हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१६५ ] अतिसंचयकी निंदा ६३
दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् ।
वित्तं त्यागनियुक्तं दुर्लभमेतच्चतुष्टयं लोके ॥ १६३ ॥
प्रिय वाणीके सहित दान, अहंकाररहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता, और
दानयुक्त धन, ये चार बातें दुनियामें दुर्लभ हैं ॥ १६३ ॥
उक्तं च,—
‘कर्तव्यः संचयो नित्यं कर्तव्यो नातिसंचयः ।
पश्य संचयशीलोऽसौ धनुषा जम्बुको हतः’ ॥ १६४ ॥
और संचय नित्य करना चाहिये, परं अति संचय करना योग्य नहीं है ।
देखो, अधिक संचय करने वाला गीदड़ धनुषसे मारा गया ॥ १६४ ॥
तावाहतुः—‘कथमेतत् ?’ । मन्थरः कथयति—
वे दोनो बोले—‘यह कथा कैसे है ?’ मन्थर कहने लगा—
कथा ६
[ शिकारी, मृग, शूकर और गीदड़की कहानी ६ ]
आसीत्कल्याणकटकवास्तव्यो भैरवो नाम व्याधः । स चैकदा
मृगमन्विष्यमाणो विन्ध्याटवीं गतवान् । ततस्तेन व्यापादितं मृग-
मादाय गच्छता घोराकृतिः शूकरो दृष्टः । तेन व्याधेन मृगं भूमौ
निधाय शूकरः शरेणाहतः । शूकरेणापि घनघोरगर्जनं कृत्वा स
व्याधो मुष्कदेशे हतः संश्छिन्नद्रुम इव भूमौ निपपात ।
कल्याणकटक वस्तीमें एक भैरव नाम व्याध (शिकारी) रहता था । वह एक
दिन मृगको ढूंढ़ता ढूंढ़ता विंध्याचलकी ओर गया । फिर मारे हुए मृगको
ले कर जाते हुए उसने एक भयंकर शूकरको देखा । तब उस व्याधने मृगको भूमि
पर रख कर शूकरको बाणसे मारा । शूकरनेभी भयंकर गर्जना करके उस व्याधके
मुष्कदेशमें ऐसी टक्कर मारी कि, वह कटे हुए पेड़के समान जमीन पर गिर पड़ा ।
यतः,—
जलमग्निर्विषं शस्त्रं क्षुद्व्याधिः पतनं गिरेः ।
निमित्तं किंचिदासाद्य देही प्राणैर्विमुच्यते ॥ १६५ ॥
क्योंकि-जल, अग्नि, विष, शस्त्र, भूख, रोग और पहाड़से गिरना इसमेंसे
किसी न किसी बहानेको पा कर प्राणी प्राणोंसे छूटता है ॥ १६५ ॥