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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

-१२५] सन्धि प्रकार २५९
यत्र भूम्येकदेशेन पणेन रिपुरूर्जितः ।
संधीयते संधिविद्भिः स चादिष्ट उदाहृतः ॥ ११९ ॥
जहाँ राज्यका एक भाग देनेके पणसे बलवान् शत्रुके साथ जो संधि की
जाती है, उसको संधि जानने वाले "आदिष्टसंधि" कहते हैं ॥ ११९ ॥
स्वसैन्येन तु संधानमात्मादिष्ट उदाहृतः ।
क्रियते प्राणरक्षार्थं सर्वदानादुपग्रहः ॥ १२० ॥
अपनी सेनाके साथ जो संधि करता है वह "आत्मादिष्टसंधि" है और जो
अपनी रक्षाके लिये सर्वस्व दे कर की जाती है वह "उपग्रहसंधि" है ॥ १२०॥
कोशांशेनार्धकोशेन सर्वकोशेन वा पुनः ।
शिष्टस्य प्रतिरक्षार्थं परिक्रय उदाहृतः ॥ १२१ ॥
जो कोशसे कुछ भाग, आधे कोशसे या संपूर्ण कोशसे सज्जन मंत्रीकी
रक्षाके लिये की जाती है वह "परिक्रयसंधि" कही गई है ॥ १२१ ॥
भुवां सारवतीनां तु दानादुच्छिन्न उच्यते ।
भूम्युत्थफलदानेन सर्वेण परभूषणः ॥ १२२ ॥
सारवती अर्थात अन्नसे पूर्णा भूमिके देनेसे जो हो उसे "उच्छिन्नसंधि" कहते
हैं और भूमिमें उपजे हुए संपूर्ण फलके देनेसे जो हो उसे "परभूषणसंधि"
कहते हैं ॥ १२२ ॥
परिक्लिन्नं फलं यत्र प्रतिस्कन्धेन दीयते ।
स्कन्धोपनेयं तं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १२३ ॥
और जिसमें खेतसे लाया हुआ और स्वच्छ किया हुआ अन्न कंधोंके ऊपर लिब
ले जा कर दिया जाता है, संधि जानने वाले उसको "स्कन्धोपनेयसंधि" कहते
हैं ॥ १२३ ॥
परस्परोपकारस्तु मैत्री संबन्धकस्तथा ।
उपहारश्च विज्ञेयाश्चत्वारश्चैव संधयः ॥ १२४ ॥
परस्पर आपसमें उपकार, मित्रता, संबन्ध तथा भेट येभी चार प्रकारकी
संधि जाननी चाहिये ॥ १२४ ॥
एक एवोपहारस्तु संधिरेव मतो मम ।
उपहारविभेदास्तु सर्वे मैत्र्यविवर्जिताः ॥ १२५ ॥