हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१५] मनोरूपराज्यमें आनंद माननेवालेकी निंदा २२५
सादरं तं नीत्वा स्थले धृतवान् । कुलीरोऽपि मत्स्यकण्टकाकीर्णं
तत्स्थलमालोक्याचिन्तयत्—'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु,
इदानीं समयोचितं व्यवहरिष्यामि' इत्यालोच्य कुलीरस्तस्य
ग्रीवां चिच्छेद । स बकः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"भक्ष-
यित्वा बहून्मत्स्यान्" इत्यादि ॥' ततश्चित्रवर्णोऽवदत्—'शृणु
तावन्मन्त्रिन् ! मयैतदालोचितमस्ति ।' अत्रावस्थितेन मेघवर्णेन
राज्ञा यावन्ति वस्तूनि कर्पूरद्वीपस्योत्तमानि तावन्त्यस्माकमुप-
नेतव्यानि । तेनास्माभिर्महासुखेन विन्ध्याचले स्थातव्यम् ।'
मच्छ बोले—'हे बगुले ! इसमें रक्षाका कौनसा उपाय है ? तब बगुला बोला—
दूसरे सरोवरका आश्रय लेना ही रक्षाका उपाय है । वहाँ मैं एक एक करके तुम
सबको पहुँचा देता हूँ।' मच्छ बोले—'अच्छा, ले चलो।' पीछे यह बगुला उन
मच्छोंको एक एक ले जा कर खाने लगा । इससे पीछे कर्कट उससे बोला—'हे बगुले !
मुझे भी वहाँ ले चल ।' फिर अपूर्व कर्कटके मांसका लोभी बगुलेने आदरसे
उसे भी वहाँ ले जा कर पटपड़में धरा । कर्कट भी मच्छोंकी हड्डियोंसे बिछे हुए
उस पड़ावको देख कर चिन्ता करने लगा—'हाय मैं मन्दभागी मारा गया । जो कुछ
हो, अब समयके अनुसार उचित काम करूँगा।' यह विचार कर कर्कटने उसकी नाइ
काट डाली और वह बगुला मर गया । इसलिये मैं कहता हूँ "बहुतसे मच्छोंको
खा कर" इत्यादि । फिर चित्रवर्ण बोला—'हे मंत्री ! सुनो, मैंने तो यही सोच
रक्खा है । वहाँ बैठा हुआ राजा मेघवर्ण जितनी उत्तम वस्तुएँ कर्पूरद्वीपकी
हैं उतनी हमारे पास भेटमें लावेगा । उससे हम विन्ध्याचलमें आनन्दसे रहेंगे ।'
दूरदर्शी विहस्याह—'देव !
दूरदर्शी हँस कर बोला—'हे महाराज !
अनागतवतीं चिन्तां कृत्वा यस्तु प्रहृष्यति ।
स तिरस्कारमाप्नोति भग्नभाण्डो द्विजो यथा' ॥ १५ ॥
जो नहीं आई हुई चिंताको करके प्रसन्न होता है वह मट्टीके बर्तन फोड़ने
वाले ब्राह्मणके समान अपमानको पाता है' ॥ १५ ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
हि० १५