हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १६६-
अथ तयोः पादास्फालनेन सर्पोऽपि मृतः। अथानन्तरं दीर्घरात्रो
नाम जम्बुकः परिभ्रमन्नाहारार्थी तान्मृतान्मृगव्याधसर्पशूकरान-
पश्यत्। अचिन्तयच्च — 'अहो ! अद्य महद्भोज्यं मे समुपस्थितम्।
उन दोनोंके पैरोंकी रगड़से एक सर्पभी मर गया। इसके पीछे आहारको
चाहने वाले दीर्घराव नाम गीदडने घूमते २ उन मृग, व्याध, सर्प और शूकरको
मरे पड़े हुए देखा और विचारा कि 'आहा ! आज तो मेरे लिये बड़ा भोजन
तैयार है॥
अथवा,—
अचिन्तितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् ।
सुखान्यपि तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते ॥ १६६ ॥
अथवा—जैसे देहधारियोंको अनायास दुःख मिलते हैं वैसेही सुखभी मिलते
हैं, परन्तु इसमें प्रारब्ध बलवान् है ऐसा मानता हूं ॥ १६६ ॥
तद्भवतु । एषां मांसैर्मासत्रयं मे सुखेन गमिष्यति ।
जो कुछ हो, इनके मांसोंसे मेरे तीन महीने तो सुखसे कटेंगे ।
मासमेकं नरो याति द्वौ मासौ मृगशूकरौ ।
अहिरेकं दिनं याति अद्य भक्ष्यो धनुर्गुणः ॥ १६७ ॥
एक महीनेको मनुष्य होगा, दो महीनेको हरिण और सूकर होंगे और एक
दिनको सर्प होगा, और आज धनुषकी डोरी चाबनी चाहिये ॥ १६७॥
ततः प्रथमबुभुक्षायामिदं निःस्वादु कोदण्डलग्नं स्नायुबन्धनं
खादामि ।' इत्युक्त्वा तथा कृते सति छिन्ने स्नायुबन्धने उत्पति-
तेन धनुषा हृदि निर्भिन्नः स दीर्घरावः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं
ब्रवीमि — “कर्तव्यः संचयो नित्यम्” इत्यादि ।
फिर पहिली भूखमें यह स्वादरहित, धनुषमें लगा हुआ तांतका बन्धन
खाऊं।' यह कह कर वैसा करने पर तांतके बंधनके टूटतेही उछटे हुए धनुषसे
हृदय फट कर वह दीर्घराव मर गया । इसलिये मैं कहता हूं “संचय नित्य करना
चाहिये” इत्यादि ।
तथा च,—
यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥ १६८ ॥