ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६
अन्यस्य अभावे अणव एव, ते च यदि संयुज्यन्ते निरन्तरतया तत् अवश्यं दिग्भागभेदः, देवनाक्षे
षट्सु दिक्षु संचीयमानेषु षट्सु अणुषु मध्यमस्य परमाणोः यत्रैव धाम्नि एको लग्नः तत्रैव यदि
अपरः तत् एकपरमाणुमात्रता । अथ अन्यत्र एकः अन्यत्र अपरः तत् अवश्यं भागभेदापत्तिः, इति
भाग एव परमार्थसन्, तस्यापि एषैव सरणिः इति न किंचित् अवशिष्यते बाह्यं तत्त्वतः । न
चैतत् वाच्यम् — मूर्तानाम् एकदेशत्वायोगात्, संयोगे भिन्नदेशत्वाव्यावृत्तेः तन्निष्ठं द्व्यणुकं नाम
कार्यद्रव्यम् अणुपरिमाणम्, तेभ्यः त्रिभ्यो महत्कार्यम् इति । अवयविवादो हि अयम्, स च
पूर्वमेव अपबाधितः । यच्च अव्याप्यवृत्तित्वं संयोगस्य उच्यते तन्निरंशे कथं संगच्छताम् । स्वाश्रये
हि यदि असौ समवैति किम् अन्यत् अस्य अवशिष्टम् यत् न व्याप्नुयात् इति, अभ्युच्चयबाधकं
च इदम्, इति न अत्र अस्माभिः भरः¹ कृतः । विस्तरेण च प्रज्ञालङ्कारे दर्शितम् आचार्यशंकर-
नन्दनेन ॥ ६ ॥
अवयवी वस्तु ही नहीं है तो अवयव किसमें रहेगा, यही वृत्ति की अनुपपत्ति है, समवाय की भी
तो असिद्धि हो जाती है, क्योंकि अवयव अवयवी की सत्ता में ही समवाय की सत्ता रहती है,
कम्पन-अकम्पन [ स्थैर्य ] आवरण-अनावरण, रक्त-अरक्तादि दिशाओं का भेद विरुद्ध धर्मों के
संयोग मूर्त में बाध माना जाता है। अणु समुदायवाद में भी अणु समुदाय दूसरे परमाणु
विलक्षण के अभाव में अणु ही रह जाते हैं और वे यदि निरन्तर संयुक्त होकर मिले रहते हैं तब
तो अवश्य ही दिशाओं से उपलक्षित होनेवाले भाग का भेद हैं, ऐसी स्थिति में तो दिशाओं में
भी भेद मानना पड़ेगा, षट् कोणवाली दिशाओं का ही भेद होता है, परमाणुओं का संयोग-
वियोग भी बन सकता है इसो प्रकार वहाँ पर भी मान लो, इसीलिए यथार्थता में बाह्य कोई
पदार्थ नहीं है और वह एक परमाणु मात्र का समर्थन भी नहीं कर सकता है मूर्तों के एक स्थान
में रहना असम्भव होने से, संयोग हो जाने पर भिन्न देश में रहना नहीं बनेगा उसमें रहनेवाले
दो परमाणु कार्य द्रव्य अणुपरिणाम ही रहेगा तीन परमाणु से महत् कार्य होता है। इस अवयवि-
वाद का तो हमने पूर्व में ही खण्डन कर दिया है।
अव्याप्यवृत्ति संयोग अक्षपाद के मत की आशङ्का कर कहते हैं ‘यच्चेति’—संयोग का
अव्याप्यवृत्तित्व निरंश में कैसे हो सकेगा। यदि यह कहो कि अपने आश्रय में संयोग रहता है
तो कौन वस्तु ऐसी है जहाँ पर संयोग व्याप्त नहीं होता है और यह बाधकों की भरमार है इसलिए
हमने कोई जोर नहीं दिया है और इसका सविस्तार प्रतिपादन श्रीआचार्य शङ्करनन्दन ने
प्रज्ञालङ्कार में किया भी है ॥ ६ ॥
होगा, आवरण हट जाने से तो ग्रहण होता है, इस प्रकार एक साथ भी ग्रहण होता है। अब कहो कि
अवयवी का सम्बन्ध एक-एक अवयवी के साथ रहता है अथवा सम्पूर्णतया रहता है, एक देश से
[ वृत्ति का ] रहना बन नहीं सकता है; अवयव से भिन्न एक देश का अभाव होने से, अथवा सम्पूर्णतया
रहता है यह कहो तो भी दूसरे अवयव में वृत्ति नहीं रहती है; क्योंकि एक अवयव के संसर्गावच्छिन्नरूप
में दूसरे अवयवों का स्थान न रहने से, उस स्वरूप से अतिरिक्त इसका दूसरा स्वरूप नहीं होने से भी
यह बात है ।
१. भरः—शब्द अतिशय प्रयत्न—अर्थ में है ।
अ.-१, आ.-५, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९३
ननु बाधकं नाम प्रमाणसिद्धे वस्तुनि न किंचित् कर्तुं समर्थम्—तेनैव दृढेन प्रमाणेन
बाधकाभिमतस्य बाधितस्य अप्रमाणत्वसम्पादनात् । दर्शितं च इह साधकं प्रमाणं कार्यहेतुः
'तत्तदाकस्मिकाभास' इति कारिकया इत्याशङ्क्य आह—
चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः ।
योगोव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ७ ॥
इह तावत् स्वप्न-स्मरण-मनोराज्य-संकल्पादिषु नीलाद्याभासवैचित्र्यं बाह्यसमर्पकहेतु-
व्यतिरेकेणैव निर्भासते इति यद्यपि अस्ति सम्भवः, तथापि तदाभासवैचित्र्यम् अस्थैर्यात्
सर्वप्रमात्रासाधारण्यात् पूर्वानुभवसंस्कारजत्वसम्भावनात् अवस्तु इति शङ्क्येत । यत् पुनरिदं
योगिनाम् इच्छामात्रेण पुरसेनादिवैचित्र्यनिर्माणं दृष्टम्, तत्र उपादानं प्रसिद्धमृत्काष्ठ-शुक्र-
शोणितादिवैचित्र्यमयं न सम्भवत्येव, न हि एवं वक्तुं शक्यम्—सर्वगताः परमाणवो योगीच्छया
झटिति संघटिताः कार्यम् आरप्स्यन्ते इति । यत एतत् लोकप्रसिद्धकारणभावानतिक्रमसिद्धये
अब प्रश्न करते हैं कि प्रमाण से सिद्ध वस्तु में बाधक प्रमाण कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि
उस दृढ प्रमाण से जिसको बाधक माने हुए हो उसमें अप्रमाणत्व सम्पादित हो जाता है और
इसमें साधक प्रमाण तो कार्य का हेतु है इसे 'तत्तदाकस्मिकाभासः' इस कारिका में दिखा दिया
है; इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं—
चिदात्मा देव ही अपने भीतर स्थित अर्थसमूह को इच्छाबल से बाहर की ओर प्रकाशित
करते हैं जैसे योगी उपादान कारणादि के बिना भी अर्थसमूह को प्रकाशित करते हैं ॥ ७ ॥
स्वप्न, स्मरण, मनोराज्य, संकल्पादि में बाहरी कारणों के बिना भी नीलादि पदार्थ चित्र-
विचित्र रूपों से भासित होते हैं, यह सब संभव है, उसी प्रकार आभास की विचित्रता अस्थिर
होने से सभी प्रमाताओं में असाध्य होने के कारण पूर्वकाल के संस्कार से ही उत्पन्न होती
है इसलिए अवस्तु ही है । जो कि यह योगी लोगों की इच्छा मात्र से पुर, सेना, गढ़-किला आदि
का विचित्र-चित्र निर्माण देखा जाता है उसमें प्रसिद्ध उपादन [ कार्य से अभिन्न रहता है जैसे घट
के प्रति मिट्टी उपादान कारण होती है ] मिट्टी, काष्ठ, शुक्र, शोणितादि वैचित्र्यमय कारणों की तो
संभावना भी नहीं देखी जाती है, ऐसा नहीं कह सकते हो—योगी की इच्छामात्र से सब जगह
रहनेवाले व्यापक परमाणु आपस में एक दूसरे से मिलकर शीघ्र ही कार्य संपादन कर देते हैं ।
जब कि यह लोक प्रसिद्ध कार्य-कारणभाव अनतिक्रम सिद्धि के लिए निरूपण करते हैं । यह प्रसिद्ध
१. जिन लोगों ने अपना परम संविद्रूप स्वातन्त्र्य नहीं जाना है उन्हें सदैव संशय-विपर्यय बने ही रहते
हैं । जिन्होंने संविद्रूप स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लिया है उन्हें तो कभी-कभी दूसरे कारण को खोजने के लिए
अन्वेषण नहीं करना पड़ता है । इस विषय में "भट्टदिवाकरवत्स" ने कहा है 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभास-
शक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनेकहेतुः ॥
हे प्रभो ! आपकी प्रतिभा-शक्ति से भिन्न कोई निमित्त अर्थवैचित्र्य के लिए स्वप्न काल में
भी नहीं दिखते हैं । विश्वप्रपञ्च का विस्तार करने में एक मात्र कारण संविद्रूप का सामर्थ्य ही है ।
२. घटरूप कार्य से अभिन्न रहनेवाला उपादान कारण कहलाता है जैसे कि घट के प्रति मिट्टी ।
९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-७
निरूप्यते । न च एतत् प्रसिद्धम्—परमाणुभ्य एव स्थूलं घटादि जायते इति, किं तु कपालादि-
व्यवधानेन, तत्रापि नियंतसहकारिसमवलम्बनम् करचरणादिव्यापारो विशिष्टदेशकालधर्माधि-
पत्ययोगः शिक्षाभ्यासप्रकर्ष इति, इयति च आश्रीयमाणे योगी कुम्भं निर्मिमाणः कुम्भकार-
प्रसिद्धसमस्तसामग्रीसमर्जनपुरःसरं घटं घटयन् कुम्भकार एव स्यात्, तस्मात् प्रसिद्धकार-
णोल्लङ्घने किम् असंचेत्यमानपरमाण्वाद्युपादानकारणान्तरचिन्तया इति । तत्र योगिसंविद एव
सा तादृशी शक्तिः—यत् आभासवैचित्र्यरूपम् अर्थजातं प्रकाशयति इति । तत् अस्ति सम्भवः—
यत् संवित् एव अभ्युपगतस्वातन्त्र्या अप्रतीघातलक्षणात् इच्छाविशेषवशात् संविदोऽनधिकात्म-
ताया अनपायात् अन्तःस्थितमेव सत् भावजातम् इदमित्येवं प्राणबुद्धिदेहादेः वितीर्णकियन्मात्र-
संविद्रूपात् बाह्यत्वेन आभासयति इति, तत् इह विश्वरूपाभासवैचित्र्ये चिदात्मन एव स्वातन्त्र्यं
किं न अभ्युपगम्यते स्वसंवेदनसिद्धम्, किमिति हेत्वन्तरपर्येषणप्रयासेन खिद्यते । एवकारेण
इदमाह—सर्वेण तावत् वादिना विषयव्यवस्थापनं संविद्रूपम् अनपह्नवनीयम् आदिसिद्धं हि
तत् इति उक्तम् । तस्य च स्वातन्त्र्यमेव देवशब्दनिर्दिष्टं चिद्रूपत्वम्, इति किम् अपकारणान्वेषण-
व्यसनितया । हि यस्मात् एवं प्रकाशयति देव इति सम्भाव्यते, तस्मात् किं बाह्येन अनुपप-
त्तिना, इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ७ ॥
नहीं है कि परमाणुओं से ही घटादि की उत्पत्ति होती हो । किन्तु दो कपाल आपस में जब मिलते
हैं तभी घट तैयार होता है, उसमें भी नियत सहकारी कारणों [घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहने-
