'इदं रजतम्' इति, सा न; यत उपा-
धिरूपो यो देशः 'अत्र रजतम्' इति रजतच्छायाम् आत्मनोपरञ्जयन् शुक्तिदेशः, तस्यासंवादात्
सम्यग्विमर्शनानुवृत्त्याभासनं संवादनं, 'वदिः' अत्र भासनविषयः, तस्याभावात् कारणात् ।
नन्वेवं भवतु शुक्तिकारजते, द्विचन्द्रज्ञाने तु 'द्वौ चन्द्रौ' इत्याभासे शुक्तिकयेव मेलनं न
केनचित्साकमाभासते, यत्र बाधः स्यात्; एकाभासांशे च न बाधः,—इत्युक्तं भवतैव । क एतदाह-
मेलनं न केनचित्सह—इति । एवं हि सति स्वालक्षण्येन नियतदेशकालतया कथमाभासः; ? तद्देश-
कालाभ्यां सह तत्रापि अस्ति मेलनाभासो यद्विमर्शोऽनुविवृत्सुर्निरूप्यते, द्वित्वाभासचन्द्राभासयोरपि
मेलनाभासे विमर्शानुवृत्तिव्यावर्तनं वाक्यम् । तदेतदाह—द्विरूपे चन्द्रेऽपि, न केवलं रजत एव ।
'नभः' इति देशविशेषः कश्चित् । 'अन्यथा' इति द्विचन्द्रावरुद्धो योऽनवमृष्टः स न तथा,—इति
विमर्श रहेगा तब तक खण्डित नहीं होगा, इसीलिए यह पूर्ण ख्यातिरूप अख्याति ही भ्रान्तिता
है । इसी रूप में असत्, विपरीत, अनिर्वाच्य आदि ख्यातियाँ भी समझना चाहिए ।
अब शङ्का करते हैं कि सत्यरूप से रजत का ज्ञान है, वह भी एक प्रकार से अख्याति ही
है । इससे फिर क्या होगा ? तब तो, सब ज्ञान को भ्रान्ति ही कहना पड़ेगा । 'भाग्य से नींद टूट
जाने पर जब आप की दृष्टि खुलेगी तब तो उसे भ्रान्ति ही कहनी होगी; क्योंकि माया के आश्रय
होने से सब भ्रान्ति ही है; जैसे गाल पर के फोड़े के समान स्वप्न में ही स्वप्न की तरह यह
दूसरी भ्रान्ति हो गयी; क्योंकि उचित अनुवृत्ति का भी विमर्श अस्थिर रहता है। इसलिए
इदन्तादि के पृथक् आभासों में कोई भ्रान्ति नहीं है, मिलाने पर तो विमर्श की अनुवृत्ति का
निर्मूलन होने के कारण विमर्श के उदयकाल से ही लेकर बाधक होने तक भ्रान्ति वहाँ पर रहती
है—यह सिद्ध होता है। रजत का शुक्ति के साथ विमर्श होने पर शुक्ति में भी तो रजत का ज्ञान
आता है 'इदं रजतम्' यह रजत है—ऐसा कहने से वहाँ पर देश की जो उपाधि है 'अत्र रजतम्'
यहाँ रजत है; इस प्रकार से रजत की छाया को शुक्तिदेश से समन्वय करने का विसंवाद होने से
विमर्श की अनुवृत्ति नहीं होती । यहाँ पर 'वद्' धातु का भासन विषय है, उसका अभाव कारण है ।
ऐसा भले ही हो, किन्तु शुक्ति में रजत का और दो चन्द्रमा के ज्ञान में 'द्वौ चन्द्रौ' दो
चन्द्रमा का किसी प्रकार से भी भान नहीं होता, जिससे वह बाध हो सके और यह नियम है कि
एक के आभास में बाध नहीं होता । इस बात को आपने ही कहा है। इस स्थिति में स्वालक्षण्य
से नियत देश-काल के कारण कैसे आभास हो सकता है ? उस देश-काल के साथ वहाँ पर भी
मिलने का आभास रहता ही है; जो कि आभास की अनुवृत्ति करनेवाला उसका निरूपण करता
है, इस प्रकार से द्वित्वाभास और चन्द्राभास के भी मेलनाभास में विमर्श अनुवृत्ति का व्यावर्तन

अ.-२, आ.-३, का.-१४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २२३
बाधकेन उन्मूलितप्राच्यविमर्शानुवृत्तिकः क्रियते, —इति । एवमाभासस्तन्मेलनं च नियमानुप्राणि-
तम्,—इत्येतावदेव प्रमेयम् । एतान्येव आगमे तत्त्वानि वक्ष्यन्ते । वस्तु तत्त्वं प्रमेयम्—इति
पर्यायः । तथा च काठिन्याभास इति पृथिवी, लोहिताभास इति रूपं तेजश्च, मेलनाभासो रजः,
सन्निवेशस्तु नियतिरूपः, नियतिर्हि नियमः, स च अभावप्राणोऽभावस्फुरणमेव च पृथिव्याभासस्य
विचित्रतया चकासत् पृथुबुध्नोदराकारता, भेदाभासश्च माया, तत्पृष्ठे सत्यप्रकाशाभासश्च शिव-
तत्त्वम्,—इत्यास्तां तावत् । अग्रे भविष्यति एतत् । सर्वथा तावदत्र प्रमेये भगवत एव भेदने च
अभेदने च स्वातन्त्र्यं, घटगताभासभेदाभेददृष्टिरेव च परमार्थद्वयदृष्टिप्रवेशे उपायः समवलम्ब-
नीयः, न तु व्यवहारोऽपि अयं परमेश्वरस्वरूपानुप्रवेशविरोधी,—इति प्रतिपादितम् ॥ १३ ॥
एतदेव स्फुटयन् सकलप्रमेयसिद्धिः परमेश्वर एव आयत्ता,—इति निरूपयति—
गुणैः शब्दादिभिर्भेदो जात्यादिभिरभिन्नता ।
भावानामित्थमेकत्र प्रमातर्युपपद्यते ॥ १४ ॥
इह अनुवृत्तं व्यावृत्तं च चकासद्वस्तु कतरेण वपुषा न सत्यमुच्यताम् उभयत्रापि बाधका-
भावात्, सत्यतो हि यदि बाधक एव एकतरस्य स्यात् तत्तदुदये स एव भागः पुनरुन्मज्जन-
सहिष्णुतारहितो विद्युद्विलायं विलीयेत; न चैवम् अत एव भेदाभेदयोर्विरोधं दुःसमर्थमभिमन्य-
होता है। इसीलिए कहा गया है कि दो चन्द्रमा में भी होता है, केवल शुक्ति रजत में ही नहीं
होता । 'नभः' देशविशेष का नाम है। अन्यथा न मानोगे तो दो चन्द्रमा से अवरुद्ध नभ का
विमर्श नहीं होगा, इस प्रकार बाधक से पूर्व का विमर्श उन्मीलित नहीं होता एवं आभास और
उसका मेलन नियम से अनुप्राणित नहीं होगा, यही प्रमेय है और इसी को आगम में तत्त्व मानते
हैं । एक ही अर्थ का बोधक हो और भिन्न शब्द हो, उसे पर्यायवाची कहा जाता है। जिसमें
कठिनता का आभास हो वही पृथ्वी है, जिसमें रक्तरूप हो वह तेज है, तत्त्वों के आपस में मिल
जाने पर रज बन जाता है, ठीक-ठीक नियम से रह जाने को नियति कहते हैं और वह दूसरे के
अभाव के साथ स्वयं स्फुरण को अभाव कहते हैं। जैसे—घट में पृथु = बीच में बड़ा सा गोला
होना ऊपर की ओर छोटा सा मुख होना और उसके पीछे सत्य का प्रकाश होना शिव तत्त्व
कहलाता है और यही भेदाभास माया भी है, यहाँ पर इतना कहना ही पर्याप्त है। आगे इसकी
विशेषता बतलायेंगे। उन सभी प्रमेयों के अभेद और भेद में भगवान् का ही स्वातन्त्र्य रहता है
और घट में होनेवाले आभास के भेद एवं अभेद दृष्टि परमार्थ दृष्टि के प्रवेश में उपाय होती है;
क्योंकि परमेश्वर के स्वरूप के अनुरूप यह व्यवहार विरोधी पड़ता है। इस विषय में हमने
प्रतिपादन कर दिया है ॥ १३ ॥
इसी को स्पष्ट करते हुए सारे प्रमेयों की सिद्धि परमेश्वर में ही होती है—इस बात का
निरूपण करते हैं—
गुणों से एवं शब्दादि से भेद होता है और जाति आदि से अभेद होता है—इस प्रकार
एक ही प्रमाता में पदार्थों की स्थिति रहती है ॥ १४ ॥
यहाँ पर सामान्य और विशेषरूप से प्रकाशित होता हुआ पदार्थ किस शरीर से सत्य
नहीं है, कहिये—दोनों जगह कोई बाधक तो नहीं है, ठीक है, यदि एक का बाधक एक होता
तो उसके उदय होने पर वही भाग विद्युत् के समान विलीन हो जायेगा; किन्तु ऐसा नहीं होता ।

