ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-८-९
संभवति, तत् कथम् अमीषाम् अर्थक्रिया स्यात्, दृश्यते च विकल्पोल्लिखितः पिशाचादिः त्रासा-
दिविधायी ? इत्याशङ्क्याह—
विकल्पे योऽयमुल्लेखः सोऽपि बाह्यः पृथक्प्रथः ।
प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यं ततो भेदो हि बाह्यता ॥ ८ ॥
विमर्शविशेषरूपे विकल्पज्ञाने य उल्लिख्यमानः कान्ताचोरादिः अर्थः सोपि बाह्यः, न
केवलं बहिरवलोक्यमानः, यस्मात् सोऽपि प्रमातुः सकाशात् पृथगेव प्रथते 'अयमिति' यच्च
प्रमातरि अहमित्येव विश्रान्तत्वं, तत् आन्तरत्वम्, अन्तरिति निकटम्, तच्च किंचित् अपेक्ष्य,
अपेक्षणीयश्च सर्वत्र प्रमातैव अपेक्षणीयान्तराभावे, ततश्च प्रमातरि निकटं तादात्म्यं प्राप्तमेव
इति, ततो यत् भिन्नं तत् बाह्यमेव इति युक्ता—उल्लेखस्यापि अर्थक्रिया ॥ ८ ॥
ननु कुम्भकारादिव्यापारेण घटादेः अस्तु बाह्यत्वम्, अन्तःकरणगोचरस्य तु किं कृतं तत् ?
इत्याशङ्क्य आह—
उल्लेखस्य सुखादेश्च प्रकाशो बहिरात्मना ।
इच्छातौ भर्तुरध्यक्षरूपोऽक्षादिभुवां यथा ॥ ९ ॥
पिशाचादि का ज्ञान संभव नहीं हो सकता है; क्योंकि बाह्येन्द्रियों से पिशाचादि का ज्ञान होना
असंभव है, तब विकल्पों से होनेवाले पिशाचादि के ज्ञान से अर्थक्रिया कैसे होगी ? और विकल्पों
से उठे हुए पिशाचादि त्रास आदि देनेवाले देखे जाते हैं—ऐसी आशंका कर कहते हैं—
जो यह विकल्प में उल्लेख होता है, वह भी पृथक्-पृथक् फैलनेवाला बाहरी है । एक प्रमाता
में होनेवाला अन्तर का ही प्रकाश होता है; क्योंकि उससे भिन्न होना ही बाहरी प्रकाश है ॥ ८ ॥
स्थूल विमर्श के विशेषरूप विकल्पज्ञान में जो कहे गये कान्ता, चोरादि पदार्थों के अर्थ
[ आकार ] हैं वे भी बाहरी हैं, केवल बाहर में देखा भी नहीं जाता है; क्योंकि वह तो बाहर की
चीज है, जिस कारण से वह भी प्रमाता से भिन्न ही भासता है । इसलिए 'अयमिति' ऐसा कहा
जाता है इस प्रकार प्रमाता में अहं शब्द से विश्रान्त रहता है, उसे आन्तर में रहनेवाला कहा
जाता है । यहाँ पर अन्तर शब्द का 'समीप' निकट अर्थ है, वह किसी को अपेक्षा करके होता है
और अपेक्षणीय वस्तु-पदार्थ सर्वत्र प्रमाता ही माना जाता है; क्योंकि कोई दूसरा अपेक्षणीय नहीं
रहता है, इसलिए प्रमाता के समीप तादात्म्य प्राप्त किये ही रहता है । इसलिए उससे जो भिन्न
है, वह बाहरी है—यह अर्थक्रिया का उल्लेख युक्त ही है ॥ ८ ॥
अब शंका करते हैं कि कुंभकार के व्यापार के द्वारा उत्पन्न होनेवाले घटादि का बाहरी-
पन भले ही हो, किन्तु अन्तःकरण में होनेवाले जो नील-सुखादि है, उसे किस हेतु द्वारा आपने
बाहर में मान लिया है ? ऐसी आशंका कर कहते हैं—
जो अन्तःकरण में विषय नील-सुखादि का बाहर प्रकाश आता है वह ईश्वर की इच्छा से
होता है । जैसा कि चक्षु-इन्द्रियों से होनेवाले विषयों का प्रत्यक्ष प्रकाश बाहर में होता है ॥ ९ ॥
१. इच्छात्तः इसमें तसिलः सार्वविभक्तिकत्वात् तृतीयार्थे तसिः
तृतीया विभक्ति में तसिल् प्रत्यय हुआ है—ऐसा अर्थ अभिव्यक्त होता है ।
२. अक्षादिभूवां विषयाणाम् यथा प्रकाशः । अक्षादि-इन्द्रियों के विषयों का जैसा प्रकाश होता है ।