वाले जैसे चक्र, दण्ड, चीवरादि सहकारी कारण कहलाते हैं] का अवलम्बन करना, हाथ, पैर आदि
के व्यापार विशिष्ट देश-काल धर्म का योग होना अपेक्षित है । घट निर्माण के लिए घट सम्बन्धी
शिक्षा, ज्ञान एवं अभ्यास का होना आवश्यक होता है । इतनी वस्तु-सामग्री के रहने पर योगी
घट बनावे तो कुम्भकार ही सिद्ध हो जायेगा, इसलिए प्रसिद्ध कारण के उल्लंघन करने में जो
संभव नहीं है उस परमाणु से भिन्न कारण की चिन्ता करना व्यर्थ है । उसमें तो योगी के ज्ञान की
ही वह वैसी शक्ति है—जो आभास वैचित्र्यरूप से अर्थसमूह को प्रकाशित करती है । इसलिए
संभव हो सकता है जो कि संवित् ही अपनी मिली हुई स्वतंत्रता से, निर्बाधरूप से, इच्छा विशेष
से, अधिक न होनेवाली संवित् का नाश न होने से, भीतर रहनेवाले पदार्थ समूह को ही बाहर
में प्राण, बुद्धि, देहादि रूप से, कुछ फैली हुई संविद्रूप से, बाहर में आभासित करती है, इसलिए
बाहर के भावपदार्थों की विचित्र-चित्ररूपता में चिदात्मा का ही स्वातन्त्र्य क्यों नहीं मान लेते हो
जोकि वह स्वयं संवेदन ज्ञान से सिद्ध है, क्यों दूसरे-दूसरे हेतु के खोजने के परिश्रम से खिन्न होते
हो । 'एवकार' शब्द से यह कहते हैं कि सब वादी से विषय की व्यवस्था संविद्रूप मानो जाती है जो
कि आदि सिद्ध है उसे हमने पहले ही कह दिया है और उसके स्वातन्त्र्य को 'देव' शब्द से व्यक्त
किया है, क्यों दूसरे कारण को खोजने में व्यसनी बनते हो, 'हि' जिससे ऐसा यह देव प्रकाशित
होता है, ऐसी संभावना करना संभव हो सकता है । इसलिए बाह्य कारण की क्या आवश्यकता
है जबकि बन नहीं सकता ॥ ७ ॥
१. 'इति' शब्द वाक्य की समाप्ति अर्थ में दिया गया है ।
२. घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहनेवाले का नाम सहकारी कारण है । जैसे घट के प्रति दण्ड-चक्रादि ।
अ.-१, आ.-५, का.-८-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९५
ननु एवम् उभयथापि सम्भावनानुमानम् उन्मिषति, तत्र किं मुकुरप्रतिबिम्बितघटादि-
दृष्टान्तेन ज्ञानप्रतिबिम्बिताभासबैचित्र्ये विज्ञानदर्पणातिरिक्तं तत एव बाह्याभिमतं हेतुं कल्पयेम ?
किं वा योगिदृष्टान्तेन संवित्स्वातन्त्र्यमेव हेतुभावेन ब्रूयाम ? तदिदं सांशयिकं वर्तते इति आशङ्क्य
बाह्यार्थानुमानसम्भावनां सूत्रद्वयेन अपाकर्तुमाह—
अनुमानमनाभातपूर्वे नैवेष्टमिन्द्रियम् ।
आभासमेव बीजादेराभासाद्वेतुवस्तुनः ॥ ८ ॥
आभासः पुनराभासाद्बाह्यस्यासीत्कथंचन ।
अर्थस्य नैव तेनास्य सिद्धिर्नाप्यनुमानतः ॥ ९ ॥
न केवलम् अनन्तरश्लोकनिर्दिष्टाभिः युक्तिभिः प्रत्यक्षेण बाह्योऽर्थो न आभासते, इयदेव
हि प्रत्यक्षं—यत् नीलं भाति इति स्वप्रकाशसंविद्रूपं, नाधिकं किञ्चित् इति, यावत् अनुमानेनापि
न अस्य बाह्यस्य सिद्धिः इति अपिशब्दः । तत्र अनुमानम् अत्र नैव प्रवर्तितुम् उत्सहते । प्रवृत्त-
मपि न प्रकृतसिद्धम् आदध्यात् इति अनेन सूत्रद्वयेन दर्श्यते । तत्र अनुमानं—विकल्पः, सर्वश्च
अयं विकल्पोऽनुभवमूल इति प्रसिद्धम् । तेन यत् सर्वथा अनाभातपूर्वम्—अननुभूतचरं तत्र
अब शंका करते हैं कि आगे कही जानेवाली दोनों तरह की संभावना से अनुमान निकलता
है, [ सर्वथा ही दूसरे में रहनेवाले अनुमान को सिद्ध करना होगा और उस सम्भावनारूप अनुमान
से तो दोनों समान ही विकसित होंगे अतः इसमें फिर किसका त्याग किया जाय और किसका
ग्रहण किया जाय । ] घटादि का दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान अथवा ज्ञान में जो
प्रतिबिम्बता का आभास है उसकी विचित्रता में विज्ञान दर्पण से भिन्न और उसीसे बाहर माने
हुए [ अपने सदृश दूसरे भाव-पदार्थ का संक्रमण होना ] हेतु की क्या कल्पना करोगे ? अथवा योगी
के दृष्टान्त से ज्ञान की ही स्वतन्त्रता को हेतुभाव से क्या हम कहेंगे ? यही बात सन्देह में पड़ी
हुई है ऐसी आशंका कर बाह्यार्थ के अनुमान की सम्भावना को दूर करने के लिए दो श्लोकों से
कहते हैं—
पूर्व में जिसका आभास नहीं हुआ है उसका अनुमान नहीं होता, हेतु देने योग्य जो
बीजादि वस्तु है उस आभास से इन्द्रियाँ आभासित ही होती हैं ॥ ८ ॥
बाहर के आभास से किसी भी तरह उसका आभास था इसलिए बाहर का अनुमान नहीं
हो सकता है, हेतु से अर्थ की सिद्धि नहीं हो सकती और अनुमान से भी नहीं हो सकती ॥ ९ ॥
इसके पूर्व में दिखाये गये श्लोक की युक्तियों से भी नहीं अपितु प्रत्यक्षरूप से भी बाह्य
अर्थ नहीं आभासित होता है, इतना ही प्रत्यक्ष है जो नील आभासित होता है—इसे पूर्व में ही
कह दिया है, अब कुछ भी अधिक कहना शेष नहीं रह जाता है। 'अपि' शब्द का अर्थ है कि
अनुमान से भी इसकी सिद्धि नहीं होगी। अनुमान की भी इसमें प्रवृत्ति नहीं होती है। प्रवृत्त हो
भी जाय तो भी बाह्यार्थ की सिद्धि नहीं कर सकता, यह बात दोनों सूत्रों से बतलायी जाती है।
अनुमान-विकल्प करना, और समस्त विकल्प अनुभव मूलक ही रहता है यह सर्वजन विदित ही
९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-८-९
अनुमानम् अनुमितिव्यापारो विकल्पात्मा नैव केनचित् वादिना इष्यते । ननु भवतु प्रत्यक्षतो
दृष्टेऽनुमाने संकथा इयम्, सामान्यतो दृष्टे तु किं वक्ष्यसि यथा अर्थोपलब्धया इन्द्रियानुमाने ?,
उच्यते—तत्रापि विकल्पेन यथा सोऽर्थः स्पृश्यते तथा अनुमेय इति स्थितः । विकल्पश्च न
इन्द्रियादिकम् अर्थं केनचित् संनिवेशविशेषात्मना स्पृशति, अपि तु किंचिदुपलब्धेः कारणम् इति
अमुना स्वभावेन, स च स्वभावः कारणतालक्षणः प्रत्यक्षगृहीत एव । तथा च बीजात् अङ्कुरः
तन्तुभ्यः पट इत्यादौ कार्यकारणभावः प्रत्यक्षानुपलम्भबलेन तावत् निश्चेयः । तत्र च प्रत्यक्षं
प्रत्याभासं प्रामाण्यं भजते, विमर्शलक्षणस्य प्रमितिव्यापारस्य एकैकशब्दवाच्येऽर्थे विश्रान्तेः,
तदनुसारित्वाच्च प्रमाणस्य इति वक्ष्यते । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ।' इति ।
आभासमात्रं च सामान्यम् इति निर्णेष्यते । अनुपलम्भोऽपि अन्योपलम्भरूप आभासमात्रविश्रान्त
एव—इति कारणाभासो विशेषशून्यः परिगृहीत एव बीजात् अङ्कुर इति प्रतीतो यत् यं-यं
नियमम् अनुविधत्ते अव्यतिरिक्तम् तत् तस्य कार्यम्, इति प्रतिघटं मृत्तिकादिरूपस्य हेतुतद्धन्मा-
त्रस्य आभासात्, साभासात् बाह्यः पुनरनाभासरूपः, स च आभासते इति विप्रतिषिद्धम् ।
अनाभाते च नास्ति विकल्परूपस्य अनुमानस्य व्यापारः । ग्रामगृहादेस्तु यत् बाह्यं तत्
अग्रामादिरूपं न उच्यते—प्रत्येकं वाटातूपकुड्यतुलादेः बाह्यत्वप्रसङ्गात् अपि तु तत्संनिकृष्टम्,
तस्मात् ग्रामबाह्यम् आभासबाह्यम् इति च शब्दसाम्यमात्रम् एतत् न वस्तुसाम्यम् । एवं ये
है। इसलिए जिसका पूर्व में आभास नहीं हुआ है उसमें अनुमान जो अनुमिति का व्यापार है
उसका विकल्परूप किसी भी वादी को इष्ट नहीं है, भले ही प्रत्यक्ष से दृष्ट अनुमान के रहने पर हो,
किन्तु सामान्यतो दृष्ट में क्या कहोगे, जैसा कि अर्थ उपलब्धि से इन्द्रियों के अनुमान में ? उत्तर
देते हैं—सविकल्प और निर्विकल्प का प्रत्यक्ष में भी विकल्प से जैसा अर्थ आभासित होता है वैसा
ही अनुमेय भी होता है और विकल्प किसी संनिवेश विशेष से इन्द्रियादि पदार्थ को नहीं स्पर्श
[ प्रकाशित ] करता है, अपि तु किंचित् उपलब्धि के कारण इन्द्रियाँ हैं इसी कारण से, और वह
स्वभाव प्रत्यक्ष से ही गृहीत होता है । वैसा ही बीज से अंकुर और तन्तु से पट इत्यादि में कार्य-
कारणभाव प्रत्यक्ष और अनुपलब्भ से निश्चय होता है । और प्रत्यक्ष तो सभी आभास में प्रमाण
होता है, विमर्शरूप जो प्रमा का व्यापार है उसके अभिधेय अर्थ में भासित होता है, और
तदनुसार प्रमाण कहेंगे । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता' और आभास मात्र को
सामान्य रूप से निर्णय करेंगे । अनुपलब्भ को भी अन्य उपलम्भरूप आभासमात्र में ही विश्रान्त
रहेगा, जिसके रहने पर जो नियम से होता है वही उसका कार्य माना जाता है जैसा कि मिट्टी से
घट और बीज से अंकुररूप, प्रत्येक घट में मिट्टी का आभास रहता है उसी का हेतुरूप से आभास
होता है, जब आभास सहित होने के कारण बाह्य अनाभास रूप है और भासित होता है यह तो
परस्पर विरुद्ध है । जब अनाभास होनेसे विकल्परूप अनुमान का व्यापार नहीं बन सकता । ग्राम,
गृहादि से जो वस्तु बाह्य है उसे अग्राम, गृहादिरूप नहीं कहा जाता है यदि बाह्यरूप माना जाय,
तो फिर प्रत्येक देश में रहनेवाले भित्तिका अर्थात् दीवाल, तुलादि को भी बाह्य रखना होगा ।
अपितु उसके भीतर की ही बात कही जाती है ग्राम के बाहर होने पर भी ग्राम की ही ये वस्तुएँ
हैं ओर यह व्यवहार देखा भी जाता है, इसलिए ग्राम से बाह्य और आभास बाह्य मात्र एक