२२४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१४
मानैरेकैरविद्यात्वेन अनिर्वाच्यत्वम्, अपरैश्च आभासलग्नतया सांवृतत्वम् अभिदधद्भिः आत्मा
परश्च वञ्चितः । संवेदनविश्रान्तं तु द्वयमपि भाति संवेदनस्य स्वातन्त्र्यात् । सर्वस्य तिरश्चोऽपि
एतत् । संवेदनसिद्धं — यत् संविदन्तर्विश्रान्तमेकतामापाद्यमानं जलज्वलनपि अविरुद्धं, तत एव
उक्तं—'अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखा.....।'१ (१।६।११) इति । अतश्च गुणैरुपाधिरूपैर्विशेषाधायितया
विवक्षितैः शब्दादिभिर्वा दण्डादिभिरपि वा यो भेदो जातिवशात् सादृश्यात् भेदाग्रहणाद्वा; यश्च
अभेदो भावानाम् इत्थमित्युक्तनीत्या 'क्रियासम्बन्ध' (२।२।१) इत्यतः प्रभृति निरूपितः, स
एकत्र प्रमातरि सकलप्रमाप्रमाणसंयोजनवियोजनादिविचित्रासंख्यकृत्यप्रपञ्चोचितस्वातन्त्र्ये भग-
वत्यस्मदीयहृदयैकान्तशायिनि शिवशब्दव्यपदेश्ये सति उपपद्यते, नान्यथा । विशेषणान्येव च
अत एव भेद और अभेद का विरोध दुःसमर्थ मानते हुए कुछ लोगों ने उसी को अनिर्वाच्या
अविद्या बताया है और दूसरों ने आभास के साथ होने से वह ठीक है—ऐसा कहते हुए अपने
आप को और दूसरे को ठगते हैं। हमारे सिद्धान्त में तो दोनों संभव हैं; क्योंकि संवेदन स्वतन्त्र
होता है। सब को यहाँ तक कि पशु पक्षियों में भी अपना स्वसंवेदन सिद्ध है—वह जल और
अग्नि के समान एक ही संवेदन में अविरुद्ध रहता है, इसी कारण कहा है कि—'अत एव यथा-
भीष्टसमुल्लेखा.....।'१ ( १-६-११ )
इसीलिए उपाधिरूप गुणों से विशेषता रखनेवाले कहे जाते हैं; इत्यादि शब्दों से या
दण्डादि से जो भेद होता है वह जाति वशात् या सादृश्य से भेद का ग्रहण न होने से पदार्थभावों
का अभेद हो जाता है—ऐसा कहा गया है। "क्रिया सम्बन्धे" ( २-२-१ ) यहाँ से लेकर आगे
तक इसका निरूपण हुआ है। एक ही प्रमाता में संयोजन एवं वियोजन आदि असंख्य विचित्र
प्रपञ्च से युक्त हम लोगों के हृदय रखनेवाले शिव शब्द के वाच्य भगवान् में ही संपूर्ण प्रमाण
और प्रमेय उपपन्न होते हैं, दूसरे प्रकार से नहीं । विशेषण ही भेदक हो जाते हैं तो फिर दूसरे
१. नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु । प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥
वैशेषिक लोग विशेष पदार्थ की सिद्धि के लिए इस प्रकार कहते हैं—जैसे हम लोगों की तुल्य आकृति
क्रिया अवयव संयोगवाले गौ इत्यादि पदार्थों में अश्व आदि से भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ देखी जाती
हैं। जैसे 'गौः शुक्लः शीघ्रा गतिः पीनः ककुद्मान् महाघटः' इस प्रकार हम लोगों से विशिष्ट ऊर्ध्व-
रेतस्क योगी लोगों की तुल्य आकृति गुण क्रियावाले परमाणु मुक्तात्मा और मन, इनमें यह परमाणु
है वह परमाणु नहीं है; इस प्रकार भिन्न-भिन्न विषयों में जो विलक्षण-विलक्षण अनुभूतियाँ होती हैं और
एक परमाणु के देखने बाद कल्प बीतने पर भी उस परमाणु को देख करके वही यह परमाणु है जिसको
मैंने एक कल्प पहले देखा था —ऐसी अनुभूतियाँ होती हैं इसमें दूसरे निमित्त के संभव न होने के
कारण प्रत्येक नित्य पदार्थों में अलग-अलग विशेष पदार्थ रहते हैं—ऐसा मानना आवश्यक है। यह
मानना संभव नहीं है कि सर्वज्ञ योगियों को विशेष पदार्थ के बिना ही वैसी प्रतीतियाँ संभव हो जायेगी,
जबकि विशेष पदार्थ के बिना भिन्नत्व असिद्ध होने के कारण, अभिन्नों में भिन्नत्व प्रतीतियाँ मिथ्या हो
जायेंगी । उन विशेषों को विशेष इसलिए कहा जाता है कि विशेष का भेदक होता है, यह अपने
आश्रय को भिन्न वस्तुओं से भिन्न कर देता है।
अतः नित्य पदार्थों का परस्पर भेद उत्पन्न हो इसके लिए अतिरिक्त विशेष पदार्थ को स्वीकार
करने की आवश्यकता नहीं है 'इस परमाणु से वह द्वयणुक सम्पन्न नहीं हुआ था इसी कारण ये दोनों

