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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 302 में से

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पृष्ठ 190

१७० हितोपदेशः [ विग्रह २५-
बैठ गया । फिर, 'बढ़ई दूसरे गाँवको गया' इस विश्वासके मारे वह यार दिन
डूबतेही आ गया । पीछे उसके साथ उसी पलंग पर क्रीड़ा करती हुई पलंगके
नीचे बैठे हुए स्वामीकी देहके (स्वल्पसा) छूजानेसे स्वामीको छलिया जान कर
उदास हो गई । तब यारने कहा-'क्या बात है ? तू आज मेरे साथ जी खोल
कर नहीं रमण करती है ? तू मुझे कुछ दुचित्ती-सी समझ पड़ती है।' उसने
कहा-'तू नहीं जानता है । मेरा प्राणप्यारा कि जिसके साथ मेरी बाल्यावस्थासे
प्रीति है सो आज दूसरे गाँवको गया है। उसके बिना सब जनोंसे भरा हुआभी
यह गाँव मुझे अरण्य-सा जान पड़ता है । क्या होनहार है, वहाँ दूसरे स्थानमें
क्या खाया होगा अथवा कैसे सोया होगा इस सोचसे मेरा हिरदा फटा जा रहा
है ।' यारने कहा-'क्या तेरा बढ़ई ऐसा स्नेह करने वाला है ?' व्यभि-
चारिणी स्त्री बोली-'अरे धूर्त ! क्या पूछता है ?
शृणु,—
परुषाण्यपि या प्रोक्ता दृष्टा या क्रोधचक्षुषा ।
सुप्रसन्नमुखी भर्तुः सा नारी धर्मभागिनी ॥ २५ ॥
सुन—पुरुष चाहे वैसे निष्ठुर वचन स्त्रीसे कहे और क्रोधकी आँखसे
देखे परंतु पतिके सामने मुखको जो प्रसन्न रक्खे वह स्त्री ही धर्मकी अधिकारिणी
है ॥ २५ ॥
अपरं च,—
नगरस्थो वनस्थो वा पापो वा यदि वा शुचिः ।
यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः ॥ २६ ॥
और दूसरे–नगरमें रहे, अथवा वनमें रहे, पापी हो अथवा पुण्यात्मा हो
जिन स्त्रियोंको पति प्यारा है उन्हींका संसारमें बड़ा भाग्योदय है ॥ २६ ॥
अन्यच्च,—
भर्ता हि परमं नार्या भूषणं भूषणैर्विना ।
एषा विरहिता तेन शोभनापि न शोभना ॥ २७ ॥
और स्त्रियोंका भूषणोंके विनाही पति परम भूषण है, उससे रहित यह स्त्री
रूपवतीभी कुरूपा है ॥ २७ ॥