कथन ही है वस्तु साम्य नहीं है अर्थात् इसमें दूसरा कोई अभिप्राय नहीं है । एवं विकल्प में वस्तु
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९७
विकल्पे वस्तु न आभाति इति मन्यन्ते तेषामपि तावत् अनुमानविकल्पो न बाह्ये उपपन्नः ।
अस्माभिस्तु उपपादितम्—अध्यवसायस्यापि आभासमानविषयत्वम् 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य'
इति सूत्रे । तेन अनुमानविकल्पात्मनापि प्रकाशेन यदि अनाविष्टो नीलादिः अर्थः तत् न अनुमित
एव स्यात् । अथ आविष्ट एव, तर्हि 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति न्यायेन प्रकाशमात्रस्वभाव
एव, न बाह्यः । तेन बाह्ये साध्ये यत् किंचित् प्रमाणम् आनीयते, तदबाह्यतामेव प्रत्युत
प्रसाधयति इति विरुद्धमेव, अत एव आह 'कथंचन' इति, केनापि प्रकारेण प्रत्यक्षात्मना अनु-
मेयात्मना वा आभासनम् आभासो बाह्यस्य अनाभासस्य न कदाचित् अभूत् इति, तस्मात् सिद्धम्
'चिदात्मैव हि देव' इति ॥ ८-९ ॥
ननु अन्तःस्थितं बहिः प्रकाशयेदित्युकतं तत् अन्तःस्थितत्वम् उपपादनीयम् इति
आशङ्क्य आह—
स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ।
अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ १० ॥
आभासित नहीं होती है ऐसा जो बौद्ध मानते हैं, उनका भी अनुमान विकल्प बाह्य में नहीं हो
सकता । किन्तु हमने तो इसका 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' सूत्र में प्रतिपादन कर दिया है [ 'भ्रान्तित्वे'
यह उपलक्षण है, इसलिए 'भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्' इत्यादि से कहा है और 'केवलं भिन्नसंवेद्यः'
इत्यादि में कहेंगे ] इसलिए अनुमान विकल्परूप प्रकाश से यदि नीलादि अर्थ आविष्ट नहीं है तो
उसका अनुमान नहीं बनेगा; यदि कहो कि आविष्ट है तो 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इस युक्ति से
प्रकाशमात्र स्वभाव ही होगा, बाह्य नहीं है । बाह्य साध्य में जो कुछ प्रमाण ले आयेंगे वह तो
अबाह्यत्व को ही सिद्ध करेगा इसमें तो आपको विरुद्ध ही दिखायी पड़ेगा, इसलिए कहते हैं
'कथंचन' किसी प्रकार भी प्रत्यक्षरूप से, अनुमेयरूप से आभासन वा आभास का अनाभास कभी
भी नहीं हुआ, इसलिए 'चिदात्मैव हि देवः' चिदात्मा ही देव है—यह सिद्ध हुआ ॥ ८-९ ॥
अब इस पर प्रश्न करते हैं कि अन्तःकरण में अवस्थित रहे हुए का ही बाहर में प्रकाश
होता है ऐसा जो कहा गया है उसे ही सिद्ध करना है [ यदि चिदात्मा देव में रहनेवाली पदार्थ राशि
है तो फिर क्यों नहीं भासित होती है इसे युक्ति द्वारा साधते हैं ] इस तरह आशंका कर कहते हैं—
चिदात्मा देव में रहनेवाले ही अर्थ-समूह भासित होते हैं । इसलिए उनमें अर्थराशि तो
रहतो है किन्तु इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता है ॥ १० ॥
१. संवेदन ज्ञान के भीतर बाह्य अर्थ का प्रतिबिम्ब रहता है प्रतिबिम्बरूप आभास का उत्थापक है अर्थात्
अन्तःकरण में ज्ञान का आभास तभी रहता है जब बाहर में पदार्थ विद्यमान रहता है इसमें कोई
प्रमाण नहीं है इससे सिद्ध होता है कि चिदात्मा देव ही सब कुछ है बाह्यरूप कुछ भी नहीं है ।
२. बाहर में अवभासित होनेवाले पदार्थ समूह का अवभासन केवल इदन्तारूप से ही होना यह सकल
लोक में प्रसिद्ध नहीं है जब कि भगवान् महेश्वर में अन्तःस्थितरूप से भी अवभासन रहता ही है, और
बाहर में इदन्ता का उल्लास न होने कारण अहन्तारूप से अन्तर में नहीं है यह भी बात नहीं है अपितु
अन्तर में सदैव आभास बना ही रहता है ।
३. इसका यह आशय है कि चिदात्मा ईश्वर का जैसे अभेद में आभास होता है वैसे ही समस्त अर्थों में
१३
९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१०
बहीरूपतयापि आभासने अन्तरूपता न त्रुट्यति 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' इति हि वक्ष्यते,
तच्च सदैव प्रकाशस्य प्रमातृत्वात्, तदात्मतया च विना प्रकाशमानस्य अवस्तुत्वात्, किं तु तत्र
अहम् इति उचिते परामर्शे योऽयम् इदन्तापरामर्शः सैव बाह्यता, तच्च इह अन्तःस्थितत्वम्
अह मित्येतावता चित्समुचितेनैव वपुषा परामर्शनम्, तच्च इह नीलादीनामस्त्येव, न तु नास्तिइति,
यदि हि न स्यात् कुम्भकृतो 'घटं करवाणि' इति य उत्तरक्रियापेक्षया इच्छाशब्दवाच्यः परामर्शः
एषणीयात्मना, स परामृश्येन अनियन्त्रितः चेत् ततः पटेच्छापि सा न कस्माद्इति संकीर्येरन्
व्यवहाराः । अथ तत्रापि च एषणीयः तदानीमेव निर्मितः सम् तथा जातः, तर्हि तन्निर्माणं चिदा-
त्मनि विनेच्छया नोपपन्नम् इति । 'तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता ।' इत्यत्र वर्णयिष्यते । ततश्च
इच्छान्तरमपि विषयनियन्त्रितं ? न वा ? इति विकल्पेनानवस्था । विषयनियन्त्रितं चेत् स्यात्
आत्मतैव जाता, न चेत् घटे पटेच्छा स्यात् । अथ तत्रापि तदानीमेव इति कृत्वा अनवस्था, तस्मात्
सर्वोऽयं भावराशिः चिदात्मनि अहम् इत्येव वपुषा सततावभासुरवपुः ऐश्वर्यरूपाच्च स्वातन्त्र्य-
लक्षणात् स्वामिभावात् विचित्रेण वपुषा क्रमाक्रमाविना संवित् एनं बहिष्करोति प्रमातृभेदप्रथन-
पदार्थराशि बाहर रूप से प्रकाशित होने पर भी उसका भीतर रहना बना रहता है
खण्डित नहीं होता है 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' क्योंकि ऐसा आगे कहा जायेगा और वह भीतरी
प्रकाश सदैव बाहर में भी प्रकाशित होता रहता है प्रमातारूप होने के कारण और उसके बिना
प्रकाशमान न होने से अवस्तु हो जायेगी किन्तु 'अहं' इस समुचित परामर्श में जो यह इदन्ता
परामर्श है उसी का नाम बाह्यरूपता है और यहाँ पर भीतर रहनेवाले 'अहम्' इस शब्द से
समुचितरूप में परामर्श करना इतना ही माना जाता है वह नीलादि भाव-पदार्थों में रहता ही
है, नहीं रहता है, ऐसी बात नहीं है, यदि वह न रहे तो कुम्भकार 'घटं करवाणि' द्वारा घट का
निर्माण होना, मैं आज घट बनाऊँगा ऐसी आगे की क्रिया को लेकर इच्छा शब्द से कहे जानेवाला
परामृश्यमान जो घट है उससे नियन्त्रित नहीं होगा, तब तो अन्तर में स्थित परामर्श को पट
इच्छा क्यों न मानी जाय ? इस प्रकार सारा व्यवहार संकीर्ण होकर आपस में मिल जायेगा । अब
कहो कि उस समय जो इच्छा का विषय है वह उसी समय उत्पन्न होगा, तब तो चिदात्मा में
बिना इच्छा से कोई वस्तु-पदार्थ का निर्माण ही सिद्ध नहीं हो सकेगा 'तिष्ठासोरेवमिच्छेव
हेतुता ।' इसका वर्णन किया जायेगा और इससे दूसरी इच्छा भी परामृश्यविषय से नियन्त्रित
रहेगी ? या नहीं रहेगी ? ऐसा विकल्प करते करते अनवस्था हो जायेगी । यदि विषय से
सम्बद्धता रखती है तो आत्मस्वरूप ही हो गया, यदि घट में पट इच्छा न हो तो दूसरी इच्छा
में भी इसी ढङ्ग से अनवस्था हो जायेगी, इसलिए समस्त पदार्थराशि अहँरूप चिदात्मा में
निरन्तर भासित होते रहना उसका स्वरूप नहीं है और ऐश्वर्यरूप से, स्वातन्त्र्यरूप से, स्वामी
होने से, चित्र विचित्ररूप कार्य-कारणभाव के क्रम से अथवा अक्रम से संवित् ज्ञान ही इस पदार्थ
राशि को बाहर की ओर प्रकाशित करता है, प्रमातृभेद के विस्तार के साथ, उसमें भी कहीं पर
आभास में प्रमातृवर्ग को एक कर देता है । जैसे नृत्य करनेवाली नर्तकी अपनी भावभङ्गी से
भी अभेद पूर्वक ही आभास होता है—अर्थात् अपने स्वरूप में पदार्थों का भी अभिन्नरूप से ही प्रकाश
है, नहीं तो भासमान होनेवाले अर्थरूपी विषय प्रमाता का इच्छारूप विमर्श नहीं हो सकता है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९९
पूर्वकम्, तत्रापि केचित् आभासे प्रमातॄन् एकीकरोति नितम्बिनीनृत्त इव प्रेक्षकान् । तावति हि
तेषाम् आभासे ऐक्यम् । शरीरप्राणबुद्धिसुखाद्याभासांशेषु तु भेदस्य अविगलनात् न सर्वथा
ऐक्यम् । अत एव प्रतिक्षणं प्रमातृसंयोजनावियोजनावैचित्र्येण परमेश्वरो विश्वं सृष्टिसंहारादिना
प्रपञ्चयति । तदुक्तमाचार्येण—‘सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहार-
तृप्ताय भवते नमः ॥’ इत्यादि । श्रीभट्टनारायणेनापि—‘मुहुर्मुहुरविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः ।
कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ इति । तस्मात् स्थितम् अन्तःस्थितं भावजातं—
तेन विना तद्विषयस्य परामर्शस्य अयोगात् इति ॥ १० ॥
प्रेक्षकवर्ग की दृष्टि को अपनी ओर एक सी कर देती है । उतने अंश में ही उनके आभास में ऐक्य
रहता है । शरीर, प्राण, बुद्धि और सुखादि का आभास के भागों में भेद न टूटने से सर्वथा ऐक्य
नहीं होता है । इसलिए परमेश्वर प्रतिक्षण प्रतिपल प्रमाताओं के संयोजन [मलप्रेक्षादि में ]
