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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 343 में से

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पृष्ठ 186

अ.-१, आ.-८, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १६३
ननु इयता किमुक्तम् भवति—बाह्यरूपतः स्रगादयः सुखादिहेतवो बाह्यजनिताश्च सुखादयः
सुख्यहमिति अभिमानहेतवः इति, ततश्च बाह्यत्वाभावे तज्जन्यत्वाभावे च न तथा इति उक्तं
स्यात्, तत्र च त एव न केचित्, ततश्च कथमुक्तम् ‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः’
इति—सत्ताया एव अभावात् ? इत्याशङ्क्याह—
भावाभावावभासाना बाह्यतोपाधिरिष्यते ।
नात्मा सत्ता ततस्तेषामान्तराणां सतां सदा ॥ ५ ॥
इह सुखमस्ति मम, दुःखं नास्ति ममेति ये भावाभासा अभावाभासाश्च तेषां बाह्यत्वं
नाम आत्मा—स्वरूपं न भवति, नहि सुखमित्यस्य स्वरूपं ‘बाह्यम्’ इति वपुषा भाति, सुखस्य
हि सुखमेव स्वरूपम् केवलं बाह्यत्वं नाम आभासान्तरम् ईश्वरेण स्वातन्त्र्यबलादेव यदा तत्र
सुखाभासे मिश्रतया भास्यते तदा तत् तस्य उपाधिरूपताम् उपरजकतां विशेषणत्वं गच्छति,
ततश्च यथा नीलाभासाभावे उत्पलाभासस्य न किञ्चित् वृत्तं स्वरूपतो, राजाभासाभावे वा
पुरुषाभासस्य, तथा बाह्यत्वाभासाभावेऽपि सुखाभासस्य दुःखाभावाभासस्य कान्ताभासस्य च
न स्वरूपतः काचन म्लानता इति आन्तराणां सदैव स्थितिः एषाम् ॥ ५ ॥
अब शङ्का करते हैं कि इतने का क्या निष्कर्ष है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि बाह्यरूप
जो सुखादि के हेतु स्त्री, चन्दन, माला आदि हैं और बाहर में होनेवाले सुखादि हैं जिनका विमर्श
होता कि मैं सुखी हूँ, यह अभिमान का हेतु है जो कुछ होता है, उन सभी के बाह्य हेतुओं के
भाव में और उससे पैदा हुए सुखादि हेतुओं के अभाव में वैसा परामर्श नहीं होगा—यही परिणाम
निकलेगा । बाह्यत्व के अभाव में यही रहेगा, दूसरा कोई नहीं होगा । तब कैसे कहा आपने कि
‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः, अर्थात् अर्थविभास की सत्ता [ स्वरूप ] में कहीं भी
विशेषता क्या नहीं होती ? क्योंकि सुख की सत्ता का अभाव होता है, ऐसी आशङ्का कर
कहते हैं—
सुख या सुखाभाव के आभासों में बाह्य हेतु की ही उपाधि होती है । अपने स्वरूप की
सत्ता या उसकी आन्तरिक सत्ता ही सदा भासित होती है ॥ ५ ॥
मुझे सुख है, [ यह भाव अवभास है ] और मुझे दुःख नहीं है, [ यह अभाव अवभास है ]
ये सुख के भाव अवभास और दुःख के अभाव अवभास हैं। इनमें से किसी का भी बाहर में कोई
स्वरूप नहीं होता है । सुख का स्वरूप ‘बाह्य’ किसी स्वरूप से नहीं भासता है, सुख का सुख
ही स्वरूप है । बाहर में तो दूसरे आभास भी भूमि में होता, जब ईश्वर के द्वारा स्वातन्त्र्य बल
से सुखाभास में मिश्रभाव से भासित होता है तब सुखादि को बाह्यता उपाधिरूप में मिली हुई
भासती है और विशेषणता को भी प्राप्त करती है । जैसा कि नीलाभास के अभाव में उत्पलाभास
का कुछ स्वरूप नहीं रहता है अथवा राजाभास के अभाव में पुरुषाभास का और बाह्यत्व
आभास के अभाव में भी सुखाभास का और दुःखाभाव के आभास का और उसके हेतु कान्ता-
भास के स्वरूप में कोई मलिनता नहीं आती; क्योंकि उनमें आन्तरिक सुख और दुःखाभाव की
स्थिति सदैव बनी रहती है ॥ ५ ॥