अ.-२, आ.-३, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२५

भेदकानि, —इति किमन्त्यैरन्यैर्विशेषैः; अयं च परमाणुर्य एतद्देशादिविशिष्टघटारम्भणकाले पश्चा-
त्तनसंघटितद्व्यणुकारम्भकाले पूर्वं मिलितः' अयं स आत्मा, यः पुरा स्वर्गसदने सुरयोषितमिमा-
मित्यं परिरब्धवान्, —इति इयतैव योगिसर्वज्ञादीनां सिद्धः परमाण्वात्मादिषु भेदावभासः,—
इत्यलमवान्तरेण । सिद्धं तावात् भेदाभेदरूपं प्रमेयतत्त्वम् एकप्रमातृविश्रान्त्या निःशङ्कतां श्रयति,—
इति ॥ १४ ॥
ननु एवम्भूतो यद्ययं प्रमाता तत्रैव तर्हि प्रमाणोपन्यासे प्रयत्ननीयं न प्रमेये, यदाह 'प्रधाने
हि यत्नः फलवान्' इति । तदेतदाशङ्क्य प्रथमोपक्षिप्तमेव प्रमेयं स्मारयत्याचार्यः । तथा हि
विषयों की क्या आवश्यकता दिखायी पड़ती है। यह परमाणु इस देश से संयुक्त घटारम्भ काल
में जो पीछे होनेवाले द्व्यणुक के आरम्भ काल में पहले से मिला हुआ आत्मा है। इससे पहले
स्वर्ग में सुर-सुन्दरियों का आलिङ्गन किया था, इस प्रकार इतने से ही योगी की सर्वज्ञता की
सिद्धि हो जाती है और परमाणु आत्मा आदि में भेद का अवभास सिद्ध हो जाता है, इसीलिए
अवान्तर भेद की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि प्रकृत प्रसंग में अनुपयोगी
सिद्ध होता है।
इसलिए यह बात सिद्ध हुई कि भेदरूप एवं अभेदरूप प्रमेय तत्त्व एक ही प्रमाता में
निःशङ्क होकर विश्रान्त रहते हैं ॥ १४ ॥
अच्छा तो, इस प्रकार से यदि यह प्रमाता उस विश्रान्ति के स्थान में भेद एवं अभेदरूप
से निःशङ्क विश्रान्त होकर रहता है तो प्रमाण के रखने में ही प्रयत्न करना ठीक माना जायेगा
प्रमेय में नहीं होना चाहिए; जब कि इस विषय में कहा भी गया है 'प्रधाने हि यत्नः फलवान्'
परमाणु परस्पर भिन्न हैं, इस आत्मा ने उस रमणी का आलिङ्गन किया था, उस आत्मा ने नहीं। अतः
ये दोनों आत्मा परस्पर भिन्न हैं जिससे कि नित्य पदार्थों में भी परस्पर भिन्नता सिद्ध हो जाती है।
इन विशेषों को अन्त्य भी कहा जाता है; क्योंकि ये ही भेदकों में अन्तिम हैं, इनके ऊपर
दूसरा कोई भेदक नहीं होता, जबकि ये भिन्न करने के लिए ही सिद्ध हैं और स्वतः भिन्न हुए बिना
दूसरे को भिन्न नहीं किया जाता है। अतः ये स्वतः ही भिन्न-भिन्न रूपों में सिद्ध होते हैं। अन्त्य कहने
का दूसरा कारण यह है कि जिन नित्य द्रव्यों का अन्य सभी द्रव्यों के नाश होने पर भी इनका विनाश
नहीं होता है। अतः संसार के अन्त अनन्त कोटि है उनमें ये विशेष रहते हैं एवं तृतीय कारण यह
बताया गया है कि उन नित्य द्रव्यों में इन विशेषरूपी विशेषणों को मान लेने पर किसी दूसरे विशेषणों
को मानने की आवश्यकता नहीं है, यह विशेष ही उन नित्य द्रव्यों के अन्तिम विशेषण है। चतुर्थ
कारण यह है कि जब मुक्त दशा में अन्य सभी विशेष गुण नहीं रहते हैं उस दशा में मुक्तात्मा एवं मन
में यह विशेष रहता है, अन्य सभी गुण विशेष गुण क्रमशः ध्वस्त होते-होते समाप्त हो गये, अन्ततः
यह विशेष पदार्थ रह गया, इसी कारण को लेकर भी विशेष पदार्थ को अन्त्य कहा जाता है यह
पञ्चम कारण है।
घट भिन्न है कपाल के भिन्न होने से ऐसा प्रवाह निरन्तर चलता गया; चलते-चलते द्व्यणुक
भिन्न है परमाणु के भेद से, उस परमाणु से भिन्न है विशेषात् इस प्रकार विशेष पदार्थ तक भेद चलता
गया, इसके आगे प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, इसी विशेष पदार्थ पर उस प्रवाह का अन्त हो गया, इसलिए
उस प्रवाह के अन्त में 'अन्ते भव' अन्त में होनेवाला होने के कारण विशेष पदार्थ को अन्त्य कहा गया है।
२९

२२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१५-१६
'अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः।' ( १।१।२ ) इति यद्वस्तु तदेवेदानीं ज्ञाते प्रमाण-
स्वरूपे परमेश्वरस्वरूपे च निर्वाणार्हम्, एवंभूतं हि प्रमाणं तदेवंभूते हि भगवति कथं क्रमताम्,
इति। तदेतत् स्फुटयितुमाह—
विश्ववैचित्र्यचित्रस्य समभित्तिलोपमे।
विरुद्धाभावसंस्पर्शे परमार्थसतीश्वरे ॥ १५ ॥
प्रमातरि पुराणे तु सर्वदा भातविग्रहे।
किं प्रमाणं नवाभासः सर्वप्रमितिभागिनि ॥ १६ ॥
परिमितप्रमातृलग्नो नवनवाभासः प्रमेयोन्मुखः प्रमाणम्,—इत्युक्तम्। तत्र प्रकाशवपुषि
प्रकाशमात्रस्वभावे पूर्वसिद्धे कः प्रमाणस्योपयोगः सम्भावना वा। तथा च पूर्वसिद्धे प्रमातरि
सति तल्लग्नप्रकाशान्तर्भूतविमर्शमयीम् अभूतपूर्वां प्रमेयस्य सिद्धिं वितरति प्रमाणम्। प्रमातु-
श्चादिसिद्धस्य किंलग्ना सिद्धिरस्तु। विश्ववैचित्र्यं हि तत्र परमेश्वरे प्रकाशैकात्मनि सति भाति
यथा चित्रं भित्तौ यदि हि नीलपीतादिकं पृथगेव परामृश्यते तदा स्वात्मविश्रान्तेषु तेषु तथा वा
अन्योन्यविषये जडान्धबधिरकल्पानि ज्ञानानि स्वविषयमात्रनिष्ठितानि, विकल्पाश्च तदनुसारेण
भवन्तः तथैव,—इति 'चित्रम् इदम्' इति कथंकारं प्रतिपत्तिः। एकत्र तु निम्नोन्नतादिरहिते
भित्तितले रेखाविभक्तनिम्नोन्नतादिविभागजुषि 'गम्भीरनाभिरुन्नतस्तनीयम्' इति चित्रावभासो
अर्थात् प्रधान कार्य में ही किया हुआ यत्न फलवाला होता है। इस पर आशङ्का कर
सर्वप्रथम आये हुए प्रमेय को आचार्य स्मरण कराते हैं। जैसा कि 'अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा
विदधीत कः'। ( १-१-२) 'चेतनरूप आत्मा का निषेध या सिद्धि कौन कर सकता है?—वह
तो स्वयं सिद्ध ही है'। यह सिद्ध पदार्थ-वस्तु उस परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान होने पर निर्वाह के
लिए इस प्रकार का प्रमाण ऐसे सिद्ध भगवान् में कैसे स्थान प्राप्त कर सकता है, इसी बात को
स्पष्ट करते हैं—
परमार्थ सत् ईश्वर के प्राक्तन प्रमाता होने पर जिसका सर्वदा प्रकाश रहता है और जिस
विश्व के वैचित्र्य-चित्र को अपने में ही चित्रित करता है एवं विरोध और अविरोधरूप से सभी
का जिसमें भास होता है—ऐसे ईश्वर में सभी प्रमाओं का मान होता रहता है। फिर उसमें
किस प्रमाण का अवभास हो सकता है ॥ १५-१६ ॥
परिमित प्रमाता में होनेवाला नया-नया अवभासितरूप प्रमेय में उन्मुख रहना प्रमाण
कहा जाता है—यह हम कह चुके हैं। उस पूर्वसिद्ध प्रकाश शरीर परमेश्वर में प्रमाण का उपयोग
या उसकी संभावना कैसे हो सकती है ? और पूर्वसिद्ध प्रमाता के रहते-रहते उसमें रहनेवाले
प्रकाश के अन्तर्भूत विमर्शमय अभूतपूर्व प्रमेय की सिद्धि प्रमाण करता है। इस प्रकार पहले से
ही सिद्ध प्रमाता को वह कैसे सिद्ध कर सकता है। सारे विश्व की विचित्रता प्रकाशरूप परमेश्वर
में ही भासती है—जैसे चित्र पर कामिनियों का चित्र भासता है। इसीसे सिद्ध की सिद्धि क्या हो
सकती है ? यदि नील-पीतादि पृथक्-पृथग्रूप से परामृष्ट होते हैं तो अपने में विश्रान्त हो जाने पर
परस्पर अन्ध बधिर के सदृश अपने में ही होनेवाले यह चित्र है—ऐसा ज्ञान कैसे संभव हो
सकता है ? निम्न-उन्नत आदि से रहित समतल भित्ति में रेखा से अलग किये गये निम्न-उन्नत