वियोजन [ अन्यत्र ] की विचित्रता से सारे विश्वको सृष्टि, स्थिति, संहार-प्रलयादि द्वारा प्रपञ्चित
किया करते हैं । आचार्यपाद ने भी कहा है—‘सदा-सर्वदा विनोदरूपी सृष्टिकारनेवाले सदा
सुखार्थ स्थितिरखनेवाले उसे अपने में लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे आपको नमस्कार
हो ।’ इस प्रकार श्री भट्टनारायण ने भी कहा है—‘सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की बारम्बार
कल्पना करते हुए भी विश्रान्ति लेनेवाले कोई एक निर्विकल्प अज की जय हो ।’ इसलिए मानना
पड़ेगा कि चिदात्मा के भीतर पदार्थ समूह रहता है उनकी इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो
सकता ॥ १० ॥
१. आशय यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न शिवत्व का विभाग अवस्था में भी वैसा ही स्वरूप रहता है
जैसा कि नर्तकी का नृत्याभास प्रेक्षकगण की दृष्टि को एक ही साथ अपने अभिमुख एकत्रित कर
लेने में होता है ।
श्रीसोमानन्दपादने शिवदृष्टि शास्त्र में सर्वत्र शक्ति पञ्चक स्वभाव का उपसंहार करते
हुए कहा है—
‘एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ।
शक्त्या निर्वृतचित्तस्य तद्भागाविभागयोः ॥’
तथा च स्फुटमेव तेनैव प्रत्यभिज्ञापितम्, यथा ।
‘यदा तु तस्य चिद्धर्मप्रभावामोदजृम्भया ॥
विचित्ररचना नानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने ।
भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा तुटिः ॥’
इत्यस्य प्रस्तावे
सा च दृष्ट्या हृदुद्देशे कार्यस्मरणकालतः ।
प्रहर्षवेगसमये दरसन्दर्शनक्षणे ॥
अनालोचनतो दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे ।
विसर्गोक्ति प्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥
एतेष्वेवप्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता । इति ।
१०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-११
ननु परामर्शो नाम विकल्पः, स च अविकल्पशुद्धसंविद्वपुषि भगवति कथं स्यात् इत्याश-
ङ्क्याह—
स्वभावमवभासस्य विमर्शं¹ विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि² स्फटिकादिजडोपमः ॥ ११ ॥
'एकोऽहं बहुस्याम्' भीतर रहता है तभी इच्छा होती है अन्यथा इच्छा ही नहीं होगी ।
इस पर कहते हैं कि परामर्श का नाम इच्छा है और वह इच्छा वेद्य की अपेक्षा रखती है । उस
विशुद्ध, अविकल्प, संवित्स्वरूप भगवान् में कैसे होगी—ऐसी आशङ्का उठाकर उत्तर में कहते हैं—
इस प्रकार इच्छा, ज्ञान और क्रियारूप शक्ति से जिसका कभी भी वियोग नहीं होता,
चिद्रूप की स्थिति अन्तर में एवं बाहर में एक सी ही रहती है ।
विभाग में जैसी शक्तिपञ्चक की स्थिति रहती है वैसा ही कहना चाहिए—इसे स्पष्ट करते
हुए कहते हैं—
शुद्ध बोधरूप शिवतत्त्व में शक्तिपञ्चक के ऐक्यभाव का समर्थन कर देने पर और उस
प्रसङ्ग के माध्यम से अपर अवस्था में भी चिद्रूप की वैसी ही चिदानन्दमय स्थिति अवस्थित रहती
है । शक्तिरूप अवस्था जो परा-अपरा हैं उसमें भी इच्छादि पाँच निहित ही हैं यहाँ इससे द्योतित हो
रहा है । चिद्रूप शिवभट्टारक का जो धर्म-स्वभाव है वही तो पञ्चविधकृत्य विभव है जो कि सृष्टि,
स्थिति, प्रलय अनुग्रहादि करते रहते हैं । आमोद-प्रमोदरूप तथा स्वरूप परामर्शरूप से चिद्रूप का
विकास होता है ।
अनेक प्रकार की सृष्टिकार्य की रचना में निरन्तर चिद्रूप की ही तो उन्मुखता झलकती है
तब वह त्रुटि सूक्ष्म काल से परिच्छिन्न होनेवाली इच्छा-शक्ति की प्रथम अवस्था कही जाती है ।
वह सूक्ष्म उन्मुख-शक्ति हृदयस्थल में, कार्य के स्मरणकाल में तथा हर्ष के हेतुभूत पुत्रादि
के जन्म समय में, भय के प्रथम क्षण में, अकस्मात् किसी को देख लेने पर, धातु के विसर्ग अवस्था के
अन्त में तथा विसर्जनीय भाषण के प्रसङ्ग में, त्वरित गति से ग्रन्थ के पठन काल में और दौड़ने में
इन्हीं प्रसङ्गों में पूर्वोक्त क्रम से भी शक्तियों की विलोलता अतिसूक्ष्म भावरूपता देखने में आती है
स्पन्दन शास्त्र में भी कहा है—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोति वा मृशन् ।
धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ इति ।
अत्यधिक क्रोध को चरम अवस्था पर पहुँचा हुआ अथवा प्रहर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ
[ अकस्मात् किसी कारण से मैं क्या करूँ ? ] इस किं कर्तव्य विमूढता की स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति
जिस भी अवस्था में प्रविष्ट होता है उसी में स्पन्दता की झलक देखता है ।
१. जिन्होंने अपने स्वभाव परामर्श को प्राप्त कर लिया है वे ही विमर्श को अच्छी तरह जानते हैं । विमर्श
'अहम्' ऐसा असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्ति स्वभाववाला है, वेदवेत्ता लोग इन मन्त्रशरीर,
श्रीमातृका, श्रीमालिनीयादि तत्त्व को मानते हैं ।
२. प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श है, उसके बिना अर्थभेद मात्र स्वच्छ ही रहता है किन्तु चेतनता नहीं
रहती, क्योंकि चमत्कार का अभाव उसमें होता है ।
अ.-१, आ.-५, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०१
इह अवभासस्य प्रकाशस्य, अनवभासस्य च प्रकाशस्य घटादेः परस्परपरिहारेण द्वयोः
स्वात्मनि चेत् व्यवस्थानं, तत् घटपटयोः इव इदमजडम् इदं जडम् इति दुरुपपादं वैलक्षण्यम् ।
अथ अवभासो यतोऽर्थस्य सम्बन्धी, ततो नाजडः, र्तार्ह सम्बन्धमात्रेण मृत् अपि घटस्य इति अजडा
स्यात् । अथ न स्वसम्बन्धमात्रम् अपि तु अवभासोऽर्थस्य प्रकाशः, र्तार्ह अर्थात्मना स प्रकाश इति
समापतितम् । न च अन्यात्मना अन्यस्य प्रकाश उपपन्नः । अथ अन्यस्वभावोऽपि घटोऽवभासस्य
कारणम्, र्तार्ह अवभासोऽपि घटस्य कारणम् इति घटोऽपि अजडः स्यात् । अथ अन्येनापि सता
घटेन यतोऽवभासस्य प्रतिबिम्बरूपा च्छाया दत्ता, ताम् असौ अवभासो बिभ्रत् घटस्य इति उच्यते,
ततश्च अजडः, र्तार्ह स्फटिकसलिलमुकुरादिः अपि एवंभूत एव, इति अजड एव स्यात् । अथ तथा-
भूतर्माप आत्मानं तं च घटादिकं स्फटिकादिः न पराम्रष्टुं समर्थ इति जडः, तथा परामर्शनमेव
अजाड्यजीवितम् अन्तर्बहिष्करणस्वातन्त्र्यस्वरूपं स्वाभाविकम् अवभासस्य स्वात्मविश्रान्ति-
लक्षणम् अनन्यमुखप्रेक्षितवं नाम । 'अहमेवं प्रकाशात्मा प्रकाशे' इति हि विमर्शोदये स्वसंविदेव
प्रमातृप्रमेयप्रमाणादि चरितार्थम् अभिमन्यते न तु अतिरिक्तं काङ्क्षति, स्फटिकादि हि गृहीतप्रति-
बिम्बमपि तथाभावेन सिद्धौ प्रमात्रन्तरम् अपेक्षते, इति निर्विमर्शत्वात् जडम् । सर्वं तु वस्तुतो
अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । स्वरूप परामर्श करनेवाले ही इसको जानते हैं और
तत्त्ववेत्तालोग विमर्श को अहम्, असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्तिरूप, ज्ञाता, कहते हैं ।
अन्यथा अर्थ से उपरक्त रहने पर भी विमर्श से शून्य प्रकाश स्फटिकादि के तुल्य जड हो
जायेगा ॥ ११ ॥
अवभासरूप प्रकाश का और अनवभासरूप अप्रकाश घटादि का परस्पर परिहार हो जाने
से [ प्रकाश और घट ] इन दोनों का अपने में परिनिष्ठित स्वरूप मानोगे तो यह जड है एवं यह
अजड-चेतन है इस प्रकार चेतन और जड के भेद का पता ही नहीं चलेगा । अब यदि दूसरे पक्ष
में कहो कि अवभास पदार्थ सम्बन्धी है और सम्बन्धी होने के कारण जड उसे नहीं मानोगे, तब
तो मिट्टी भी घट का सम्बन्धी होने से जड नहीं होगी । इसलिए यह कहना पड़ेगा कि केवल
सम्बन्ध मात्र नहीं है अपितु अर्थ के प्रकाश का नाम अवभास है, तब तो फिर वही बात आ गयी
जो अर्थरूप से प्रकाश होता है और घट का अन्यरूप से प्रकाश उपपन्न नहीं हुआ । प्रकाश से
भिन्न स्वभाववाला भी घट अवभास का कारण होता है, तब तो अवभास भी घट का कारण हुआ
इस तरह घट भी अजड चेतनरूप हो जायेगा और प्रकाश का सम्बन्धी होने के कारण अजड-
चेतनरूप हो हो जाये, अब कहो कि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करनेवाला स्फटिकादि अपने को' परामर्श
करने में समर्थ नहीं हो सकता है इसलिए वह चेतन नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि परामर्शन
ही चेतनता का जीवन है, भीतर में और बाहर में स्वतन्त्र स्वाभाविक, अवभास का स्वात्म-
विश्रान्तिरूप किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला है इसी को स्वात्मपरामर्श कहा जाता है ।
'अहमेव प्रकाशात्मा प्रकाशे' मैं ही प्रकाशरूप में प्रकाशित हो रहा हूँ इस विमर्श के उदय होने
पर अपना संवित् ही प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि को ठीक-ठीक मानते हैं उससे अतिरिक्त कुछ
