सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 256

अ.-२, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३३
तदेवं 'कर्तरि' ( १।१।२ ) इत्यादिश्लोकद्वयेन यदुक्तं 'तदेव 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादिश्लोकत्रयेणो-
पस्कृत्य पुनर्निंरूपितम्, एवं-भूतं तावत् प्रमाणं तदेवं-भूते भगवति कथमुपपद्यताम् । ततश्च युक्तमुक्तं
शास्त्रादाविति भङ्ग्यन्तरेण इदानीं तदेव निर्वाहतिम्, —इति शिवम् ॥ १७ ॥ आदितः १२० ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां प्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां क्रियाधिकारे
मानतत्फल-मेयनिरूपणं नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३ ॥
अथ द्वितीये क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणाख्यं
चतुर्थमाह्निकम्
भावानाभासयन् कर्ता निर्मले स्वात्मदर्पणे ।
कार्यकारणभावं च यश्चित्रं तं स्तुमः शिवम् ॥
क्रियाशक्तिस्फारप्रायसम्बन्धाभिधानप्रसङ्गात् ज्ञाप्यज्ञापकभावस्य तत्त्वं प्रसाध्य, कार्य-
कारणभावस्य तत्त्वं प्रसाधयितुं श्लोकैर्विंशत्या आह्निकान्तरमारभ्यते, —'एष च' इत्यादि
'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' इत्यन्तम् । तत्र श्लोकेन स्वमते कर्तृकर्मभाव एव कार्यकारण-
भावः, —इत्युपक्षिप्यते । ततः श्लोकत्रयेण जडस्य कारणत्वं पराक्रियते । ततः श्लोकषट्केन
चेतनस्यैव कर्तृतारूपा कारणता प्रसाध्यते । ततः प्रसङ्गादनुमाने नियतिशक्तिरवश्योपजीव्या,—
इति श्लोकत्रयेणोच्यते । सौगतोक्तकार्यकारणभावपरमार्थोऽपि अस्मत्पक्षमेवावलम्बते, नो चेत् न
किञ्चित्, —इति त्रिभिः श्लोकैः; सांख्योपदर्शितोऽपि कार्यकारणभावो नोपपद्यते, यद्यस्मदुक्तं
( १-१-२ ) इत्यादि दो श्लोकों से कहा गया है । 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादि तीन श्लोकों से स्पष्ट
करके फिर से निरूपित किया गया है, ऐसा प्रमाण इस स्वरूप में रहनेवाले भगवान् में कैसे घट
सकता है । इसलिए समुचित ही शास्त्रादि में 'कर्तरि-ज्ञातार' इस रूप में दूसरी भङ्गी से कहा
है —इसीका निर्वाह किया गया है ॥ १७ ॥
तृतीय आह्निक समाप्त
जो सदाशिव अपने शुद्ध संविद्रूप दर्पण में पदार्थभावों को भासित करते हुए कार्य-कारण-
भाव को भी अपने में भासित करते हैं—ऐसे विचित्र शिव की हम स्तुति करते हैं ।
क्रिया-शक्ति का विस्तार सम्बन्ध के कथन के प्रसंग से ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव तत्त्व को
प्रकाशित करके, कार्य-कारणभाव के तत्त्व को सिद्ध करने के लिए इक्कीस श्लोकों से दूसरा
आह्निक प्रारम्भ करते हैं, —'एष च' इत्यादि से लेकर 'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' यहाँ
तक । उसमें प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त में कर्तृ-कर्मभाव का कार्य-कारणभाव दिखायेंगे ।
इसके पश्चात् तीन श्लोकों से जड वस्तु की कारणता का निषेध करेंगे । अनन्तर चेतन की ही
कर्तृतारूप कारणता को छः श्लोकों से सिद्ध करेंगे । प्रसंग से नियति-शक्ति का अनुमान में अवश्य
उपयोग करना चाहिए, यह तान श्लोकों से दिखाया जायेगा । अनन्तर सौगत के द्वारा प्रति-
पादित कार्य-कारणभाव की परमार्थता हमारे ही सिद्धान्तपक्ष को सिद्ध करता है । यदि नहीं
संसाररूपी जीर्णतरु का मूलसमूह जो कर्म संस्कार-संकल्प है उससे व्यवहित = अवकाश युक्त
होने के कारण यदि परनार्थवह्नि की चिनगारियां दिखती भी हो, तो भी अन्तर भाग में विमल बोध-
रूपी अग्निराशि जाज्वल्यमान ही रहती है ।
३०