अ.-२, आ.-३, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२७
युक्तः, तद्वत् एकप्रकाशभित्तिलग्नत्वेन वैचित्र्यात्मकभेदोपपत्तिः इति भावभेदग्रहणप्रकाशभित्ते-
रनपायिनीं स्वप्रकाशतामाह । तत्र स्वप्रकाशे किं प्रमाणेन ? अथोच्यते पूर्वमस्य प्रकाशो न
भवति, तर्हि स एव नास्ति, — इति स्यात् प्रकाशमात्ररूपत्वात् तस्य । न च अस्य नास्ति, — इत्य-
भावेन स्पर्श उपपन्नो, यतो हि असावेव परमार्थतः सन् प्रकाशस्यैव सत्त्वात्, सतश्च असद्रूपत्वा-
योगात् । अथ उच्यते—ईश्वरता तस्याप्रमिता प्रमास्यते तदपि न, यतो हि असौ प्रमातृत्वेन चेत्
नाचकास्यत् कस्यायमुद्यमः, चकास्ति चेत् तर्हि प्रमातृत्वैव ईश्वरता, तदाह 'ईश्वरे प्रमातरि
सर्वदा भातविग्रहे' इति । विशेषेण गृह्यते इति विग्रहोऽसाधारणं स्वरूपम्, तत एव स्वतन्त्रप्रकाश-
नेन यः कालव्यवहारः सोऽत्र नास्ति, — इति 'पुराणे' इत्युक्तम् । तत्र किं प्रमाणं, कुतः
प्रयोजनात्प्रमाणं, कस्तत्र प्रमाणस्योपयोगः, — इति, तत्र च किं प्रमाणं न किञ्चित् उपपत्त्या
घटते इत्यर्थः । यतः प्रमाणं नामाभिनवाभासरूपं प्रमातरि प्रमितिलक्षणां विश्रान्तिं विदधत्
प्रमाणं भवति, प्रमाता चाविच्छिन्नाभासः सर्वाश्च प्रमितीः स्वात्मनि अन्तर्मुखरूपे भजते । तत्
तस्मिन् कथमभिनव आभासस्तत्प्रमितिश्च कुत्र विश्राम्यतु । तस्मात् देहप्राणपुर्यष्टकशून्यप्राय एव
प्रमातरि प्रमाणमुच्यताम् । तत्रापि च वेद्यांशे यदि नाम, न तु कथंचित् संविदंशे, तत्रापि
विभागवाली भूमि में गंभीर नाभि ऊपर की ओर उठे हुए स्तन इत्यादि का चित्र में आभास
होता है, उसी प्रकार एक प्रकाशवाले अर्थात् समान भित्तिवाले चित्र में ही भेदों की उपपत्ति
हो सकती है । उसी को भाव-भेद ग्रहण करनेवाली भित्ति का कभी नहीं विनष्ट होनेवाला प्रकाश
कहा जाता है । स्वप्रकाश में प्रमाण का क्या प्रयोजन है ? यदि कहते हो कि पूर्व में इसका
प्रकाश नहीं होता तो वही नहीं रहता है, इसीलिए मानना पड़ेगा कि प्रकाशरूप होने के कारण
सर्वदा रहता ही है, उसका भासन नहीं रहता है—ऐसा जब आप बोलेंगे तो अभाव से ही
ईश्वर का स्पर्श हो जाता है; वस्तुतः वही परमार्थ प्रकाश की सत्ता भी है और सत्य का एवं
असत्य का योग नहीं बैठ सकता । यदि कहो कि उसकी ईश्वरता अपरिमित है, कभी उसका
परिमाण हो जायेगा तो यह भी बात नहीं है; क्योंकि उसको यदि प्रमाता मान लेंगे तो यह
किसका उद्यम है, इसका पता लगाना कठिन हो जायेगा । यदि किसी प्रकार बोध हो भी गया—
तो भी, प्रमाता को ही ईश्वरता कहना पड़ेगा । इस बात को लेकर कहते हैं कि 'ईश्वरे प्रमातरि
सर्वदा भातविग्रहे' यदि प्रमाता है, तो सर्वदा उसका प्रकाश होना चाहिए । विग्रह शब्द का यही
अर्थ है कि जिसका स्वरूप विशेषरूप से गृहीत होता हो और उसीको विग्रह भी कहना चाहिए ।
इसीलिए स्वतन्त्र प्रकाश होने के कारण अभाव स्पर्श का अयोग्य प्रवेश जो काल का व्यवहार
है—वह यहाँ पर नहीं हैं, इसीलिए 'पुराणे' शब्द आया है । उसमें प्रमाण क्या है ? किस प्रमाण
से प्रयोजन है, प्रमाण का कौन सा वहाँ पर उपयोग देखा जाता है ? और वहाँ पर प्रमाण की
कोई उपपत्ति नहीं बैठ रही है । जब कि प्रमाण उसी का नाम है जो नूतन अभिनव आभासरूप
प्रमाता में प्रमाणरूप विश्रान्ति को पाते हुए प्रमाता होता है और प्रमाता निरन्तर आभास से
युक्त रहता है सब प्रमाएँ अपने आप उसमें अन्तर्मुख होकर रहती है । वह उस प्रमाता में नया
आभास या प्रमा कैसे कहाँ विश्राम लेगी ? इसीलिए देह, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और पञ्च-
तन्मात्राएँ (शब्दादि) इन सबों से शून्य ही प्राण प्रमाता में प्रमाण रहता है—ऐसा कहना
चाहिए वह भी विद्यांश में ही विश्राम लेगा किसी प्रकार भी ज्ञानांश में नहीं लेगा और विषयके