भी नहीं चाहते हैं और स्फटिकादि तो प्रतिबिम्ब ग्रहण करने पर भी वैसा अपने को सिद्ध करने
में अन्य प्रमाता की अपेक्षा रखता है, अतः विमर्श से रहित होना जड ही है, वस्तुतः यह सब
१०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१२
विमर्शात्मकप्रमातृस्वभावतादात्म्याहंपरामर्शविश्रान्तेः अजडमेव पूर्वापरकोट्योः । यदुक्तम्—
'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिविमर्शः सोऽहमित्ययम् ॥'
इति । मध्यावस्थैव तु इदन्ताविमृश्यमानपूर्वापरकोटिः, विमूढानां मायापदं संसारः, इति विमर्श
एव प्रधानं भगवत इति स्थितम् ॥ ११ ॥
न केवलं संवित्तत्त्वस्य अस्माभिः एव विमर्शप्राधान्यम् उक्तम् यावत् आगमान्तरैरपि इति
दर्शयति—
आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता ।
तात्पर्येणोदितस्तेन जडात्स हि विलक्षणः ॥ १२ ॥
यतो विमर्श एव प्रधानम् आत्मनो रूपम् अमुमेव हेतुं प्रयोजनरूपम् उद्दिश्य आत्मा धर्मि-
स्वभावो द्रव्यभूतोऽपि, चैतन्यम् इति धर्मवाचिना शब्देन सामानाधिकरण्यम् आश्रित्य उदितः
कथितः, भगवता शिवसूत्रेषु 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) इति पठितम्, चैतन्यम् इति हि धर्मवाच-
कुछ विमर्शरूप प्रमाता है उसका तादात्म्यरूप अहंपरामर्श में विश्रान्त हो जाने के कारण वह तो
आगे या पीछे सर्वदा अजड-चेतनरूप ही रहता है । इस विषय में कहा भी है—
इदम् यह परिच्छिन्न-भिन्न विमर्श को सफलता तभी होती है जबकि अपने स्वरूप में अहं
इस रूप से विमर्श करता हुआ विश्राम लेता हो ।
वही मायीयरूप में जब आता है तभी इदन्ता के आगे-पीछे कोटिवाला विमूढा को माया
पद में रहनेवाले संसारी कहा जाता है, इसलिए विमर्श ही भगवान् का प्रधानरूप है यह सिद्ध
हुआ ॥ ११ ॥
केवल हम लोगों ने ही संवित्तत्त्व ज्ञान को विमर्शमय नहीं माना है अपितु हमारे साथ-
साथ आगम शास्त्रों [ पातंजलन्यायादि ] ने भी माना है, इसे दिखाते हैं—
इसलिए आत्मा चैतन्य है चित्तत्त्व क्रिया भी चेतन कर्तावाली होती है । इसी कारण जड
से वह चेतन आत्मा एक विलक्षण पदार्थ है ॥ १२ ॥
क्योंकि आत्मा चेतन का प्रधानरूप तो विमर्श ही है इसी को हेतु मानकर आत्मा को
धर्मी स्वरूप, द्रव्यरूप, चैतन्य माना जाता है, आत्मा के साथ चैतन्य का सामानाधिकरण्य रूप
से उपादान किया है, शिवसूत्र में भगवान् सदाशिव ने भी 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) चैतन्य को
१. पूर्व-अपर कोटि में तो एक विशुद्ध शिवरूपता ही सभी के लिए रहती है इसी का श्रीसोमानन्दपाद ने
भी निर्देश किया है—
न परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता ।
यावत्समप्रज्ञानाग्र ज्ञातृस्पर्शदशास्वपि ॥
स्थितेव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले । इति ।
वह व्यवस्था उस परमशिवरूप अवस्था में व्यवस्थित होकर रहती है कि उसमें दूसरा कोई
नहीं रहता, जैसे सभी ज्ञानों का प्रारम्भ से लेकर वैसा ही फल की परिसमाप्ति तक उसी में विश्रान्त
होकर रहता है, उसकी विश्रान्ति के बिना अर्थ का बोध ही नहीं होता, अनेक प्रकार से ज्ञानों की
समग्रता मध्य अवस्था में प्रत्यगात्मा के कारण ही लक्षित होती है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०३
कोपलक्षणम्, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' '……तद्दृशेः कैवल्यम्।' ( यो० सू० २-२५ ) 'द्रष्टा दृशि-
मात्रः………' (यो० सू० २-२०) इत्यादौ अपि हि धर्मशब्देन सामानाधिकरण्यम् आत्मनो दर्शितं
गुरुणा अनन्तेन । द्रव्यं हि तत् उच्यते—यद्विश्रान्तः पदार्थवर्गः सर्वो भाति च अर्थ्यते च अर्थ-
क्रियायै, तत् यदि न कुप्यते तत् सकलोऽयं तत्त्वभूतभावभुवनसंभारः संविदि विश्रान्तः तथा भवति
इति । स एव गुणकर्मादिधर्माश्रयभूतपदार्थान्तरस्वभावः तामेव मुख्यद्रव्यरूपाम् आश्रयते इति सैव
द्रव्यम्, तत् अनन्तधर्मराशिविश्रमभित्तिभूतायाः तस्याः स एव धर्मः चैतन्यम् इति कर्तृकृदन्तात्
उत्पन्नेन भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधायिनापि प्राधान्येन दर्शितः, तथाहि सम्बन्धस्य सम्बन्धि-
विश्रान्तस्य प्रतीतेः, द्रव्यरूपस्य च सम्बन्धिनः प्रकृत्या उक्तत्वात् चितिक्रियारूपं धर्मं सम्बद्धम्
अवगमयता ष्यञा निष्कृष्ट एव अंशः प्रत्यायितो भवति । चितिक्रिया च चितो कर्तृता, स्वातन्त्र्यं
संयोजनवियोजनानुसंधानादिरूपम् आत्ममात्रतायामेव जडवत् अविश्रान्तत्वम् अपरिच्छिन्नप्रकाश-
सारत्वम् अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् इति, तदेव अनात्मरूपात् जडात् संयोजनवियोजनादिस्वातन्त्र्य-
विकलात् बैलक्षण्यादायि इति, तदेव परत्वेन प्रधानतया अभिसन्धाय, आत्मा चेतन इति वक्तव्ये
धर्मान्तराधरीकरणाय विमर्शधर्मोद्धुरीकरणाय च 'आत्मा चैतन्यम्' इत्युक्तम् । चितिक्रिया चिति-
आत्मतत्त्व कहा हुआ है, क्योंकि चैतन्य धर्मवाचक का उपलक्षण है, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी'
एक रूप में ही चिति-शक्ति रहती है। पातञ्जलयोग सूत्र भी ' …'तद्दृशेः कैवल्यम्'। ( २-२५ )
वही द्रष्टा का कैवल्य है और द्रष्टा ज्ञानरूप है 'द्रष्टा दृशिमात्रः……' ( २-२०) महर्षि
श्री पतञ्जलि ने भी धर्म शब्द से आत्मा का सामानाधिकरण्य दिखलाया है। वही द्रव्य
कहा जाता है जो सभी सिद्ध पदार्थ अर्थक्रिया करने के लिए ही भासित होता है और चाहा
जाता है, यदि वह विश्रान्त नहीं होता हो तो ये जो कुछ भावपदार्थ हैं वे सम्पूर्ण जाकर
उसी प्रकार संवित् ज्ञान में ही आश्रय पाते हैं। वही तत्त्वादि गुण कर्मादि का आश्रयभूत
जितने अन्यपदार्थ हैं वे सभी मुख्य द्रव्यरूप संवित् ज्ञान में ही आश्रय लेते हैं, इसीलिए संवित् ही
द्रव्य है, अनन्तधर्मराशि का आश्रय बनी हुई—संवित् ज्ञान का ही धर्म चैतन्य है, 'चेतनस्य भावः
चैतन्यम्' चेतन शब्द कर्तारूप कृदन्त है उससे भाव अर्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय करके सम्बन्ध बताने-
वाला चैतन्य बन जाता है, क्योंकि सम्बन्ध का सम्बन्धी में 'चित्क्रिया चेतनस्य' विश्रान्तिरूप से
प्रतीति होती है और द्रव्यरूप सम्बन्धी चेतन की प्रकृति से कहा गया, चिति क्रियारूपधर्म चेतन
में सम्बद्ध है यही 'ष्यञ्' प्रत्यय से ज्ञापित होता है और चितिक्रिया चेतन की कर्तृता है, संयोजन-
वियोजन अनुसन्धानरूप स्वातन्त्र्य से रहित है, स्वातन्त्र्य कर्तृता-शक्ति से शून्य अन्य की अपेक्षा
रखनेवाला जड होता है, 'यथा स्वात्मभाग-निष्ठः संयोजन-वियोजनादि स्वातन्त्र्य रहितः नैवमात्मा
इत्यर्थः' अपने में सीमित मात्र रहनेवाला होने के कारण आत्मा नहीं है, आत्मा तो अनात्मरूप
जड से विलक्षण होता है, चेतन को प्रधान मान करके 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा जहाँ पर बोलना
चाहिए वहाँ पर धर्मान्तर नित्यत्वादि को दबा करके विमर्शरूप धर्म का उद्धार करने के लिए
'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा कहा गया है। चेतन की क्रिया में चेतन आत्मा कर्ता रहता है इसी कारण
१. इस प्रकार परम संवित् क स्वातन्त्र्य-शक्ति से युक्त होकर ही यह विधि ठीक बैठती है। इसकी बहुत
सो शक्तियाँ भी उस संवित्-शक्ति से अवियुक्त होकर प्रकाश करती हैं।
१०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१३
कर्तृता तात्पर्य्येण इति समासः अर्धयुक्त पादविश्रान्तिः इति हि काव्ये समयः, न शास्त्रे । यदि वा
चित् क्रिया आत्मा उदितः, चितिकर्तृता च, इति पृथगेव । एवं तु न क्वचित् पठितम् ॥ १२ ॥
ननु यथा प्रकाशोऽप्रकाशश्च इति उभयमपि स्वात्मनि, ततश्च प्रकाश इति उक्ते जडात् न
वैलक्षण्यम् उदितं स्यात्, तद्वत् विमर्शोऽपि अविमर्शोऽपि च स्वात्मनि, इति तेनापि कथं वैलक्षण्यं
जड/जडयोः इत्याशङ्क्याह—
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक्स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥ १३ ॥
चेतयति इत्यत्र या चितिः चितिक्रिया तस्याः प्रत्यवमर्शः स्वात्मचमत्कारलक्षण आत्मा
स्वभावः, तथाहि—घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते स्वात्मा न परामृश्यते न स्वात्मनि तेन प्रका-
श्यते न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेतयत इति उच्यते । चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति
संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते, स्वात्मा परामृश्यते स्वात्मन्येव प्रकाश्यते, इवमिति
यः परिच्छेद एतावद्रूपतया तद्विलक्षणोभावेन नील-पीत-सुख-दुःख-तच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन
