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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

अ.-४, आ.-१, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१९
भौमान्रसाञ्जलमयांश्च न सस्यपुष्टौ
मुक्त्वाकमेकमिह योजयितुं क्षमोऽन्यः ॥ २ ॥
आत्मानमनभिज्ञाय विवेक्तुं योऽन्यदिच्छति ।
तेन भौतेन किं वाच्यं प्रश्नेऽस्मिन्को भवानिति ॥ ३ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां
श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितविमर्शिन्याख्यटीको-
पेतायां तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं
प्रथमाह्निकम् ॥ १ ॥
आगमशास्त्रों से सम्बन्ध रखनेवाले जितने भी अर्थ हैं वे सब के सब हमारे शैवाद्वैत शास्त्र में
उपयोगी सिद्ध होते हैं । भूमिगत एवं जलमय धान्यादिकों के लिए रसवर्धक एक सूर्य को छोड़कर
अन्य कौन समर्थ है अर्थात् दूसरा कोई भी नहीं हो सकता है ।। २ ।।
जो अपने आपके लिए अनभिज्ञ है वह यदि दूसरों को समझाने की इच्छा करता है तो
उस मूढ को पूछना चाहिए कि आप स्वयं कौन हो ? जो कि दूसरों के लिए विवेचन करने चल
पड़े हो ।। ३ ।।
प्रथम आह्निक समाप्त
इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता
चतुर्थतत्त्वसंग्रहाधिकारहिन्दीव्याख्या
शिवरञ्जनी
इति चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः समाप्तः
ग्रन्थोऽयं समाप्तिमगात्