२२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१७
विषयोन्मुखे तत एव संकुचितत्वात् अभिनवाभासे संकोचविहीन सत्यप्रमातृलग्नतापेक्षया कथ्यतां
स्वसंवेदनं प्रमाणम् । सौगतेनापि 'ममेदं ज्ञानन्' इति कल्पितप्रमातृलग्नमेव तदुपेल्यं, न तु
परमार्थप्रमातरि प्रमाणेन किंचित् । उक्तं च मयैव—‘यत्प्रमेयीकृतोऽस्मीति सर्वोऽप्यात्मनि
लज्जते । कथं प्रमेयीकरणं सहतां तन्महेश्वरः ॥' इति ॥ १५-१६ ॥
नन्वेवं यदि भगवति प्रमाणमनुपयोग्यनुपपत्ति च किमर्थं तद्विषयं शास्त्रं, तद्धि प्रमाणमेव,
परार्थानुमानात्मकं हि शास्त्रम्, तत्र च प्रमाणादिषोडशपदार्थतत्त्वमयतत्त्वमेव परमार्थः । यत्तु
अभिमुख होकर उससे संकुचित होने पर अभिनव आभास के उद्गम से संकोच शून्य सत्य प्रमाता
में रहने के कारण संलग्नता को स्वसंवेदन प्रमाण कहना चाहिए। सौगतों ने भी 'ममेदं ज्ञानम्'
मुझे यह ज्ञान हुआ इस प्रकार से कल्पित प्रमाता में ही माना है; परमार्थ प्रमाता में प्रमाण कुछ
भी तो नहीं कर सकता है। मैंने ही इस विषय में कहा है—'मैं प्रमेय बना लिया गया हूँ, ऐसा
सभी लोग लजाते हैं। उस प्रमेयीकरण को महेश्वर कैसे सह सकेंगे' ॥ १५-१६ ॥
अच्छा तो, अब कहते हैं कि यदि भगवान् में प्रमाण की अनुपयोगिता और अनुपपत्ति है
तो तद्विषयक शास्त्र किसलिए है; क्योंकि शास्त्र तो परार्थ अनुमानरूप प्रमाण ही होता है,
और गौतम मुनि ने अपने शास्त्र में प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव,
१* षोडश पदार्थानां लक्षणानि—
१. अर्थपरिच्छित्तिसाधनानि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि । २. तत्परिच्छेद्यमात्मादि प्रमेयम् ।
३. नानार्थविमर्शः संशयः । ४. हिताहितप्राप्तिपरिहारौ तत्साधनञ्च प्रयोजनम् ५. हेतोः प्रतिबन्धावधा-
रणं दृष्टान्तः । ६* प्रमाणतोऽभ्युपगम्यमानः सामान्यविशेषवानर्थः सिद्धान्तः । ७. परार्थानुमानवाक्यैक
देशभूताः प्रतिज्ञादयोऽवयवाः । ८. संदिग्धेऽर्थेऽन्यतरपक्षानुकूलकारणदर्शनात् संभावनाप्रत्ययस्तर्कः ।
९. साधनोपलम्भजन्मना तत्त्वावबोधो निर्णयः । १०. वीतरागकथावस्तुनिर्णयफलो वादः । ११. विजि-
गीषुकथा पुरुषशक्तिपरीक्षणफला जल्पः । १२. स्वपक्षस्थापनाहीनस्तद्विशेषो वितण्डा । १३. अहेतवो
हेतुवदाभासमाना हेत्वाभासाः । १४. अर्थविकल्पैर्वचनविघातश्छलम् । १५. हेतुप्रतिबिम्बनप्रायं प्रत्य-
वस्थानं जातिः । १६. सत्यवस्तवप्रतिभासो विपरीतप्रतिभासश्च निग्रहस्थानम् इति
१. अर्थ के निश्चयात्मक ज्ञान के साधनों को प्रत्यक्ष आदि प्रमाण कहलाता है । २. प्रमाणों
के द्वारा जिसका निश्चय किया जाता है वह प्रमेय हैं। ३. एक ही वस्तु में विरुद्ध धर्मों के ज्ञान को
संशय कहा जाता है । ४. साधनों द्वारा हित अहित का विचार कर कार्य में प्रवृत्त होना ही प्रयोजन
है । ५. सामान्यजन तथा शास्त्रज्ञ दोनों ही जिस विषय को मानते हो वही दृष्टान्त है । ६. प्रमाण
जन्य ज्ञान के पश्चात् स्वीकार किये गये अर्थ को सिद्धान्त कहा जाता है । ७. पञ्चावयव परार्थानुमान
से सिद्ध करने योग्य साध्य-धर्म विशिष्ट धर्मी व धर्मी-विशिष्ट साध्यरूप अर्थ की जितने शब्दों के समुदाय
से सिद्धि हो जाती है उस शब्दों के समूह-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय एवं निगमन को पञ्चावयव
नाम से कहा जाता है । ८. सन्दिग्ध अर्थ के विषय में उपयुक्त निश्च्रन्ति कार्य कारण के विषय में
विचार करना ही तर्क है । ९. प्रत्यक्षादि प्रमाण साधनों से जन्य पदार्थ के वास्तविक ज्ञान को निर्णय
कहते हैं। १०. अनेक वीतराग वक्ताओं द्वारा किसी उद्देश्य को लेकर ऐक्यमत से किये गये निर्णय
का नाम वाद है । ११. जिसमें छल, जाति तथा निग्रह स्थानों से केवल अपने पक्ष की स्थापना तथा

