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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

१४८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १६५-
हो और अत्यन्त मायासे भरा होना-यह कौनसा अपूर्व नाटकका व्यवहार है
जो दुर्जनोंने सीखा है ! ॥ १६४ ॥
तथा हि,—
पोतो दुस्तरवारिराशितरणे दीपोऽन्धकारागमे
निर्वाते व्यजनं मदान्धकरिणां दर्पोपशान्त्यै सृणिः ।
इत्थं तद्भुवि नास्ति यस्य विधिना नोपायचिन्तः कृता
मन्ये दुर्जनचित्तवृत्तिहरणे धातापि भग्नोद्यमः' ॥ १६५ ॥
और-दुस्तर समुद्रके पार होनेके लिये नाव, अंधकारके आने पर दीपक,
वायुरहित समयमें पंखा, और मद वाले हाथीका घमंड दूर करनेके लिये
अंकुश-इस प्रकार इस संसारमें ब्रह्माने हरएक विषयके उपायकी चिंता नहीं की
हो ऐसी बात नहीं है, पर मैं मानता हूँ कि दुर्जनोंके चित्तकी वृत्ति हरण(दूर)
करनेमें विधाताभी उद्योगरहित (विफल-प्रयत्न) हो गया ॥ १६५ ॥
संजीवकः पुनर्निःश्वस्य—'कष्टं भोः ! कथमहं सस्यभक्षकः
सिंहेन निपातयितव्यः ?
संजीवक फिर साँस भर कर (बोला)—अरे ! बड़े कष्टकी बात है, कैसे सिंह
मुझ घासके चरने वालेको मारेगा ?
यतः,—
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं बलम् ।
तयोर्विवादो मन्तव्यो नोत्तमाधमयोः क्वचित् ॥ १६६ ॥
क्योंकि-जिन दोनोंका समान वित्त और समानही बल हो, उन दोनोंका विरोध
हो सकता है, किंतु सबल और निर्बलका तो कदापि नहीं होता है ॥ १६६ ॥
( पुनर्विचिन्त्य ) केनायं राजा ममोपरि विकारितो न जाने ।
भेदमुपगताद्राज्ञः सदा भेतव्यम् ।
( फिर सोच कर) किसने इस राजाको मुझसे क्रोधित करा दिया नहीं जानता
हूँ । और, स्नेह छूटे राजासे सदा डरना चाहिये ।
१ कोई ग्रंथमें 'तयोर्विवादो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित्' ऐसा पाठ है;
वहां पर 'उन्हीं दोनोंका वाद और स्नेह हो सकता है, उत्तम और अधमका नहीं'
ऐसा अर्थ समझना.