हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ हितोपदेशः [ विग्रहः ५९-
क्योंकि—जिसका जैसा स्वभाव है वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे यदि
कुत्तेको राजा कर दिया जाय तो क्या वह जूतेको नहीं चबावेगा ? ॥ ५८ ॥
ततः शब्दादभिज्ञाय स व्याघ्रेण हतः ।
तब शब्दसे पहिचान कर उसे बाघने मार डाला;
तथा चोक्तम्,—
छिद्रं मर्म च वीर्यं च सर्वं वेत्ति निजो रिपुः ।
दहत्यन्तर्गतश्चैव शुष्कं वृक्षमिवानलः ॥ ५९ ॥
जैसा कहा है—जिस प्रकार भीतर घुसके अग्नि सूखे पेड़को भस्म कर
देती है वैसेही अपना दुश्मन अर्थात् भेदी, छिद्र ( कचावट ), मर्म (भेद ) और
पराक्रम ( बल ) को जानता है और नाश कर देता है ॥ ५९ ॥
अतोऽहं ब्रवीमि-“आत्मपक्षं परित्यज्य” इत्यादि ॥' राजाह—
‘यद्येवं तथापि दृश्यतां तावदयं दूरादागतः । तत्संग्रहे विचारः
कार्यः' । चक्रो ब्रूते—'देव ! प्रणिधिः प्रहितो दुर्गश्च सज्जीकृतः ।
अतः शुकोऽप्यानीय प्रस्थाप्यताम् ।
इसलिये मैं कहता हूँ—“अपने पक्षको त्याग कर” इत्यादि ।' राजा बोला-‘जो
यह बातभी है तोभी इतने दूरसे आये हुएको देखना चाहिये, और उसके
ठहरानेका विचार करना चाहिये ।' चकवा बोला-‘महाराज ! भेदियौकोभी बिदा
कर दिया और गढ़भी सज गया इसलिये तोतेको भी ला कर बैठाना चाहिये;
यतः,—
नन्दं जघान चाणक्यस्तीक्ष्णदूतप्रयोगतः ।
तद्दूरान्तरितं दूतं पश्येद्धीरसन्वितः' ॥ ६० ॥
क्योंकि—बड़े भीतरे, दूतके उपायसे चाणक्यने नन्द राजाको मारा इसलिये
राजाको बुद्धिमान् मंत्रियोंसहित दूतको दूरहीसे देखना चाहिये' ॥ ६० ॥
ततः सभां कृत्वाहूतः शुकः काकश्च । शुकः किंचिदुन्नतशिरा
दत्तासन उपविश्य ब्रूते—'भो हिरण्यगर्भ ! महाराजाधिराजः
श्रीमच्चित्रवर्णस्त्वां समाज्ञापयति—'यदि जीवितेन श्रिया वा
प्रयोजनमस्ति तदा सत्वरमागत्यास्मच्चरणौ प्रणम । न चेदवस्थातुं
स्थानान्तरं चिन्तय ।' राजा सकोपमाह—'आः ! कोऽप्यस्माकं
पुरतो नास्ति य एनं गलहस्तयति ?' । उत्थाय मेघवर्णो ब्रूते—