अ.-२, आ.-३, का.-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२९
सौगतैः पञ्चावयवत्वादि दूष्येते तदाग्रहमात्रं, षोडशसु हि पदार्थेषु निरूप्यमाणेषु सम्यक् प्रतिपाद्यं
परः प्रतिपद्यते, 'हिताहितप्राप्तिपरिहारयोः' इत्यादिना च ग्रन्थेन । परस्य किं प्रयोजनं, तद्धि
तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह ये सोलह पदार्थ दिखाये हैं
वे सभी परमार्थ सद्रूप ही हैं। जिनमें सौगतों ने पञ्च अवयवों ( प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनयन-
निगमन ) का खण्डन किया है वह तो उन लोगों का आग्रह मात्र है; क्योंकि षोडश प्रमाणादि
पदार्थों के निरूपण करने पर ही पदार्थों की यथार्थता भली भाँति अर्जित कर सकता है। जिसे
कि 'हिताहितप्राप्तिपरिहारयोः' इत्यादि प्रतीक ग्रन्थ से प्रारम्भ किया जाता है। दूसरे का क्या
प्रयोजन है ? दूसरे का प्रयोजन तो ज्ञान करना ही है और वह परार्थ अनुमान से ही संभव हो
सकता है उसमें पाँचों अवयवों का प्रयोजन आता ही है, प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण आदि का उपयोग
दूसरे के पक्ष का खण्डन होता है वही जल्प है। १२. अपने पक्ष की स्थापना से रहित केवल परपक्ष
का खण्डन वितण्डा कहलाता है । १३. जो हेतु नहीं है उसमें हेतु की तरह आभासित होनेवाले का
नाम हेत्वाभास है। १४. वादी के वचन का विरोध कर वादी के अभीष्ट अर्थ की विपरीत कल्पना कर
देना छल कहलाता है। १५. साध्य साधनरूप व्याप्ति का विचार न कर केवल समान तथा विरुद्ध धर्मों
से प्रतिपक्षी का खण्डन करनेवाले असदुत्तर को जाति कहा जाता है । १६. वादी प्रतिवादी का
पदार्थों के प्रति असत्यज्ञान अथवा विपरीतज्ञान निग्रहस्थान नाम से जाना जाता है।
१. बौद्धों के सिद्धान्त में सब कुछ क्षणिक होने के कारण पञ्चावयव की अपेक्षा नहीं रहती है। प्रतिज्ञा,
हेतु और उदाहरण, इन्हीं तीनों को व्याप्ति ज्ञान के लिए पर्याप्त मानते हैं वह ठीक नहीं है।
परो मद्रचनादेव तमर्थं बुध्यतामिति ।
वक्ता स्वप्रत्ययेनेदं नहि वाक्यं प्रयुज्यते ॥
किन्त्वेनमनुमानेन बोधयामीति मन्यते ।
सोऽपि तद्वचनान्नैव तमर्थमवबुध्यते ॥
किन्तु व्याप्तिमतो लिङ्गात् स्वयं तत्तु न पश्यति ।
तत्प्रतीत्यभ्युपायतवात् परार्थमिदमुच्यते ॥
दूसरे लोग मेरे वाक्य से ही उस अर्थ को भली-भाँति अवगत कर ले अपने ज्ञान से वक्ता
इस वाक्य को नहीं प्रयुक्त करता है। किन्तु अनुमान से उस व्यक्ति को अवगत करता हूँ ऐसा मानता
है। वह भी मेरे वचन से ही उस अर्थ को जान लेता है किन्तु व्याप्ति वाले लिङ्ग ( हेतु ) से स्वयं
उस अर्थ को नहीं देखता है। व्याप्तिवाले लिङ्ग की प्रतीति में साधक होने के कारण यह परार्थ अनुमान
कहा जाता है। इसलिए प्रतिज्ञादि पञ्चावयव वाक्य अपरिहार्य है । हित-अहित अर्थात् हित अभीष्ट
वस्तु की प्राप्ति करने की इच्छा करता हुआ एवं अहित वस्तु को छोड़ने की इच्छा रखता हुआ कार्य
में प्रवृत्त होना ही प्रयोजन है 'यमर्थमुद्दिश्य पुरुषः प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्' अर्थात् जिस अर्थ को लक्ष्य कर
पुरुष क्रिया करने के लिए प्रवर्तित होता है वही प्रयोजन कहलाता है । तब तो वह स्वार्थ ही हुआ,
न कि परार्थ-ऐसा कहा गया है, इसमें दूसरे का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? ऐसा प्रतिवादी आक्षेप
करता है। दूसरे को अच्छी तरह ज्ञान हो जाना ही प्रयोजन है। यह कहा गया है कि प्रयोजन से
ज्ञान होता है और ज्ञान से प्रवृत्ति देखी जाती है । प्रतिपादन किये गये सोलह पदार्थों में हेय उपादेता
की सिद्धि परार्थ अनुमान के कारण होने से शास्त्र में परार्थ अनुमान कहा जाता है ।

परस्य प्रतिपत्तयै, सा च परार्थानुमानात्, तत्र च प्रतिज्ञादेरुपयोगः, — इति, तत् परिपूर्णपरप्रति-
पत्तिकारि परमार्थतः सकलमेव शास्त्रं परार्थानुमानम् आगमव्यतिरिक्तं न्यायनिर्माणवेधसाक्षपादेन
निरूपितम्, — इति । अत्रापि पूर्वोक्तमेव 'किन्तु मोहवशात्' (१।१।३) इति स्मारयितुमाह —
अप्रवर्तितपूर्वोऽत्र केवलं मूढतावशात् ।
शक्तिप्रकाशेनेशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥ १७ ॥
इह परमेश्वरस्येदमेव परं स्वातन्त्र्यं — यत् अस्मादृशे प्राच्यपशुदशाविशेषासम्भाव्यमानाति
दुष्करवस्तुसम्पादनं नाम । इतश्च किम् अतिदुष्करं भविष्यति, — यत्प्रकाशात्मनि अखण्डित-
ताद्रूप्ये एव प्रकाशमाने प्रकाशननिषेधावभासः प्रकाशमानः । तस्मात् परमेश्वरस्येदं तत्परं
स्वातन्त्र्यं यत् तथाभासनं पशुरूपतावभासनं नाम ग्राहकांशसमुत्थापनं, तद्वारेण च ग्राह्योल्ला-
सनमपि । सैषा भगवतो मायाशक्तिरुच्यते । यथोक्तम् — 'माया विमोहिनी नाम............' इति ।
तदेवं-भूतान्मायाशक्तिरूपात् स्वातन्त्र्यात् या मूढता विनष्टपूर्णचेतनता स्वात्मवर्तिन इच्छास्पन्दो-
दयस्फुटस्फुरितविश्वभाव निर्भरितात्मनः पूर्णत्वस्य, स्मृत्यादिशक्त्यात्मनः स्वातन्त्र्यस्य, देशकाल-
संकोचवैकल्यात् अयत्नसिद्धवैभवनित्यतार्थमस्य च प्रकाशमानस्यापि यदप्रकाशमानतया अभि-
मननं, तस्या वशात् सामर्थ्यात् पूर्वं यो न प्रवर्तितः समनन्तरश्लोकद्वयोक्तस्वरूपे प्रमातरि भगवति
ईश्वरत्वादिना उक्तेनैव पूर्णत्वादिना व्यवहारो यः खलु 'अहम्' इति भाति स पूर्णः विभुः स्वतन्त्रो
भी होता है; क्योंकि इसमें तो दूसरे को ठीक-ठीक ज्ञान करना है। सारा का सारा शास्त्र परार्थ
अनुमान के रूप में ही है जिसका आगम से भिन्न न्यायनिर्माण के प्रणेता अक्षपाद गौतम ने
निरूपण किया है, यह भी पहले कह चुके है 'किन्तु मोहवशात्' (१-१-३) उसीका स्मरण कराने
के लिए कहते हैं—
जब कि पहले मूढ़ता के कारण यहाँ पर नहीं है वही सम्प्रति शक्तिपात हो जाने से ईश्वर
इत्यादि का व्यवहार प्रवर्तित किया जाता है ॥ १७ ॥
यही परमेश्वर का परम स्वातन्त्र्य है जो कि हमलोगों के जैसे पहले पशु दशा विशेष में
नहीं होनेवाले दुष्कर पदार्थ का सम्पादन करना। और इससे बढकर दुष्कर अन्य क्या हो सकता
है ? अखण्डित सद्रूप प्रकाशमान ईश्वर के प्रकाशित होने पर भी अप्रकाश की कल्पना करते
रहना, परमेश्वर का यही सर्वश्रेष्ठ स्वातन्त्र्य है कि अपने में पशुरूपता का अवभास करना और
ग्राहक अंश का उत्थान करना एवं उसी के द्वारा ग्राह्य भाग का भी उत्थान करना यही भगवान्
की माया-शक्ति है, इस विषय में कहा है कि—'माया विमोहिनी नाम......।' इस प्रकार
माया-शक्ति के रूप में ईश्वर का जो स्वातन्त्र्य है उससे प्राणी को मूढ़ता प्राप्त होती है जिसमें
चेतना का विनाश हो जाता है। और इच्छा-स्पन्द का उदय प्रस्फुटित होकर सारे विश्वभाव को
निर्भासित करता रहता है। उस पूर्णता का और स्मृति आदि शक्तिरूप स्वातन्त्र्य का एवं
देश-काल के सङ्कोचरूपी विकलता से बिना किसी प्रयास से, स्वाभाविक नित्यता रूप धर्म का
प्रकाश बना रहता है और उसकी भी मूढता के कारण ही अप्रकाशमानता हो जाती है। जो
पहले नहीं था, उसे दो श्लोकों से कह दिये। ईश्वररूप प्रमाता में जिस पूर्णता और ईश्वरता का
व्यवहार होता था एवं पूर्ण 'अहं' का स्वतन्त्रपूर्ण नित्य प्रकाश था, जिसके लिए कहा जाता था

