हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ हितोपदेशः [ संधिः १४-
कथा ७
[ बूढे बगुले, केंकडे और मछलीकी कहानी ७ ]
'अस्ति मालवदेशे पद्मगर्भनामधेयं सरः। तत्रैको वृद्धो बकः
सामर्थ्यहीन उद्विग्नमिवात्मानं दर्शयित्वा स्थितः। स च केनचि-
त्कुलीरेण दृष्टः पृष्टश्च—'किमिति भवानत्राहारत्यागेन तिष्ठति ?'
बकेनोक्तम्-‘मत्स्या मम जीवनहेतवः ते कैवर्तैरागत्य व्यापादयि-
तव्या इति वार्ता नगरोपान्ते मया श्रुता। अतो वर्तनाभावादे-
वास्मन्मरणमुपस्थितमिति ज्ञात्वाऽऽहारेऽप्यनादरः कृतः ।'
ततो मत्स्यैरालोचितम्—'इह समये तावदुपकारक एवायं
लक्ष्यते । तदयमेव यथाकर्तव्यं पृच्छ्यताम् ।
'मालव देशमें पद्मगर्भ नाम एक सरोवर है। वहाँ एक बूढ़ा बगुला सामर्थ्य-
रहित सोचमें डूबे हुएके समान अपना स्वरूप बनाये बैठा था। तब किसी कर्कटने
उसे देखा और पूछा—'यह क्या बात है ? तुम भूखे प्यासे यहाँ बैठे हो ?' बगु-
लेने कहा—'मच्छ मेरे जीवनमूल हैं। उन्हें धीवर आ कर मारेंगे यह बात मैंने
नगरके पास सुनी है। इसलिये जीविकाके न रहनेसे मेरा मरणही आ पहुँचा,
यह जान कर मैंने भोजनमें भी अनादर कर रक्खा है।' फिर मच्छोंने सोचा-'इस
समय तो यह उपकार करने वाला ही दीखता है इसलिये इसीसे जो कुछ करना
है सो पूछना चाहिये ।
तथा चोक्तम्,—
उपकर्त्राऽरिणा संधिर्न मित्रेणापकारिणा ।
उपकारापकारौ हि लक्ष्यं लक्षणमेतयोः' ॥ १४ ॥
जैसा कहा है कि—उपकारी शत्रुके साथ मेल करना चाहिये और अपकारी
मित्रके साथ नहीं करना चाहिये, क्योंकि निश्चय करके उपकार और अपकार ही
मित्र और शत्रुके लक्षण हैं ॥ १४ ॥
मत्स्या ऊचुः-‘भो बक ! कोऽत्र रक्षणोपायः ?' । बको ब्रूते—
'अस्ति रक्षणोपायो जलाशयान्तराश्रयणम् । तत्राहमेकैकशो
युष्मान्नयामि।' मत्स्या आहुः—'एवमस्तु ।' ततोऽसौ बकस्तान्म-
त्यानेकैकशो नीत्वा खादति ।' अनन्तरं कुलीरस्तमुवाच—'भो
बक ! मामपि तत्र नय ।' ततो बकोऽप्यपूर्वकुलीरमांसार्थी