इसकी आधे पाद में ही पाद की विश्रान्ति की हुई है काव्यशास्त्र में तो यह नियम चलता भी है
किन्तु आगमशास्त्रादि में ऐसा नियम नहीं है एवं ऐसा होना भी चाहिए । अथवा चित् क्रिया को
ही आत्मा कहा हो और चिति का कर्तृत्व भी आत्मा में रख दिया हो यह तो कहीं पर भी नहीं
पढ़ा गया है । भिन्न रूप से भी जहाँ पर पढ़ा है वहाँ पर 'आत्मा चैतन्यम्' और चिति कर्तृता
इसी रूप में पढ़ा गया है ॥ १२ ॥
'ननु' कहकर शंका करते हैं। यदि प्रकाश और अप्रकाश ये दोनों भी आत्मा में ही रहते
हैं और आत्मा में रहने के कारण प्रकाश ऐसा मात्र कहने पर जड से विलक्षण कुछ भी नहीं
उदित होता है, उसी प्रकार विमर्श और अविमर्श भी तो आत्मा में ही रहते हैं, तब फिर जड
ओर चेतन अजड की विलक्षणता कैसे मालूम पड़ेगी । इस प्रकार आशंका कर उत्तर में
कहते हैं—
चिति-चेतन जो प्रत्यवमर्शरूप है—'अहम् अस्मि' यही इसका पारमार्थिक स्वरूप है ।
अपने ही रस में देदीप्यमान परावाणी के रूप से रहता है । उस परमात्मा का वही मुख्य
स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य है ॥ १३ ॥
'चेतयति' इस क्रिया में, जो चिति (जानने अर्थ में क्रिया) है उसका परामर्श स्मरणरूप
से करना यही इसका अपना चमत्काररूप स्वभाव है, क्योंकि घट अपने आपको प्रकाशित नहीं
कर सकता अर्थात् अपरिच्छिन्नरूप में नहीं भासता है, इसी कारण घट स्वयं जानता है—ऐसे
कोई नहीं बोलते हैं । चैत्र तो अपने में सर्वदा ज्ञानमय होने के कारण चमत्कृत ही रहता है,
एवं अपने में ही प्रकाशित रहता है और सारे विश्व को अपने में किये रहता है । नील-पीत,
सुख-दुःखादि से युक्त होकर रहना एवं कभी न रहना ये सारी बातें उसमें होती रहती हैं,
१. यह परावाग्रूपता आद्य-शक्ति अभिन्नरूप से रहती है नित्य संवित् स्वरूप होने के कारण, आदि और
अन्त अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से रहित है । दूसरे परतन्त्रभाव की अपेक्षा नहीं रखनेवाली,
स्वातन्त्र्य, ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहती है ।
अ.-१, आ.-५, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०५
आभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यते इति उच्यते । एवं च विमर्शः स्वात्मनि अविमर्शाऽपि स्वात्मनि
इत्यसिद्धमेतत् । विमर्शी हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम्
एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवं-स्वभावः । प्रत्यवमर्शश्च अन्तरभिलापात्मकशब्दन-
स्वभावः, तच्च शब्दनं संकेतनिरपेक्षमेव अविच्छिन्नचमत्कारात्मकम् अन्तर्मुखशिरोनिर्देशप्रख्यम्
अकारादिमायीयसांकेतिकशब्दजीवितभूतं, नीलम् इदं, चैत्रोऽहम् इत्यादिप्रत्यवमर्शान्तरभित्ति-
भूतत्वात्, पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वम् अपलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक्, अत एव सा स्वरसेन
चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव पर-
इसलिए चैत्र जानता है—ऐसा बोला जाता है। इस प्रकार इदन्ता आभास के विमर्श में अपना
विमर्श और अविमर्श नहीं हो सकता है—यह बात असिद्ध है। विमर्श तो सब कुछ सहनेवाला
होता है इदन्ता को भी अपना बना लेता है और अपने आप को भी देहादिरूप इदन्ता कर
लेता है तथा दोनों को सदाशिव भूमि में एक भी कर लेता है एवं एक किये हुए को दो भागों
में विभक्त कर देता है। एक को जाग्रत् अवस्था में बढ़ा देता है एवं दूसरे को शून्य अवस्था
में दबा देता है—ऐसा स्वभाववाला है। प्रत्यवमर्श उसीको कहते हैं—जो भीतर ही भीतर
जानना, और उसमें किसी का संकेत भी नहीं रहता, मैं स्वयं इन नीलादिरूप का भोक्ता हूँ—
यही चमत्कार रहता है बिना बोले हुए स्वीकार कर लेने के बराबर 'अ० आ० क० ख० ग०'
इत्यादि सांकेतिक शब्दों का जीवन है, यह नील है, मैं चैत्र हूँ—इत्यादि सभी परामर्शों के
आश्रय होने से, और पूर्ण होने से परावाणी परामर्शरूप द्वारा सारे विश्व को देखती है,
इसीलिए परावाणी कही जाती है, वह अपने आपमें स्वात्मविश्रान्तिरूप चिद्रूप से निरन्तर
उदित होती रहती है। 'अहं' इस परामर्शरूप में सदैव स्फुरित रहती है। यही परमात्मा का
१. “पृ पालनपूरणयोः” पालन एवं पोषण अर्थ में पढ़ी गयी “पृ” धातु से 'परा' शब्द व्युत्पन्न हुआ है।
२. अनस्तमिता का अर्थ है जिसका सदा उदय है। जिसका जगत् में उदय होता देखा जाता है उसका
अस्त होना निश्चित है किन्तु जिसका सदा उदय है वह कभी-भी अस्त होता ही नहीं, इसलिए सदोदित
कहा जाता है। 'सदोदित' सदा उगी हुई चित्ति-शक्ति है जिसमें निरन्तर क्रिया शीलता और स्पन्द
रूपता रहती है।
३. कुछ लोगों का कहना यह है कि पश्यन्ती अवस्था ही मुख्य आनन्दरूप है परा अवस्था नहीं होती,
क्योंकि वह तो पररूप रहने के कारण नहीं होती है, इसी को 'एवकार' शब्द से लक्षित करता है,
श्री सोमानन्दपाद ने भी इस विषय में कहा है—'विमर्श अनुभव के द्वारा यह वाग्रूपता अनुगत होती है।
इस प्रकार यहाँ से प्रारम्भ कर 'ऐसी भले ही चर्चा करते रहो; जैसे पश्यन्ती अवस्था ही
उपयुक्त है।' 'यो हि पश्यति पश्यन्तीं स देवः परमः शिवः ।' इत्यादि तक ।
'जो लोग पश्यन्ती अवस्था को ही देखते हैं, वही देव परम शिव है। इत्यादि से भगवान् का
स्वरूप शब्दरूप है—ऐसा कहा गया है। इसका भट्टनारायण ने भी उल्लेख किया है—
सुगिरा चित्तहारिण्या पश्यन्त्या दृश्यमानया ।
जयत्युल्लासितानन्दमहिमा परमेश्वरः ॥
चित्त को आकर्षित करनेवाली दृश्यमान पश्यन्तीरूप वाग्रूपता से आनन्दकन्द महिमावाले
परमेश्वर का उत्कर्ष उल्लसित होता है।
१४
[१०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४
मात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम् ऐश्वर्यम् ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षितवम् उच्यते । परापरं तु इदंभावरूपस्य
प्रत्यवमर्शस्य अख्यातिप्राणस्य—उद्बोधमात्रेऽपि अहंभाव एव विश्रान्तेः श्रीसदाशिवादिभूमौ
पश्यन्तीदशायाम् । अपरं तु इदंभावस्यैव निरूढौ मायागर्भाधिकृतानामेव विष्णुविरिश्चेन्द्रादीनाम्,
तत्तु एषां परमेश्वरप्रसादजमेव इति । अन्यानिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः, ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं,
चैतन्यं च । तस्मात् युक्तमुक्तम्—‘········तेन जडात्स हि विलक्षणः ।' इति ॥ १३ ॥
प्रधानागमे ऽपि एतत् प्रदर्शितमेव इति निरूपयति—
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥
इह घटः कस्मात् अस्ति, खपुष्पं च कस्मात् नास्ति, इति उक्ते वक्तारो भवन्ति, घटो हि
मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य एवं स्वामीपन है, जिसमें किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है।
अपने में रहना सुख-संपन्नता है और दूसरों के आधीन रहना ही दुःख-दीनता है। अपना
स्वरूप नहीं भासित होना ही इदंभाव का परामर्श कहलाता है। केवल उद्बोध हो जाने पर
भी सदाशिव भूमिरूप पश्यन्तीदशा में अहंभाव की विश्रान्ति हो जाती है। जब इदंभाव की
अभिवृद्धि होती है तो मायागर्भ में रहनेवाले ब्रह्मा, बिष्णु आदि तथा सभी लोकपालों का
प्रभाव-प्रताप तो सब का सब महेश्वर के प्रसाद से ही होता है। किसी की अपेक्षा न रखना
यही परमार्थतः आनन्द ऐश्वर्य और स्वातन्त्र्य है। इसलिए युक्तियुक्त ही कहा है—'तेन जडात्
स हि विलक्षणः ।' क्योंकि वह जड से विलक्षण ही है ॥ १३ ॥
[ रहस्य आगमों में तथा परमेश्वर भाषितवेदान्तादि में प्रकाश की ही प्रधानता है ]
इस प्रकार समस्त आगमशास्त्रों में भी विमर्शरूप प्रकाश की ही प्रधानता मानी जाती है।
इसका निरूपण करते हैं—
वह देदीप्यमान महा सत्ता है जिसमें देश-काल का ‘विच्छेद' स्पर्श नहीं होता, वह
परमेश्वर की सारतत्त्ववाली चिति-शक्ति को हृदय अर्थात् प्रतिष्ठा स्थान कहा गया है ॥ १४ ॥
यहाँ पर घट रहता है और आकाशकुसुम नहीं रहता है, इस बात को बोलनेवाले कहते
हैं, क्योंकि घट को मैं प्रत्यक्षरूप से देखता हूँ, आकाशकुसुम तो प्रत्यक्ष स्फुरित नहीं होता है,
यदि घटत्व ही स्फुरित होता है तो वह प्रत्येक व्यक्ति को स्फुरित होगा। नहीं होता है, तो किसी
आनन्दघन परम स्वातन्त्र्यरूप परमेश्वर का उल्लास परम-महा पश्यन्ती अवस्थाके कारण ही
उल्लसित होता रहता है। वह परावाग्रूपता ही भगवान् की शक्ति है—ऐसा दिखला दिया है। आपस में
एक-दूसरे से प्रेम प्राप्त करना ही रतिक्रीडा का आनन्द उल्लास है—इस प्रकार लौकिक दृष्टान्त से
भी आनन्द ही प्रकट हुआ झलकता है।
१. जबकि मुनि ने कहा है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' पराधीनता में ही दुःख है और अपने