नित्यः, – इत्येवमादिरूपः, तं प्रवर्तयन्तु व्यवहारं लोका इति । एतेन शक्तीनाम् इच्छाज्ञानक्रियाणां
प्रकाशकेन प्रत्यभिज्ञारूपेण व्यवहारसाधनपरार्थानुमानात्मना शास्त्रेण तं व्यवहारं प्रवर्तयतां
तत्समर्थाचरणं क्रियते । ‘प्रवर्त्यते’ इति द्वौ णिचौ । केवलमिति न तु किंचिदपूर्वं क्रियते, नापि
तत्त्वतोऽप्रकाशमानं प्रकाश्यते, प्रकाशमान एव यत् ‘न प्रकाशते’ इत्यभिमननं तदपसार्यते ।
तदपसरणमेव हि परमेश्वरतालाभो मुक्तिः, तदनपसरणमेव संसारः, अभिमननमात्रसारं हि
एतद्द्वयं, उभयमपि चेदं भगवद्विजृम्भितमेव । एतदुक्तं भवति–यथा भौतस्य भासमाने एवात्मनि
‘अपहारितोऽहम्’ इति मोहान्मन्यमानस्य मोहोऽपसार्यते, –कः खलु त्वं ?, यस्येदृशं वस्त्रं मुखमी-
दृशम्,–इति चेत्, पश्य तदस्ति भवतः–इति पुनः पुनरभिदधता न च अस्य अपूर्वं किंचन
रचितं, तथा पशुलोकस्य भासमान एव आत्मनि ‘नाहमीश्वरः’ इत्यादि मोहादभिमन्यतो
मोहोऽपोह्यते । यो हि ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्ययुक्तः स ईश्वरो यथा सिद्धान्तपुराणादिषु प्रसिद्धः तथा
च त्वम्–इति । यदि वा यस्मिन् यदायत्तं स तत्रेश्वरो राजेव स्वमण्डले, तथा च त्वयि विश्वम्,–
इति ईश्वरताव्यवहारो नान्यनिमित्तकः,–इति व्याप्तिः । यत् खलु यल्लग्नं भाति तत्तेन पूर्णं
निधानमिव मणिभिः, त्वल्लग्नं च विश्वम्,–इति । यस्य यदन्तर्वर्ति भाति, स तावति व्यापकः
समुद्ग इव मणिषु, त्वयि च संविद्रूपे धरादिसदाशिवान्तं शास्त्रप्रक्रियोक्तं विश्वम्,–इति ।
कि लोग उस व्यवहार को करें और उसीसे इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन शक्तियों के प्रत्यभिज्ञारूप
प्रकाश से व्यवहार साधन अनुमानरूप शास्त्र से व्यवहारकरनेवाले के साथ समुचित आचरण
किया जाता है । ‘प्रवर्त्यते’ इसमें दो ‘णिच्’ दिये गये हैं । इसमें कोई नया विषय नहीं उत्पन्न हो
रहा है । किन्तु केवल पूर्व का प्रवर्तन ही होता है, इसलिए ठीक-ठीक अप्रकाशमान प्रकाशित
भी नहीं है ! प्रकाशमान ही प्रकाशित होता है, नहीं प्रकाशित होता है इस अभिमान को दूर
कर दिया जाता है; क्योंकि उसका दूरीकरण करना ही परमेश्वर प्राप्तिरूप मुक्ति है और दूरीकरण
न करना ही संसार माना जाता है, ये दोनों ही अभिमान पर निर्भर करते हैं और ये दोनों ही
परमेश्वर के विलास हैं । इसका निष्कर्ष यह होगा कि जब पदार्थों का भास होता है ‘अपहारि-
तोऽहम्’ सचमुच मैं ठगा गया हूँ । जैसे भूत से ग्रस्त आत्मा जब भासित होगा तब मैं अपने रूप
में नहीं हूँ–इस प्रकार मोह वशात् जो उस समय अपने आपको मुग्ध समझता है, उसके
मोह को दूर कर देने पर तुम कौन हो बताओ ? जिसका ऐसा मुख है और इस तरह का वस्त्र
है, देखो, वह है तुम्हारे जैसा; जब कहा जाता है तब कोई नयी चीज नहीं होती । पूर्व का ही
विषय पुनरावर्तन करता है कि ‘मैं ईश्वर नहीं हूँ’ इत्यादि इस प्रकार मोह से ग्रस्त हुए का मोह
दूर कर दिया जाता है; क्योंकि जो ज्ञान-क्रियारूप स्वातन्त्र्य है, उससे युक्त रहता है, वही ईश्वर
कहलाता है । जैसा कि शास्त्र सिद्धान्त पुराणों में दिखलाया गया है वैसा ही तुम हो, जैसे राजा
अपने राज्यमण्डल का स्वामी रहता है, उसी प्रकार तुम्हारे में यह सारा विश्व भरा हुआ है ।
तुम उसके स्वामी हो, अपने को ईश्वर समझो, इसमें दूसरा कोई निमित्त नहीं है । जिसमें संलग्न
हुआ वह सोचता हुआ है उसी से पूर्ण होता है । जैसे–मणियोँ से आकर, उसी प्रकार तुम्हारे
में भी यह सारा विश्व है । जिसका जितना ही आन्तर आभास है, वह उतना ही व्यापक होता
है । जैसा–मणियोँ का डिब्बा और तुम्हारे में भी पृथ्वि से लेकर शिवतत्त्व पर्यन्त शास्त्रीय
संविद्रूप प्रक्रिया से प्रतिपादित सारा का सारा तत्त्व विद्यमान है । जिसके रहने पर ही उदय

२३२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१७

यस्मिन् स्थिते यदुदेति लीयते च तत् तत्पूर्वापरभागव्यापि यथा भूमावङ्कुरः, तथा च त्वयि
प्रकाशरूपे विश्वम्,—इति । एवम् अन्येऽपि धर्माः सहस्रशोऽपि आगमादिसिद्धा योज्याः । तदेवं
व्यपोहिते व्यामोहे, स्थितेऽपि तत्संस्कारमात्रविधृते शरीरादौ अनात्मताभिमानपुरःसर एवात्मता-
भिमाने, घटादौ च प्रकाशमान एवानात्मताभिमाने ज्ञातेन्द्रजालतत्त्वस्य पश्यतोऽपि इन्द्रजालं यथा
न तत्त्वतो व्यामोहः तथा प्रत्यभिज्ञातात्मस्वरूपस्य, ततो निवृत्ते प्रयाणप्रापितपर्यन्ते देहे
परमेश्वरतैव । अभ्यासभावनाबलेन तु शिवशासनोपदिष्टेन देहघटादावेव परमेश्वरतासमावेशभिनि-
विश्यपश्यत इहैव शरीरे पारमेश्वर्यांशधर्मोद्गमः, न तु वस्तुतः पूर्णता, देहत्वस्यैव संकोचप्राणस्य
गलने यथास्थितविश्वात्मकतापत्तेः । यस्य तु व्यवहारसाधने हेतुकलापेऽपि असिद्धताभिमानः,
तस्य तत्रापि व्यवहारसाधनैरेव व्यामोहोपसार्यः । यस्य तु सर्वथा नापसरति, तत्रेश्वरशक्ति-
बलान्मूढतैव, तस्यापि कर्णपथगमनात् संस्कारपाकेनावश्यं कदाचिद्भविष्यत्येव स्वरूपलाभः ।

