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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 302 में से

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पृष्ठ 203

-६३ ] दूतका कर्तव्य और प्रशंसा १८३
'देव ! आज्ञापय । हन्मि दुष्टं शुकम् ।' सर्वज्ञो राजानं काकं च
सान्त्वयन्ब्रूते—'शृणु तावत् ।
तब सभा करके तोते और कागको बुलाया । तोता कुछ ऊँचा शिर करके
दिये हुए आसन पर बैठ कर बोला-'हे हिरण्यगर्भ ! महाराजाधिराज श्रीमान्
चित्रवर्णने आपको अच्छी भाँति आज्ञा दी है—'जो तुम्हें अपने प्राणोंसे या
लक्ष्मीसे प्रयोजन है, तो शीघ्र आ कर हमारे चरणोंको प्रणाम करो । नहीं तो
दूसरे स्थानमें रहनेके लिये विचार करो ।' राजाने झुँझला कर कहा-'अरे ! कोई
हमारे सामने नहीं है जो इसको गला पकड़ कर निकाले ?' मेघवर्ण (कौवा) उठ
कर बोला-'महाराज ! आज्ञा कीजिये-दुष्ट तोतेको मार डालूँ । सर्वज्ञ (चकवा)
राजा और कौएको शांत करता हुआ बोला-'पहले सुन लीजिये-
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति
सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६१ ॥
जिसमें वृद्ध पुरुष नहीं हैं वह सभा नहीं कहलाती है, जो धर्मको न कहे वे
वृद्ध नहीं हैं, जिसमें सत्य नहीं है वह धर्म नहीं है, और वह सत्य नहीं है जो
छलसे युक्त है ॥ ६१ ॥
यतो धर्मश्चैषः,—
क्योंकि (सच्चा) धर्म यह है—
दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्यः स्याद्राजा दूतमुखो यतः ।
उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा ॥ ६२ ॥
दूत हीनजातिका भी हो पर मारनेके योग्य नहीं होता है, क्योंकि राजाका
दूतही मुख है कि जो शस्त्रोंके उठाने परभी विपरीत नहीं कहता है ॥ ६२ ॥
किं च,—
स्वापकर्षं परोत्कर्षं दूतोक्तैर्मन्यते तु कः ? ।
सदैवावध्यभावेन दूतः सर्वं हि जल्पति' ॥ ६३ ॥
और दूतकी बातोंसे अपनी लघुता और शत्रुको अधिकता कौन मानता है ?
दूत तो सदा 'मैं नहीं मारा जाऊंगा' इस भावनासे सभी कुछ कहता है ॥ ६३॥