सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

-१९८ ] बुद्धिवलके लिये वीरसेन की कहानी ७३
यतः,—
अम्भांसि जलजन्तूनां दुर्गं दुर्गनिवासिनाम् ।
स्वभूमिः श्वापदादीनां राज्ञां मन्त्री परं बलम् ॥ १९६ ॥
क्योंकि-जलके जन्तुओंको जलका, गढ़में रहने वालोंको गढ़का, सिंहादि वन-
चरोंको अपनी भूमीका, और राजाओंको मंत्रीका, परम बल होता है ॥ १९६ ॥
सखे लघुपतनक ! अनेनोपदेशेन तथा भवितव्यम्,
हे सखे लघुपतनक ! इस उपदेशसे वह गति होगी;
स्वयं वीक्ष्य यथा वध्वाः पीडितं कुचकुड्मलम् ।
वणिक्पुत्रोऽभवद्दुःखी त्वं तथैव भविष्यसि' ॥ १९७ ॥
जैसे कि एक बनियेका पुत्र आपही अपनी स्त्रीके कमलकी कलीके समान कुच
(राजाको) मसलते हुए देख कर दुःखी हुआ, वैसेही तुम भी होंगे' ॥ १९७ ॥
ते ऊचुः—'कथमेतत् ?' । हिरण्यकः कथयति—
वे दोनो पूछने लगे—'यह कथा कैसी है ?'. हिरण्यक कहने लगा—
कथा ७
[राजकुमार, एक सुंदर युवति और उसके पतिकी कहानी ७]
अस्ति कान्यकुब्जविषये वीरसेनो नाम राजा । तेन वीरपुर-
नाम्नि नगरे तुङ्गबलो नाम राजपुत्रो भोगपतिः कृतः । स च
महाधनस्तरुण एकदा स्वनगरे भ्राम्यन्नतिप्रौढयौवनां लावण्य-
वतीं नाम वणिक्पुत्रवधूमालोकयामास । ततः स्वहर्म्यं गत्वा
स्मराकुलमतिस्तस्याः कृते दूतीं प्रेषितवान् ।
कान्यकुब्ज देशमें एक वीरसेन नामक राजा था । उसने वीरपुर नाम नगरमें
तुंगबल नाम राजपुत्रको युवराज कर दिया था । उस बड़े धनवान् तरुणने एक
दिन नगरमें फिरते हुए एक नव-यौवनवती लावण्यवती नामक बनियेकी पुत्रवधूको
देखा । फिर अपने राजभवनमें जा कर कामान्ध हो उसके लिये दूती भेजी.
यतः,—
सन्मार्गे तावदास्ते, प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां,
लज्जां तावद्विधत्ते, विनयपि समालम्बते तावदेव ।
भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्मण एते
यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ॥