ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-२
असिद्धः परत्र कां सिद्धिं कुर्यात् ? आत्मापि अस्वप्रकाशो जड एव तत्तुल्ययोगक्षेमः । स्वप्रकाश-
स्वभावः इति चेत्, कीदृशेन स्वेन रूपेण आभाति ? यदि परिनिष्ठितसंविन्मात्ररूपेण, तदा संविदां
भेदनं, भेदितानां च अन्तरनुसंधानेन अभेदनं न स्यात्; तेन स्वतन्त्रस्वप्रकाशात्मतया तावत् स
भासते, तथा भासमानश्च कीदृशमीश्वरं साधयेत् निषेधेत् वा ? कर्तृज्ञातृस्वभावम् इति चेत्, ननु
स प्रमातैव तथाभूतः — इति कोऽन्यः सः ? ननु सर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वे प्रमातुर्न स्तः, न खलु सर्व-
शब्दार्थो ज्ञातृकर्तृत्वयोः स्वरूपं भिनत्ति, भेददर्शनेऽपि ईश्वरज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नादेर्नित्यस्य विषयेण
अकारणभूतेन अनाधेयातिशयत्वात् । प्रकाशमानतानयनमेव विषयत्वम् इति चेत्, अप्रकाशस्व-
भावस्य तथात्वमनुचितम् — इति वक्ष्यामः । प्रकाशमानस्वभावत्वे विषयोऽपि सर्वात्मना प्रकाश
एव निमग्न इति प्रकाशः प्रकाशते — इत्येतावन्मात्रपरमार्थत्वे कः सर्वज्ञासर्वज्ञविभागः ?,
प्रमाणमपि एवं सिद्धत्वासिद्धत्वाभ्यां पर्यनुयोज्यम्; एवं सिद्धिरपि । तस्मात् विषयाभिमतं वस्तु-
शरीरतया गृहीत्वा तावत् निर्भासमान आत्मैव प्रकाशते विच्छेदशून्यः, सुषुप्तमपि प्रति प्रकाशत
वह भी स्वप्रकाश स्वभाव वाला है अथवा नहीं है ? यदि देहादि जड-भाव को ही मानते हो, तो
वह भी अपने में असिद्ध होता हुआ दूसरे की कौन सी सिद्धि कर देगा ? इससे तो फिर आत्मा भी
अप्रकाश रूप जड तुल्य हो जायेगा और यदि उसे स्वप्रकाश तुल्य मान लिया जाय; तो फिर वह
कैसे अपने स्वयं के स्वरूप को भासित करेगा ? यदि कहो कि परिमित संवित्मात्र रूप से भासता
है, तब तो ज्ञानों का भेद दिखाई पड़ता है और भेद से अलग किये पदार्थों के भीतर अनुसन्धान
रूप से अभेद का होना मुश्किल हो जायेगा; इसलिए यह मानना होगा कि वह स्वतंत्र अपने
प्रकाशात्मक रूप से भासित होता हुआ कैसे ईश्वर की सिद्धि कर पायेगा या निषेध कर सकेगा ?
यदि स्वप्रकाश रूप आत्मा कर्तारूप और ज्ञातारूप है—ऐसा मानते हो तो वह प्रमाता हो उसी
प्रकार का है, ऐसी बात है तो फिर दूसरा कौन वह है ?
'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि सर्वकर्तृत्व और सर्वज्ञत्व भी तो उस प्रमाता में नहीं है,
क्योंकि सर्वकर्तृत्व और सर्वज्ञत्व तो ईश्वर परमात्मा में रहते हैं; सर्वशब्द का अर्थ कर्तृत्व ज्ञातृत्व
के स्वरूप का भेद नहीं करता है, भेदवादी के दर्शनों में भी ईश्वर का ज्ञान, करने की इच्छा और
प्रयत्नादि के नित्य होने से; एवं विषय का कारण नहीं होने से उसमें कुछ भी अतिशय नहीं लगाया
जा सकता है । यदि ईश्वर परमात्मा में प्रकाशमानता लाया जाना ही विषय मानते हो; तब
तो फिर यह अप्रकाश वाले का ही धर्म हो जाता है जब कि उसो प्रकार से मानना उचित नहीं
दिखायी देता है—इस विषय में हम स्वयं आगे कहेंगे—
प्रकाशमान स्वभावता के रहने पर विषय भी सब तरह से प्रकाश में अन्तर्निहित रहता है;
प्रकाश प्रकाशरूप से प्रकाशित रहता है, यही वस्तुस्थिति है और जब इस प्रकार परमार्थभाव के
रहने पर फिर सर्वज्ञ और असर्वज्ञ का विभाग कौन-सा माना जाये ? जबकि सर्वज्ञ और असर्वज्ञ
के विचार की यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं दिखायी पड़ती है ? प्रमाण भी सिद्ध है या असिद्ध
है इस ढंग से इसमें भी पूछना होगा [ यदि प्रमाण प्रकाश के अन्तर्गत सिद्ध है तब फिर प्रकाश
ही अपने आपकी सिद्धि एवं निषेध क्या करेगा ? यदि असिद्ध है तो फिर अप्रकाश स्वभाव वाले
का उसी प्रकार का होना अनुचित ही है ] एवं सिद्धि के विषय में भी विचार करना होगा ।
इसलिए शरीर धारण करके तब तक निर्भासित होता हुआ विच्छेद शून्य होकर आत्मा ही