ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-४-५
का प्रत्याशा । भवन्तु वा वासना भिन्नाः, तथापि बोधमात्रातिरिक्तस्य देशकालभावादेः प्रबोध-
काभिमतस्य विचित्रस्य कारणस्य अभावात् प्रबोधोऽविचित्र इति एक एव प्रबोधः इति सममेव
नीलादिवैचित्र्यं भासेत । अथ स्वसन्तानवर्त्तीनि बोधान्तराणि विचित्राणि प्रबोधकारणानि इति,
तदसत्, सुख-दुःख-नील-पीतादि-पूर्वापरादिदेश-कालभेदस्य विज्ञानमात्ररूपत्वे विज्ञानस्य च
प्रकाशमात्रपरमार्थतायां स्वरूपभेदासम्भवे बोधवैलक्षण्यानुपपत्तेः । परप्रमातृरूपेषु बोधान्तरेषु
सन्तानान्तरशब्दवाच्येष्वपि तुल्योऽयम् अवैलक्षण्यप्रकारः । तत्रापि परकीयाभिमतस्य कृशस्थूलादेः
कायस्य, श्वासप्रश्वासादेः प्राणस्य, सुखदुःखादेः धीगुणस्य, अनुमात्राभिमतसंविन्मात्ररूपा-
भेदे परत्वं कस्य इति न विद्मः । बोधस्य तन्निष्ठस्य इति चेत्, सोऽपि प्रमाणेन यदि न सिद्धः
तत् असन् एव, सिद्धोऽपि प्रमेयंतया चेत् तत् जड एव, तथापि च कायादिवत् एव ज्ञानमात्र-
स्वभावः—स्वसंविन्मात्ररूपत्वे परं प्रति अस्य असिद्धेः । ननु व्याहारादिक्रिया स्वात्मनि इच्छया
व्याहरेयम् इत्येवंरूपया हेतुभावेन व्याप्ता दृष्टा तत् चैत्रकायेऽपि तया तद्धेतुकया भाव्यम् । न च
मत्संततिपतिता समीहा अस्ति इति स्वसंवेदनेन निश्चितम्, ततश्च परसमीहा सिद्धयति, तदेव
वासना भिन्न हो, फिर भी बोधमात्र से अतिरिक्त जो देश-कालादि हैं उसे प्रबोध करनेवाले के
माने हुए विचित्र कारण का अभाव होने से बोध अविचित्र ही रहता है एक ही [ आभास रूप ]
प्रबोध नीलादि विचित्रता को युगपत् भासित करेगा । [ विज्ञानवादी के मत की आशंका 'अथ'
शब्द से करते हैं ]
अपने सन्तान 'प्रवाह' में रहनेवाले अन्य-अन्य ज्ञान विचित्र कारण होंगे, ऐसा बाह्यार्थ-
वादी का कहना ठीक नहीं बैठता है, क्योंकि सुख-दुःख नीला-पीतादि, पूर्वोत्तर देश-काल के भेद
का विज्ञानमात्र स्वरूपत्वमें और विज्ञान का प्रकाशमात्र परमार्थरूप में स्वरूप भेद सम्भव नहीं
होने से बोध की विलक्षणता नहीं बैठ सकती है । इसीमें दूसरे पक्ष से कहते हैं । प्रमातृरूप दूसरे
बोध में, दूसरे सन्तान प्रवाह शब्द के वाच्य में बोध की स्वरूपता अभिन्न ही रहती है अर्थात्
दूसरे सन्तान में भी समानता का ही समर्थन किया जाता है। अभेदता में भी दूसरे से माना हुआ
कृश-स्थूलादि शरीर का श्वास-प्रश्वासादि प्राण का, सुख-दुःखादि बुद्धि के गुग का, अनुमान
करनेवाले के अभिज्ञान मात्र से अभेद होनेसे किसको तुम परत्व कहोगे; यह हमारी समझ
में नहीं आता है ।
यदि बोधको परनिष्ठ मानते हो तो, वह भी प्रत्यक्ष प्रमाण से यदि सिद्ध नहीं है तब तो
वह असत् ही है, प्रमेयरूप [ बोधरूप ] से यदि सिद्ध भी मान लिया जाय तो भी वह जडरूप ही
हो जायेगा और जडता होने पर भी शरीरादि के समान ज्ञानमात्र स्वभाववाला परनिष्ठ अर्थात्
जडरूप ही होगा, ज्ञानमात्ररूप होनेपर वह दूसरों के प्रति असिद्ध हो जायेगा; क्योंकि ज्ञानोंकी
परस्पर संवेद्यता नहीं बनती है ।
'ननु' कहकर [ सौगत ] बौद्धलोग प्रमाण देते हैं कि व्याहारादि क्रिया [ बोलना ] अपने
आप [ स्व सन्तान ] में इच्छा से बोलेंगे इस हेतु रूप भाव से व्याप्त देखी गयी है वही चैत्र के
शरीर में भी उसी [ इच्छारूप हेतु ] से होनी चाहिए । क्षण सन्तान में आनेवाली अन्य की इच्छा
नहीं है अपने अनुभव ज्ञान से निश्चित होती है इसीलिए दूसरे की इच्छा सिद्ध हो जाती है, वही