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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 302 में से

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७२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९५-
यतः,—
औरसं कृतसम्बन्धं तथा वंशक्रमागतम् ।
रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् ॥ १९५ ॥
क्योंकि-मित्र चार प्रकारके होते हैं; एक तो औरस अर्थात् जन्मसेही हो
जैसे पुत्रादि, और दूसरे विवाहादि संबन्धसे हो गये हों और तीसरे कुल-पर-
म्परा से आए हुए हों, और चौथे वे जो आपत्तियोंसे बचावें ॥ १९५ ॥
तदत्र भवता स्वगृहनिर्विशेषं स्थीयताम्' । तच्छ्रुत्वा मृगः सानन्दो
भूत्वा स्वेच्छाहारं कृत्वा पानीयं पीत्वा जलासन्नतुरुच्छायाया-
मुपविष्टः । अथ मन्थरेणोक्तम्—'सखे मृग ! एतस्मिन्निर्जने वने
केन त्रासितोऽसि ? कदाचित्किं व्याधाः संचरन्ति ?' । मृगेणो-
क्तम्—'अस्ति कलिङ्गविषये रुक्माङ्गदो नाम नरपतिः । स च
दिग्विजयव्यापारक्रमेणागत्य चन्द्रभागानदीतीरे समावासित-
कटको वर्तते । प्रातश्च तेनात्रागत्य कर्पूरसरःसमीपे भवितव्य-
मिति व्याधानां मुखात्किंवदन्ती श्रूयते । तदत्रापि प्रातरवस्थानं
भयहेतुकमित्यालोच्य यथावसरकार्यमारभ्यताम्' । तच्छ्रुत्वा
कूर्मः सभयमाह—'जलाशयान्तरं गच्छामि' । काकमृगावप्युक्त-
वन्तौ—'एवमस्तु' । ततो हिरण्यको विहस्याह—'जलाशयान्तरे
प्राप्ते मन्थरस्य कुशलम् । स्थले गच्छतः कः प्रतीकारः ?
इसलिये यहां तुम अपने घरसेभी अधिक आनन्दसे रहो । यह सुन कर मृग
प्रसन्न हो अपनी इच्छानुसार भोजन करके तथा जल पी कर जलके पास वृक्षकी
छायामें बैठ गया ॥ मन्थरने कहा कि-'हे मित्र मृग ! इस निर्जन वनमें तुम्हें
किसने डराया है ? क्या कभी कभी व्याध आ जाते हैं ?' । मृगने कहा-'कलिंग
देशमें रुक्मांगद नाम राजा है । और वह दिग्विजय करनेके लिये आ कर
चन्द्रभागा नदीके तीर पर अपनी सेनाको टिका कर ठहरा है । और प्रातःकाल
वह यहां आ कर कर्पूरसरोवरके पास ठहरेगा यह उड़ती हुई बात शिकारीयोंके
मुखसे सुनी जाती है । इसलिये प्रातःकाल यहां रहनाभी भयका कारण है ।
यह सोच कर समयके अनुसार काम करना चाहिये' । यह सुन कर कछुआ डर
कर बोला-'मैं तो दूसरे सरोवरको जाता हूं' । काग और मृगनेभी कहा-'ऐसाही
हो अर्थात् चलो' । फिर हिरण्यक हँस कर बोला-'दूसरे सरोवरतक पहुंचने पर
मंथर जीता बचेगा । परंतु इसके पटपड़में चलनेका कौनसा उपाय है ?