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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 343 में से

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पृष्ठ 126

अ.-१, आ.-५, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०३
कोपलक्षणम्, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' '……तद्दृशेः कैवल्यम्।' ( यो० सू० २-२५ ) 'द्रष्टा दृशि-
मात्रः………' (यो० सू० २-२०) इत्यादौ अपि हि धर्मशब्देन सामानाधिकरण्यम् आत्मनो दर्शितं
गुरुणा अनन्तेन । द्रव्यं हि तत् उच्यते—यद्विश्रान्तः पदार्थवर्गः सर्वो भाति च अर्थ्यते च अर्थ-
क्रियायै, तत् यदि न कुप्यते तत् सकलोऽयं तत्त्वभूतभावभुवनसंभारः संविदि विश्रान्तः तथा भवति
इति । स एव गुणकर्मादिधर्माश्रयभूतपदार्थान्तरस्वभावः तामेव मुख्यद्रव्यरूपाम् आश्रयते इति सैव
द्रव्यम्, तत् अनन्तधर्मराशिविश्रमभित्तिभूतायाः तस्याः स एव धर्मः चैतन्यम् इति कर्तृकृदन्तात्
उत्पन्नेन भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधायिनापि प्राधान्येन दर्शितः, तथाहि सम्बन्धस्य सम्बन्धि-
विश्रान्तस्य प्रतीतेः, द्रव्यरूपस्य च सम्बन्धिनः प्रकृत्या उक्तत्वात् चितिक्रियारूपं धर्मं सम्बद्धम्
अवगमयता ष्यञा निष्कृष्ट एव अंशः प्रत्यायितो भवति । चितिक्रिया च चितो कर्तृता, स्वातन्त्र्यं
संयोजनवियोजनानुसंधानादिरूपम् आत्ममात्रतायामेव जडवत् अविश्रान्तत्वम् अपरिच्छिन्नप्रकाश-
सारत्वम् अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् इति, तदेव अनात्मरूपात् जडात् संयोजनवियोजनादिस्वातन्त्र्य-
विकलात् बैलक्षण्यादायि इति, तदेव परत्वेन प्रधानतया अभिसन्धाय, आत्मा चेतन इति वक्तव्ये
धर्मान्तराधरीकरणाय विमर्शधर्मोद्धुरीकरणाय च 'आत्मा चैतन्यम्' इत्युक्तम् । चितिक्रिया चिति-
आत्मतत्त्व कहा हुआ है, क्योंकि चैतन्य धर्मवाचक का उपलक्षण है, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी'
एक रूप में ही चिति-शक्ति रहती है। पातञ्जलयोग सूत्र भी ' …'तद्दृशेः कैवल्यम्'। ( २-२५ )
वही द्रष्टा का कैवल्य है और द्रष्टा ज्ञानरूप है 'द्रष्टा दृशिमात्रः……' ( २-२०) महर्षि
श्री पतञ्जलि ने भी धर्म शब्द से आत्मा का सामानाधिकरण्य दिखलाया है। वही द्रव्य
कहा जाता है जो सभी सिद्ध पदार्थ अर्थक्रिया करने के लिए ही भासित होता है और चाहा
जाता है, यदि वह विश्रान्त नहीं होता हो तो ये जो कुछ भावपदार्थ हैं वे सम्पूर्ण जाकर
उसी प्रकार संवित् ज्ञान में ही आश्रय पाते हैं। वही तत्त्वादि गुण कर्मादि का आश्रयभूत
जितने अन्यपदार्थ हैं वे सभी मुख्य द्रव्यरूप संवित् ज्ञान में ही आश्रय लेते हैं, इसीलिए संवित् ही
द्रव्य है, अनन्तधर्मराशि का आश्रय बनी हुई—संवित् ज्ञान का ही धर्म चैतन्य है, 'चेतनस्य भावः
चैतन्यम्' चेतन शब्द कर्तारूप कृदन्त है उससे भाव अर्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय करके सम्बन्ध बताने-
वाला चैतन्य बन जाता है, क्योंकि सम्बन्ध का सम्बन्धी में 'चित्क्रिया चेतनस्य' विश्रान्तिरूप से
प्रतीति होती है और द्रव्यरूप सम्बन्धी चेतन की प्रकृति से कहा गया, चिति क्रियारूपधर्म चेतन
में सम्बद्ध है यही 'ष्यञ्' प्रत्यय से ज्ञापित होता है और चितिक्रिया चेतन की कर्तृता है, संयोजन-
वियोजन अनुसन्धानरूप स्वातन्त्र्य से रहित है, स्वातन्त्र्य कर्तृता-शक्ति से शून्य अन्य की अपेक्षा
रखनेवाला जड होता है, 'यथा स्वात्मभाग-निष्ठः संयोजन-वियोजनादि स्वातन्त्र्य रहितः नैवमात्मा
इत्यर्थः' अपने में सीमित मात्र रहनेवाला होने के कारण आत्मा नहीं है, आत्मा तो अनात्मरूप
जड से विलक्षण होता है, चेतन को प्रधान मान करके 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा जहाँ पर बोलना
चाहिए वहाँ पर धर्मान्तर नित्यत्वादि को दबा करके विमर्शरूप धर्म का उद्धार करने के लिए
'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा कहा गया है। चेतन की क्रिया में चेतन आत्मा कर्ता रहता है इसी कारण
१. इस प्रकार परम संवित् क स्वातन्त्र्य-शक्ति से युक्त होकर ही यह विधि ठीक बैठती है। इसकी बहुत
सो शक्तियाँ भी उस संवित्-शक्ति से अवियुक्त होकर प्रकाश करती हैं।