में रहना सुख है ।
२. ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रादि देव मायागर्भ के अधिकारी होने के कारण, इनमें अपना कुछ भी करने का
सामर्थ्य नहीं होता।
अ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०७
स्फुरति मम, न तु इतरत् इति, तत् एतत् घटत्वमेव यदि स्फुरत्त्वं स्फुरणसम्बन्धः, तत् सर्वस्य
स्फुरेत् न कस्यचिद्वा, तस्मात् मम स्फुरति इति कोऽर्थः, मदीयं स्फुरणं स्पन्दनम्, एषैव च
कञ्चिद्रूपता—यत् अचलमपि चलम् आभासते इति, प्रकाशस्वरूपं हि मनागपि नातिरिच्यते,
अतिरिच्यते इव इति अचलमेव आभासभेदयुक्तमेव च भाति इति । तत उक्तम्—
'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्वपुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसारः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ॥'
इति तथा—
'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रति-
ष्ठितः ॥' (स्प० २२) इति । '...........स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।' (स्प० २१) इति । 'गुणादिस्पन्द-
निःष्यन्दाः.............।' (स्प० १९) इति च । लोकेऽपि विविधवैचित्र्ययोगेऽपि स्वरूपात् अचलन्
जनो गम्भीरः स्पन्दवान् इति उच्यते । सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । सा च
खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति इति महती, देशकालौ नीलादिवत् सैव सृजति ताभ्यां विशेषणीया न
को भी नहीं होना चाहिए, इसलिए मुझे होता है इसका क्या तात्पर्य है, मेरा ही स्फुरण उसमें
लगा हुआ है और स्पन्दन का अर्थ यह है कि कुछ चलनात्मक प्रवृत्ति का होना, एवं यही किञ्चित्
झलकना है जो स्वयं अचल रहता हुआ भो द्रष्टा के यहाँ स्फुरित होता है, क्योंकि प्रकाशरूप
द्रष्टा से वह थोड़ा सा भी अधिक नहीं होता है, [स्वतः ] अपने आप अधिक होने के समान, वह
अचल रहता हुआ ही आभास भेद से मिला हुआ ही झलकता है । इसी कारण कहा है—
सभी भावों में विज्ञानरूप शरीरवाला आत्मा ही अपनी इच्छा की वृद्धि को न रोककर
दृष्टि क्रिया को फैलाता हुआ विश्वरूप ही रहता है और भी सुनो—
अतिक्रोधी अथवा प्रहृष्ट-प्रसन्न रहनेवाला या किंकर्तव्यविमूढ रहनेवाला या दौड़ता हुआ
जिस अवस्था में स्थित रहता—वही प्रतिष्ठित स्पन्द कहलाता है । (२२) स्प०
अतः जो कोई अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है, वह तो
जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव-परमानन्दमय तत्त्व की अनुभूति थोड़े ही काल में प्राप्त कर
लेता है ॥ २१ ॥
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के रूप में बहनेवाले जो प्रवाह हैं वे सामान्य स्पन्द का
ही आश्रय लेकर फैलता हुआ भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी-बाधक नहीं होता है । स्व-स्वभाव
का आच्छादक नहीं हो पाता है ॥ १९ ॥
संसार में विविध प्रकार की विचित्रता के रहते हुए भी अपने स्वरूप से पदच्युत न होने-
वाले पुरुष को महान् सत्ता भवन कर्तृरूप होने के कारण समस्त क्रियाओं को सम्पादन करने में
सर्वतोभावेन स्वतन्त्र रखती है और वह महान् भवन कर्तृता होने के कारण आकाशकुसुमादिकों
में भी व्याप्त होकर रहती है, नीलादि की तरह देश-काल का भी वही सृजन करती है देश-काल
उसके विशेषण नहीं होते हैं अपितु नीलादि देश-काल के साथ सम्बन्ध रखता है, जो जिसके साथ
१. सन्नेव हृदयप्रकाशो भवनक्रियाया भवति क्रिया ।
सैव क्रियाविमर्शः स्वस्था क्षुभिता च विश्वविस्तारः ॥ इति—
भवन क्रिया का कर्ता विद्यमानरूप में हृदय प्रकाश ही होता है । वही क्रियाविमर्श अपने में
स्थित होता हुआ क्षुभित होकर विश्व भर में विस्तीर्ण हो जाता है ।
१०८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-५, का.-१४
भवति, यत् किल येन तुल्यकक्ष्यतया भाति तत् तस्य विशेषणं—कटक इव चैत्रस्य । न च देश-
कालौ विमर्शेन तुल्यकक्ष्यौ भातः—तयोः इदन्तया तस्य च अहन्तया प्रकाशे तुल्यकक्ष्यत्वानुपपत्तेः ।
एवं देशकालास्पर्शात् विभुत्वं नित्यत्वं च—सकैलदेशकालस्पर्शोऽपि तन्निर्माणयोगात् इति, ततोऽपि
व्यापकत्वनित्यत्वे । तदुक्तम्—'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ।' इति । सारम् इति यत्
अतुच्छं रूपं तत् इयमेव विमर्शशक्तिः, ग्राह्यग्राहकाणां यत् प्रकाशात्मकं रूपं तस्यापि अप्रकाशवै-
लक्षण्याक्षेपिका इयमेव इति, श्रीसारशास्त्रेऽपि निरूपितम्—'यत्सारमस्य जगतः सा शक्तिर्मालिनी
परा ।' इति । सैषा, इति शक्तिप्रत्यभिज्ञानं दर्शितम् । हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च
उक्तनीत्या जडानां चेतनं, तस्यापि प्रकाशात्मकत्वं, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे
बराबर भासता है वही उसका विशेषण होता है जैसे—चैत्र का कुण्डल अर्थात् कुण्डलवाला
चैत्र है और विमर्श के साथ देश-काल बराबर रहकर भासित नहीं होते, देश और काल इन दोनों
का इदन्ता के साथ सम्बन्ध रहता है और उसकी अहन्तरूप से प्रकाश तुल्यकक्षत्व नहीं बैठता;
इस प्रकार देश-काल के स्पर्श से विभुत्व और नित्यत्व सिद्ध होता है—उसी तरह सकल देश-
काल से स्पर्श भी हो सकता है, उसमें भी देश-काल के निर्माण का योग होने से; इसी से भी
नित्यत्व और व्यापकत्व सिद्ध हो जाता है, इस विषय में कहा गया है—महासत्ता और महादेवी
के रूप में यह सारा का सारा जड-चेतन विचित्र ढङ्ग से भासित होता है उसी का यह सारतत्त्व
है—ऐसा कहा जाता है। वही वस्तु सारतत्त्ववाली होती है जो अतुच्छ अविनाशी हो और उसी
को विमर्श-शक्ति कहा जाता है । जो ग्राह्य और ग्राहक के प्रकाशात्मक रूप हैं उनकी भी अप्रकाश
रूप में विलक्षणता ले आनेवाली यही शक्ति है, श्रीसारतन्त्र में इसका निरूपण किया है—'इस
संसार का जो सारतत्त्व है वह परम मालिनी-शक्ति है।' वही, यह शक्ति प्रत्यभिज्ञान को बताती
है और उसोका नाम हृदय है जिसको प्रतिष्ठानरूप से कहा जाता है और वह स्थान "तथाहि
जडभूतानाम्" कहे हुए नियम से जड एवं चेतन का है, उसकी भी प्रकाशात्मकता है, उसकी भी
१. जो जिसके साथ जीता है वही उसका व्यवच्छेदक होता है ।
२. दिक्कालादिलक्षणेन व्यापकत्वं विहन्यते ।
अवश्यं व्यापको यो हि सर्वदिक्षु स वर्तते ॥ इति शिवदृष्टौ—
दिशा-कालादिको लेकर उसका व्यापकत्व बन नहीं पाता है, विशेषण के लग जाने से परि-
च्छिन्न बन जाता है जो सर्वत्र सभी दिशाओं और कालादि में समानरूप से व्यापक रहता है वही
व्यापक है अर्थात् देश-कालादि से अनवच्छिन्न स्वभाववाला ही व्यापक माना जाता है ।
३. इसका विवेचन अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार में किया है—
अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद्विचित्ररचना मकुरान्तराले ।
बोधः परं निजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मकुरस्तथा तु ॥
जैसे दर्पण तल पर पदार्थ चित्र-विचित्र ढंग से भासित होते हैं, वैसे ही परम संविद्रूप में यह
सारा का सारा संसार आभासित है । परम संविद्रूप को विमर्श-शक्ति के सामर्थ्य द्वारा उसका बोध
रहता है किन्तु दर्पण को उसी प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का बोध नहीं रहता ।
४. 'सैषा' क्योंकि तद् और एतद् ये दोनों शब्द परोक्ष और अपरोक्ष के वाचक होकर प्रत्यभिज्ञा सूचित
करते हैं ।
अ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [१०९
तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं तत्र तत्र अभिधीयते। सर्वस्य हि मन्त्र
एव हृदयम्, मन्त्रश्च विमर्शनात्मा, विमर्शनं च परावाक्शक्तिमयम् । तत एवोक्तम्—'न तैर्विना
भवेच्छब्दो नार्थो नापि चितेर्गतिः ।' इति । 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावम्.........।' इत्यादि च,
विमर्श-शक्ति विश्व के परमपद में विश्रान्ति स्थानरूप है और यही विमर्शरूप स्वतन्त्रात्मक है
उसे ही तत्-तत् स्थलों में कहा गया है। क्योंकि सब का मन्त्र ही प्रतिष्ठा-स्थान माना जाता है,
एवं मन्त्र ही विमर्शात्मा है और विमर्श-शक्ति हो परावाणीरूपी शक्ति से युक्त है। इसी कारण
कहा गया है—
उन मन्त्रों के बिना न तो शब्द और अर्थविषयक ज्ञान ही होगा तथा चिति की गति
का होना भी असम्भव ही है।
अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त जितने भी वर्ण हैं उन्हें 'शब्दराशि' से पुकारा जाता है।
शास्त्रों में इसको मातृका कहा जाता है। सारी की सारी भेदवाली वाचक-वाच्यरूप स्थूल शब्द-
राशि को अपने भीतर अभेदरूप में धारण करनेवाली परा-शक्ति ही मातृका-शक्ति है जैसा कि
