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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 343 में से

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पृष्ठ 53

३० ] ईश्‍वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-५
मेष्टिभिः शिवदृष्टौ—
'घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना ।
सदाशिवात्मना वेद्मि स वा वेत्ति मदात्मना ॥
नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ।'
इत्यादि । 'ऊह्यते' इत्यनेन ज्ञानस्य प्रमेयत्वं न निर्वहति—इति दर्शयति, अन्यथा हि
अनुमीयते—इति ब्रूयात् । तदेवं येषां तार्किकप्रवादपांसुपातधूसरीभावो न वृत्तोऽस्मिन् संवेदनपथे,
ते इयतैव आत्मानमीश्वरं विद्वांसो घटशरीरप्राणसुखतदभावान् तत्रैव निमज्जयन्त ईश्वरसमा-
विष्टा एव भवन्ति । ततोऽयम् उपोद्घातः ।—उप इति आत्मनः समीपे टङ्कवत् ईश्वराभिज्ञानलक्षण
उत्कर्षो हन्यते विश्राम्यते येन; एतावदेव च अस्य ग्रन्थस्य तात्पर्यम्,—इति । ततोऽपि अयम्
उपोद्घातः ।—उपांशु अविततं कृत्वा उदिति शास्त्रस्य ऊर्ध्वं एव हन्यते अपसार्यते प्रमेयविषयो
व्यामोहो येन—इति । गत्यर्थत्वाद्वा हन्तेर्ज्ञानमर्थः, ज्ञायते प्रमेयं येन इति । केचित्तु र्गति
गुरु ने शिव दृष्टि शास्त्र में भी किया है—
'घट अपने आपको हमारे रूप से जानता है और मैं घट रूपमें जानता हूँ । मैं सदाशिव को
सदाशिव के रूप में जानता हूँ और वह मेरे रूप से मुझे जानता है । इस प्रकार अनेक रूपों में
अपने आपको जानते हुए स्वयं भगवान् शिव विराजमान है ।'
'ऊह्यते' इस पद से ज्ञान की प्रमेयरूपता नहीं बनती, अर्थात् ज्ञान प्रमेयरूप नहीं होता,
उसे तो प्रमाता का स्वरूप माना गया है—ऐसा 'ऊह्यते' क्रिया द्वारा दिखाया जाता है, नहीं तो
अनुमान किया जाता है—ऐसा कहो । इसलिए इस ज्ञान मार्गमें जो लोग तार्किक प्रवाद की धूलि
से दूषित नहीं हुए हैं वे लोग इतने ही ज्ञान से अपने आपको ईश्वर मानते हुए घट-शरीर-प्राण
सुखादि को और उन सबोंके अभावों को उन्हीं में डुबाते हुए—ईश्वर परमात्मा में ही समाविष्ट
हो जाते हैं । इस कारण से ही यह उपोद्घात शब्द सिद्ध होता है 'उप' शब्द का अर्थ यह होता है
कि—आत्मा के समीप में टंकना के सदृश ईश्वर का अभिज्ञान-पहचान रूप उत्कर्ष जिससे पहुँचा
दिया जाय उसी की उपोद्घात संज्ञा होती है, और इतना ही इस ग्रन्थ का तात्पर्य है, इसलिए भी
यह उपोद्घात है । उपांशु = एकान्त में फैलने न देकर सभी शास्त्रों के ऊपर प्रमेय विषय को हटाते
हुए जिससे आत्मा को उठाया जाय वही उपोद्घात है । गतिरूप अर्थ होने के कारण 'हन्' धातु
स्थावरपर्यन्त वह सर्वज्ञ शिव ही एक प्रमाता है । इसलिये रामावतार कालमें मैं नहीं था यह बात
नहीं है अपितु मैं उस समय में भी था जो कि दूसरे प्रमाता में संवेदन ज्ञान से वक्ता ही उस काल का
अनुभव करने वाला है ।
१. चिन्तां प्रकृतसिद्ध्यर्थामुपोद्घातं प्रचक्षते ।
प्रसक्तानुप्रसक्तादि प्रस्तुतादुपजायते ॥
बुद्धि में प्रतिपाद्य विषय का संग्रह कर उसके अर्थ को अर्थान्तर से कहना ही उपोद्घात
कहलाता है । प्रकृत प्रसंग के विचार-विमर्श को सिद्ध करने के लिए यथाक्रम वर्णन करते हुए रखना ही
उपोद्घात है ।