और लय होता है वही उसके पूर्व-अपर भाग में व्याप्त रहता है। जैसा कि पृथ्वी में अङ्कुर
रहता है, वैसा ही प्रकाशरूप तुम्हारे में यह विश्व रहता है। इस प्रकार आगम आदि से सिद्ध
अन्य बहुत से सहस्रसंख्यक कर्मों को भी जोड़ देना चाहिए। इसी प्रकार व्यामोह को हटा देने पर
उसके भी संस्कारमात्र शरीरादि में रह जाने से अनात्मता को भी जानते हुए आत्मता का
अभिमान करना और भासमान घटादि में इसप्रकार अनात्मा का अभिमान रहते हुए ज्ञात
इन्द्रजालतत्त्व का अभिमान करना और यथार्थ इन्द्रजाल को भी देखने पर यथार्थ व्यामोह नहीं
होगा; इसीप्रकार अपने स्वरूप को जान लेने पर वह देहाभिमान से दूर हो जाता है एवं परमेश्वर
तत्त्व की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। उस परमेश्वरता के अभ्यास बल से शिवशासन (तन्त्रशास्त्र)
के द्वारा उपदिष्ट देह एवं घटादि में भी ईश्वरतत्त्व का भान होने लगता है। सर्वत्र परमेश्वर का
अभिमान करनेवाले को इसी पञ्च भौतिक शरीर में परमेश्वर सम्बन्धी अणिमादि सिद्धियों का
उद्गम हो जाता है, किन्तु उन सिद्धियों से पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती है। देहभान के संकोच
के प्राप्त होने पर ही और संकुचित प्राण के गल जाने से ठीक-ठीक बोध होने लगता है। जिसको
व्यवहार साधन में, हेतुसमूह में असिद्धता का अभिमान होता है। उसका व्यामोह व्यवहार
साधनों से दूर करना चाहिए। जिसका किसी प्रकार व्यामोह दूर न हो सके तो वहाँ पर समझना
होगा कि ईश्वर की शक्ति के बल से मूढ़ता ही बनी रहेगी, कदाचित् कान में भनक पड़ने पर
संस्कार के परिपक्वता से कभी न कभी एक दिन अवश्य स्वरूप लाभ हो जायेगा, इसी को 'कर्तरि'

१. अष्टसिद्धि—अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व । नवनिधि—पद्म,
महापद्म, शंख, पकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, खर्वी ।
२. निष्कम्प आत्मसंवित्तौ जीवन्मुक्तोऽभिधीयते ।
तत्त्वे विकल्पमानस्तु पिण्डपाताच्छिवं व्रजेत् ॥'
आत्मज्ञान में अचल स्थिति हो जाने पर जीवन्मुक्त कहलाते हैं। किन्तु तत्त्वस्वरूप के विषय
में अभी आंशिक विकल्पमानता बनी हुई है उसका शरीर गिरने तक ही विकल्पमानता रहती है बाद
में तो शिव स्वरूप में स्थिति हो ही जाती हैं। इसको अन्यत्र आचार्य ने भी कहा है।
संसारजीर्णतरुमूलकलापकर्म संकल्पसान्तरतया परमार्थवह्नेः ।
स्युर्विस्फुलिङ्गकणिका अपि चेत्तदन्तर्देदीप्यते विमलबोधहुताशराशिः ॥

अ.-२, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३३
तदेवं 'कर्तरि' ( १।१।२ ) इत्यादिश्लोकद्वयेन यदुक्तं 'तदेव 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादिश्लोकत्रयेणो-
पस्कृत्य पुनर्निंरूपितम्, एवं-भूतं तावत् प्रमाणं तदेवं-भूते भगवति कथमुपपद्यताम् । ततश्च युक्तमुक्तं
शास्त्रादाविति भङ्ग्यन्तरेण इदानीं तदेव निर्वाहतिम्, —इति शिवम् ॥ १७ ॥ आदितः १२० ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां प्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां क्रियाधिकारे
मानतत्फल-मेयनिरूपणं नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३ ॥
अथ द्वितीये क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणाख्यं
चतुर्थमाह्निकम्
भावानाभासयन् कर्ता निर्मले स्वात्मदर्पणे ।
कार्यकारणभावं च यश्चित्रं तं स्तुमः शिवम् ॥
क्रियाशक्तिस्फारप्रायसम्बन्धाभिधानप्रसङ्गात् ज्ञाप्यज्ञापकभावस्य तत्त्वं प्रसाध्य, कार्य-
कारणभावस्य तत्त्वं प्रसाधयितुं श्लोकैर्विंशत्या आह्निकान्तरमारभ्यते, —'एष च' इत्यादि
'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' इत्यन्तम् । तत्र श्लोकेन स्वमते कर्तृकर्मभाव एव कार्यकारण-
भावः, —इत्युपक्षिप्यते । ततः श्लोकत्रयेण जडस्य कारणत्वं पराक्रियते । ततः श्लोकषट्केन
चेतनस्यैव कर्तृतारूपा कारणता प्रसाध्यते । ततः प्रसङ्गादनुमाने नियतिशक्तिरवश्योपजीव्या,—
इति श्लोकत्रयेणोच्यते । सौगतोक्तकार्यकारणभावपरमार्थोऽपि अस्मत्पक्षमेवावलम्बते, नो चेत् न
किञ्चित्, —इति त्रिभिः श्लोकैः; सांख्योपदर्शितोऽपि कार्यकारणभावो नोपपद्यते, यद्यस्मदुक्तं
( १-१-२ ) इत्यादि दो श्लोकों से कहा गया है । 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादि तीन श्लोकों से स्पष्ट
करके फिर से निरूपित किया गया है, ऐसा प्रमाण इस स्वरूप में रहनेवाले भगवान् में कैसे घट
सकता है । इसलिए समुचित ही शास्त्रादि में 'कर्तरि-ज्ञातार' इस रूप में दूसरी भङ्गी से कहा
है —इसीका निर्वाह किया गया है ॥ १७ ॥
तृतीय आह्निक समाप्त
जो सदाशिव अपने शुद्ध संविद्रूप दर्पण में पदार्थभावों को भासित करते हुए कार्य-कारण-
भाव को भी अपने में भासित करते हैं—ऐसे विचित्र शिव की हम स्तुति करते हैं ।
क्रिया-शक्ति का विस्तार सम्बन्ध के कथन के प्रसंग से ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव तत्त्व को
प्रकाशित करके, कार्य-कारणभाव के तत्त्व को सिद्ध करने के लिए इक्कीस श्लोकों से दूसरा
आह्निक प्रारम्भ करते हैं, —'एष च' इत्यादि से लेकर 'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' यहाँ
तक । उसमें प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त में कर्तृ-कर्मभाव का कार्य-कारणभाव दिखायेंगे ।
इसके पश्चात् तीन श्लोकों से जड वस्तु की कारणता का निषेध करेंगे । अनन्तर चेतन की ही
कर्तृतारूप कारणता को छः श्लोकों से सिद्ध करेंगे । प्रसंग से नियति-शक्ति का अनुमान में अवश्य
उपयोग करना चाहिए, यह तान श्लोकों से दिखाया जायेगा । अनन्तर सौगत के द्वारा प्रति-
पादित कार्य-कारणभाव की परमार्थता हमारे ही सिद्धान्तपक्ष को सिद्ध करता है । यदि नहीं
संसाररूपी जीर्णतरु का मूलसमूह जो कर्म संस्कार-संकल्प है उससे व्यवहित = अवकाश युक्त
होने के कारण यदि परनार्थवह्नि की चिनगारियां दिखती भी हो, तो भी अन्तर भाग में विमल बोध-
रूपी अग्निराशि जाज्वल्यमान ही रहती है ।
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