'सा हि भगवती अशेषवाच्य-वाचकात्मकजगद्भेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.........।'
[ स्व० तन्त्र० ] 'स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा।' इसकी पूर्णता अहन्तारूप
स्वातन्त्र्य-शक्ति से भिन्न और कुछ भी नहीं है। अपनी स्वतन्त्र सत्ता के बल से ही यह अपने आप
अकार से लेकर क्षकार तक के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह के रूप में फैलकर बहुत प्रकार
के वाच्यों और वाचकों से विश्व को आभासित कर लेती है यह सारा विश्व प्रमाता के रूप में ही
इस से सिद्ध होता है। किन्तु इसकी पहचान ज्ञानी-सिद्धजनों के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं
होती। इसलिए कहा है कि 'अज्ञाता माता मातृका विश्व जननी।' जिसको जानकारी न होने
से माता ही 'मातृका' कही जाती है। इसका दूसरा अर्थ भी करते हैं—'एतदेव च ब्राह्मादि-
मातृणां मातृत्वं तत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात्
परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न जननी वाचकः' । इसी दर्शन में दिखाया गया
है कि 'अ' से लेकर 'क्ष' तक की शब्दराशि चिद्रूप का ही बाहर में फैलाव है। भेद-दृष्टि में
परिणत हो जाने पर यह शब्दराशि आठ भागों में विभक्त हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों
का परिवार भी पशु भूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चिच्छक्ति को चारों ओर से घेर लेती है
जिससे कि पशु-जीवों को इसका बोध नहीं हो पाता है इसलिए आठ शक्तियों के परिवार को
'मातृका' कहते हैं। प्रकाशरूप शिव और विमर्श-शक्ति इन दोनों की एक रसता ही सारे विश्व की
आधारता है। 'अहं विमर्श' ही इसका स्वरूप है, जो कि वह महामन्त्र रूप है 'अ' अनुत्तर-तत्त्व
एवं 'ह' अनाहत-शक्ति तत्त्व की प्रत्याहारदशा ही 'अहन्ता' है। सारी शब्दराशि उसके भीतर
'मयूर के अण्डरस' न्याय से अभेदपूर्वक रहती है। परावाणी भी कुछ लोग इसको कहते हैं।
१. ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ (गी० १४-२७)
हे अर्जुन ! उस अविनाशी पूर्ण ब्रह्म का और अमृत अमरणधर्म का एवं नित्यधर्म का और अखण्ड
आनन्द का मैं ही एकमात्र आश्रय हूँ अर्थात् ये सबके सब मेरे ही ऐश्वर्य हैं। इसलिए इन सब का मैं
परम आश्रय हूँ।
११० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४
इत्यागमेषु। तत्रभवद्भर्तृहरिणापि—
‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गम्यते ॥
वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥’ इति
‘सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । यदुत्क्रान्तौ विसंज्ञोऽयं दृश्यते काष्ठकुड्यवत् ॥’
स्थूल वाच्य-वाचकमय विश्व को विस्फुरित करने के लिए यह इच्छा-शक्ति बन जाती है ।
पश्चात् ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति के रूपों में अङ्कुरित हो जाती है, फिर मायापदवी पर आरूढ
होकर विचित्र रूपों में प्रसृत हो जाती है। बाहर की ओर फैलनेवाली प्रक्रिया में यह मातृका
शक्ति दो, नव और पचास रूपों में बँट जाती है। बीज और योनि के रूप से दो भेद हो जाते हैं
स्वर समूह का नाम तो बीज है और व्यञ्जन समूह का नाम योनि है। १. अवर्ग 'अ' से अः
पर्यन्त 'अमा', २. कवर्ग से 'कामा', ३. चवर्ग से 'चार्षङ्गी', ४. टवर्ग से 'टङ्कधारिणी',
५. तवर्ग से 'तारा', ६. पवर्ग से पार्वती', ७. यवर्ग से 'यक्षिणी', ८. शवर्ग से 'शारिका',
९. क्षवर्ग अनूत्तर और अनाहत के संघ को विस्तृत करनेवाली कूटबीज है। इस प्रकार इसका
नव भेद हुए। शब्द समूह के प्रत्येक वर्ण-अक्षर को भिन्न-भिन्न शक्तिवाला है—ऐसा मानकर
सोलह स्वरों एवं चौंतीस व्यञ्जनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की जाती है। इत्यादि,
आगमों में उल्लेख मिलता है।
श्रीभर्तृहरि ने भी अपनी 'वाक्यपदीयम्' में उल्लेख किया है—
प्रत्यय अथवा ज्ञान दो प्रकार का होता है। हमारा वाग् व्यवहार जागृत् दशा का तो
शब्दभावना से हो जाता है। भावना का साथ न होने पर अनुभूति में आनेवाले अनेकतथ्य हैं,
जिन्हें शब्द से व्यक्त नहीं करते हैं, यद्यपि उन्हीं के साथ अनुभूत अन्य सत्यों को हम शब्द के
द्वारा अभिव्यक्त भी करते हैं। सुप्तकाल में भी हम सत्यों अथवा स्वप्नों का अनुभव किये रहते
हैं। शब्दों के साथ उनका वर्णन इसलिए नहीं करते हैं कि सूक्ष्मरूप से शब्दभावना के बीज
उस काल में ग्रहण हो गये रहते हैं। तामसी अवस्था में पड़े रहने के कारण तमोरूपा दशा
ही उसे कहना पड़ता है। किंतु जागृति दशा और सुषुप्ति दशा का जो ज्ञान है वह शब्द
भावना के बिना कभी भी स्थिर नहीं हो सकेगा और न तो उसके स्वरूप का ही ठीक-ठीक बोध
हो पायेगा।
वाक् या शब्द से ही समस्त व्यवहार का बोध होता है और वही आत्माभिव्यक्ति एवं
स्मृति अवस्था में भी कारण रहता है। ज्ञान की समस्त आभास शब्द या वाक् के रूप में ही
अवस्थिति रहती है। उसीके माध्यम से सब प्रकार का विचार-विमर्श हो सकता है वह फिर
किसी भी रूप में रहे, व्यक्त अथवा अव्यक्त । वाक् के न रहने पर तो प्रकाश ही प्रकाशित न
हो पायेगा; क्योंकि समस्त व्यवहार ठप हो जायेगा।
सा सर्वविद्याशिल्पनां कलां चोपबंधनी ।
तद्भादादभिनिष्पन्नं सर्वं वस्तु विभज्यते ॥
व्यावहारिक जगत् की समस्त वस्तुओं से वाक्-शब्द का सम्बन्ध निहित रहता है जैसा कि
सभी को विद्या, शिल्प और कला आदि से सम्बन्ध प्रतिदिन रहता देखा भी जाता है, इसके
द्वारा ही प्रत्येक निर्मित की गयी वस्तु के विषय में प्रयोज्य-प्रयोजक आदि की कल्पना भी की
अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १११
इत्यादि च । तत् एतेन विदुः इत्येतत् निर्वाहितम् । बौद्धैरपि अध्यवसायापेक्षं प्रकाशस्य प्रामाण्यं
वदद्भिः उपगतप्राय एव अयम् अर्थः—अभिलापात्मकत्वात् अध्यवसायस्य इति ॥ १४ ॥
ननु असंख्यशक्तिश्रेणीशोभितवपुषि परमशिवे विमर्शशक्तिरेव इयम् इत्थंकारम् अभिषिच्यते
कस्मात् ?, इत्याशङ्क्याह—
आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक्स्थिति ।
ज्ञेयं न तु तदौन्मुख्यात्खण्ड्येतास्य स्वतन्त्रता ॥ १५ ॥
स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः ।
प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ १६ ॥
सर्वाः शक्तीः कर्तृत्वशक्तिः ऐश्वर्यात्मा समाक्षिपति । सा च विमर्शरूपा इति युक्तम् अस्या
एव प्राधान्यम् इति तात्पर्येण उत्तरमुक्तम् । शब्दार्थस्तु अयं—प्रकाशात्मा परमेश्वरः स्वात्मानं
ज्ञात्रेकरूपत्वात् अज्ञेयमपि ज्ञेयीकरोति इति यत् सम्भाव्यते—कारणान्तरस्य अनुपपत्तेः दर्शितत्वात्
जाती है । इस प्रकार आगे भी कहते हैं कि—
समस्त विद्याकलादि से सम्बन्धित रहनेवाली ही यह देखी जाती है एवं यह संसारी
जीवों की चेतनता के समान है। बाह्य जगत् में तो देहधारियों का व्यवहार इसके बिना होना
असम्भव सा है, अपने अन्तर में रहनेवाले का भी सहारा किसी न किसी रूप से इस से होता
ही है। जैसे चेतन के न रहने पर प्राणी 'विसंज्ञ' ही हो जाता है वैसे वाक्, या शब्द के बिना
भी उसकी स्थिति अचेतन के समान ही हो जाती है। वृक्ष-पाषाणादि को वाग्रूपता की आवश्यकता
नहीं होती है। वाग्रूपता से ग्रहण किया हुआ चैतन्य ही सब प्रकार की सब सार्थक प्रवृत्तियों
को प्रवृत्त करता है। यदि यह न रहे, तो प्राणी काठ को तरह निर्जीव ही रह जायेंगे ।
'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुः' अवभास के स्वभाव को विमर्श कहते हैं यह बात भी यहाँ
पर आ गयी । अध्यवसाय को अपेक्षा रखनेवाले प्रकाश को विश्रान्ति होती है—ऐसा कहनेवाले
बौद्धलोग भी प्रायः इसे स्वीकार करते हैं जो कि अध्यवसाय का अभिलाप स्वरूप है ॥ १४ ॥
'ननु' कहकर अब शंका करते हैं कि असंख्य-शक्ति-सम्पन्न शिव में विमर्श-शक्ति ही क्यों
इतना महत्त्व पाती है ? इस आशंका का उत्तर देते हैं—
इसी कारण अपने आपको ही यह परमेश्वर अलग करके ज्ञेयरूप बना देता है । नहीं
तो, उसकी ओर उन्मुख रहने से शिव की जो स्वतन्त्रता है वह खण्डित हो जाती ॥ १५ ॥
अद्वैतरूप अपनी स्वतन्त्रता से युक्त होकर अपने आप की ईशादि संकल्पों से निर्मित
करके प्रभु व्यवहार कराता है ॥ १६ ॥
सारी शक्तियाँ कर्ता की ही शक्ति हैं ऐश्वर्यरूप में वही विमर्श हैं—यह कहना चाहिए ।
उसकी प्रधानता भी है, इसी तात्पर्य से ये सारी की सारी बातें कही गयी हैं। अब शब्दार्थ
बताते हैं—यह प्रकाशरूप परमेश्वर अपने आपको ज्ञाता होने के कारण अज्ञेय होता हुआ भी
ज्ञेय कर देता है इसकी जो सम्भावना है—इसमें दूसरा कोई कारण न मिलने से दृढ सम्भावना को